विकास के प्रति आदिवासियों के बढ़ते विश्वास व भागीदारी से बढ़ रही माओवाद की फड़फड़ाहट

यदि आप सच में बस्तर के आदिवासी समाज के प्रति ईमानदार हैं व संवेदनशील हैं, तो सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठ कर आसमानी चिंतन से बेहतर है… एक बार फिर मेरे आग्रह पर इस गज भर लंबे आलेख को तनिक समय दे कर पढ़िये, फिर लिखिए जो कुछ आपकी राय बने माओवादी आतंक पर, आदिवासी समस्या पर.

बस्तर पर पिछले आलेख ने अगर आपको जरा भी प्रभावित किया हो तो एक बार फिर निहोरा है, बिना पढ़े लाइक की रस्म न निभाइए.

विवेक उमराव, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया.

मैं बस्तर 15 साल पहले पहली बार गया था. मेरा कोई NGO नहीं. मेरा कोई फंडेड प्रोजेक्ट नहीं. बस्तर में कोई दुकान नहीं, व्यापार नहीं. बस्तर आने जाने का कारण मेरी कोई नौकरी होगी, ऐसा भी बिलकुल नहीं क्योंकि मैंने आज तक बस्तर में ही नहीं, कहीं भी नौकरी नहीं की.

मैंने यह सब किया क्योंकि मैं लो-प्रोफाइल रहकर, बिलकुल सड़कछाप बनकर, आम बनकर, उन्हीं में से एक बनकर हकीकत को समझना चाहता था. ताकि समाधान के लिए, शांति के लिए व आदिवासी समाज के लिए अपनी भागीदारी तय कर सकूं.

सैकड़ों गांवों में गया. बहुत आदिवासियों से मिला. हर तरह के लोगों से मिला. पहले सरकारी लोगों से नहीं मिलता था. लेकिन जब से मैंने यह देखा कि सरकारी लोग आदिवासियों के लिए दृष्टि व प्रतिबद्धता से काम कर रहे हैं, तब से उनसे भी मिलने लगा. आज तो बस्तर में विकास व समाधान के लिए बहुत ही बेहतर काम हो रहे हैं. दूरदृष्टि के साथ काम हो रहे हैं.

दरअसल वर्तमान में बस्तर में माओवाद की फड़फड़ाहट यह है कि विकास व समाधान के कार्यों के प्रति आदिवासी समाज का विश्वास व भागीदारी बढ़ती जा रही है. उनको अहसास हो रहा है कि उनका रणनीतिक व आर्थिक रूप से सबसे मजबूत किला हिल रहा है. यदि प्रोपगेंडा की ताकत न लगाई गई तो किला ढह जाएगा.

इसीलिए, जनदबाव उनके पक्ष में रहे व बने इसके लिए मनोविज्ञान, मानसिकता, कंडीशनिंग, तथ्य, तर्क, विद्वता का अहंकार इत्यादि हर स्तर पर क्रमागत व योजनाबद्ध तरीके से हर स्तर पर विभिन्न हथकंडों के साथ प्रोपागंडे प्रायोजित व प्रतिष्ठित कर रहे हैं.

अब मुझे लगता है कि मुझे बस्तर के उन जमीनी हकीकतों की चर्चा दुनिया के सामने करनी चाहिए तो माओवाद, समर्थकों व NGO दुकानदारों के प्रोपगेंडा व स्वार्थों के कारण, छिपी रह जाती है, तिरस्कृत होती है, उपेक्षित होती है.

आप माओवाद की बात कीजिए. तुरंत जल, जंगल, जमीन, पुलिसिया त्याचार, कारपोरेट, आदिवासी संस्कृति इत्यादि जैसे इमोशनल तत्व ठूंस दिए जाते हैं. समझने-समझाने, जानने-बूझने की संभावना का भ्रूण भी खतम.

क्या सच है, क्या प्रायोजित है, क्या प्रोपगेंडा है, क्या है, क्या नहीं है. इन सबसे कोई मतलब नहीं. अपनी विद्वता या तर्कों के अहंकार या अपने स्वार्थों या अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर कोई पक्ष चुनकर दे दनादन चालू. यही है चिंतन, मनन, विश्लेषण…. इत्यादि सबकुछ.

पक्ष भी दो ही माने जाते हैं. सरकार व माओवादी. आदिवासी भी एक पक्ष है इसकी कोई बात ही नहीं. माओवादी को ही आदिवासी पक्ष मान लिया गया है. यह भी एक बहुत खतरनाक प्रोपागंडा है.

मैं आदिवासी पक्ष की बात करता हूं. जो भी आदिवासी को एक पक्ष मानता है और बस्तर की जमीनी हकीकत से वाकिफ है, वैचारिक रूप से ईमानदार है तथा वस्तुनिष्ठ दृष्टि रखता है. वह बस्तर में माओवाद के प्रवेश से लेकर अब तक की माओवादी गतिविधियों के कारण माओवाद के साथ खड़ा हो ही नहीं सकता है. असंभव है.

मेरा पक्ष है – “बस्तर का आम आदिवासी समाज”.

बस्तर के संदर्भ में कुछ तथ्य

बस्तर का आदिवासी समाज कभी संपत्तियों की स्वामित्व वाली मानसिकता में नहीं जीता रहा. जमीन पर स्वामित्व जैसा नहीं रहा. जहां महुआ, टोरा आदि जैसे कुछ पेड़ दिखे वहीं झोपड़ी बनाई. झोपड़ी के आसपास मुर्गी, सुअर कुछ पाल लिया. बस्तर का आदिवासी खेती करना नहीं जानता था.

आदिवासी महिलाओं में सेक्स कभी मुद्दा नहीं रहा. पुरुष कई-कई पत्नियां रख सकता रहा, आज भी हजारों आदिवासियों की कई-कई पत्नियां हैं. पत्नी का जब मन हुआ उसी क्षण से पति को छोड़कर पड़ोसी के घर जाकर रहने लगी, वहां से मन ऊब गया या कुछ खटपट हो गई पुराने पति से बात जम गई तो फिर से पुराने पति के साथ आकर रहने लगी.

यदि किसी ने कोई सहयोग किया तो आभार व्यक्त करने के लिए आदिवासी महिला का स्वेच्छा से सेक्स करना वह भी गौरव अनुभव करते हुए, सामान्य मानसिकता का अंग रहा. पिता, पति, भाई, पुत्र किसी को कोई आपत्ति नहीं.

आपका मुख्यधारा का समाज जहां स्त्री पिता, पति व भाई की सहमति के बिना यौन संबंध नहीं बना सकती है. जहां स्त्री को अपना पति चुनने का अधिकार नहीं रहा. आज भी हजारों लड़कियों की हत्या केवल प्रेम करने के अपराध के लिए कर दी जाती है.

ऐसे समाज के आप यदि मुख्यधारा वाले समाज की मानसिकता व कंडीशनिंग को जबरन ठूंस करके बस्तर के आदिवासी समाज को समझना चाहेंगे तो आप हमेशा प्रोपगेंडा के ही शिकार रहेंगे.

बस्तर में आदिवासियों ने कभी भी जमीन के लिए कोई आंदोलन आज तक नहीं किया. बस्तर में आदिवासियों ने जो भी आंदोलन किए वह माओवादियों के विरोध में किए, इन आंदोलनों को माओवादियों ने बर्बरतापूर्वक कुचला व बदनाम किया.

यदि आपको लगता है कि आदिवासी की जमीन छीनी जा रही थी इसलिए आदिवासी माओवादी बन गए तो यह बताइए कि माओवाद के आने के पहले बस्तर की कितनी जमीन किस कारपोरेशन को दी गई.

ठोस बात कीजिए, फालतू के दर्शन, अर्थसिद्धांत जैसी तार्किक बकवादिता व विद्वता की जरूरत नहीं. यहां आप आदिवासियों के ऊपर हिंसा को जस्टीफाई कर रहे हैं, इसलिए ठोस बात कीजिए वस्तुनिष्ठ तथ्यों के साथ.

जब मैं पहली बार बस्तर गया था तब मैंने वहां दुकानों के नाम पर छोटी-छोटी झोपड़ियां देखीं थीं. यही झोपड़ियां कुछ सालों में ही बड़ी-बड़ी दुकानें बन गईं.

बस्तर के आदिवासी के पास क्रयक्षमता कभी रही नहीं. वह अपनी जरूरतें जंगल से ही पूरी कर लेता रहा.

सरकारी नौकरियों वाले लोग भी बहुत नहीं रहे.

सवाल यह है कि जब खरीदार ही नहीं थे तो इन सैकड़ों दुकानदारों को लाखों करोड़ों का बिजनेस किसने दिया.

सवाल यह है कि जहां कोई खरीददार ही नहीं वहां थोक सामान बेचने की दुकानें कैसे पैदा हो गईं.

आदिवासियों के ठेकेदार माओवादियों के रहते यह सब कैसे होता रहा? इसलिए होता रहा क्योंकि इन लोगों को माओवाद ने ही पाला-पोषा. माओवादी ही इनके सबसे बड़े सप्लायर व खरीदार रहे.

गहराई में जाकर सोचिए विचारिए. आपको बस्तर के माओवाद का असली चेहरा दिखने लगेगा. उन NGO का असली चेहरा दिखने लगेगा जो मानवाधिकार के ठेकेदार बने सोशल मीडिया में तैरते उतराते रहते हैं.

आज जितना भी आदिवासी युवा जो NGO व सरकारी ग्रांटों व योजनाओं से माल कमाते हुए खुद को बड़ा आदमी मानने की नीचता/ मूर्खता/ धूर्तता में जीता है, बिना अपवाद वह सभी गैर-आदिवासी NGO व मानवाधिकार ठेकेदारों के ही चेले चपाटे हैं या उनके चेलों चपाटों के चेले चपाट हैं.

आदिवासी समाज के युवाओं के मूल्यों का हनन किसने किया? माओवादियों ने व NGO ठेकेदारों ने.

मुझे बताइए कि ओमप्रकाश चौधरी, के सी देवासेनापथि, सौरभ कुमार, आर प्रसन्ना ने दंतेवाड़ा में कितनी जमीनें आदिवासियों से छीनकर कारपोरेट को दे दीं. उल्टे इन लोगों ने आदिवासियों के लिए जबरदस्त काम किए हैं.

मुझे बताइए कि अलेक्स पी मेनन, पी दयानंद, नीरज बनसोड़ ने सुकमा में कितनी जमीनें आदिवासियों से छीनकर कारपोरेट को दे दीं. उल्टे इन लोगों के काम जाकर देखिए तो दातों तले उंगली दब जाएगी.

ऐसा क्या कारण है नीरज बनसोड़ की बात को तोड़ मरोड़ कर ऑडियो वायरल कर दिया जाता है. लेकिन पिछले कई सालों से नीरज बनसोड़ व उनकी पत्नी करण बनसोड़ रात-दिन आदिवासी समाज के विकास व उन्नति के लिए काम करते आ रहे हैं उसकी बिलकुल भी चर्चा नहीं होती.

आखिर क्यों?

संवेदनशीलता व सामाजिक प्रतिबद्धता का मानदंड किसी अधिकारी के द्वारा अपने ऑफिस साइकिल या कार से जाने से नहीं होती बल्कि लोगों के लिए जमीन पर दूरदृष्टि के साथ किए गए कामों से तय होती है.

यदि सरकारी आवास से सरकारी कार्यालय जैसी छोटी दूरी साइकिल से जाना महानता है तो नीरज बनसोड़ व उनकी पत्नी तालाब खोदने के लिए जब कुदाल फावड़ा लेकर खुद तालाब में घुसते हैं, तो यह उनकी महानता के रूप में क्यों नहीं गाई जाती.

ओमप्रकाश चौधरी ने शून्य से आदिवासी समाज के बच्चों के भविष्य के लिए इतना कुछ खड़ा कर दिया. उसकी बात क्यों नहीं.

अलेक्स पी मेनन सुकमा में बिलकुल आम आदिवासी की तरह गांव गांव भटकते थे. स्मार्ट विलेज स्थापित करने के आइडियाज़ में काम कर रहे थे. क्यों उनके आइडियाज़ की कोई बात नहीं.

पी दयानंद तो दंतेवाड़ा व सुकमा में नींव का पत्थर बन कर ही रह गए. फिर भी कोई शिकन नहीं. क्यों इनकी कभी कोई चर्चा नहीं.

टामन सिंह सोनवानी के अबुझमाड़ में किए गए कामों की चर्चा क्यों नहीं.

उन पुलिस अधिकारियों की चर्चा क्यों नहीं जो जान हथेली पर रखकर इन इलाकों में रास्ते साफ करते हैं ताकि विकास, उन्नति, शिक्षा व स्वास्थ्य की योजनाएं आदिवासियों तक पहुंच सकें. प्रशासनिक अधिकारी को फील्ड में बहुत जाना नहीं होता है, फील्ड की तपिश तो पुलिस अधिकारी ही झेलते हैं.

मानवाधिकार ठेकेदारों के तथाकथित CC टीवी कैमरे व तथाकथित जमीनी सूचना स्रोत तंत्र कोर-माओवादी इलाकों में महिलाओं के नितंबों की फोटो निकाल लाते हैं, लेकिन गंभीर व दूरदर्शी रचनात्मक प्रयासों जो परिणाम दे रहे हैं की चर्चा तक नहीं करता.

आखिर क्यों?

यह कैसी आदिवासियों के प्रति संवेदनशीलता. यह कैसी क्रांतिकारिता. यह कैसी दृष्टि. यह कैसी सामाजिक ईमानदारी.

आदिवासी समाज को भी तो एक पक्ष बनाइए या आप माओवादियों को ही आदिवासियों का पक्ष साबित करने की धूर्तता व वैचारिक हिंसा को ही भोगने में लिप्त रहेंगे.

चलते-चलते

माओवादी भारत के लोकतंत्र को उखाड़ फेंक कर अपनी सत्ता कायम करना चाहते हैं. वे युद्ध की सभी रणनीतियों का प्रयोग करते हैं. उनके अपने अलग-अलग विभाग हैं.

इस यथार्थ को स्वीकारना होगा कि बस्तर का माओवाद बस्तर के आदिवासी का प्रतिनिधित्व नहीं करता है. बस्तर भारत के माओवाद के लिए रणनीतिक व आर्थिक रूप से सबसे अधिक महत्वपूर्ण है.

यदि आप सच में बस्तर के आदिवासी समाज के प्रति ईमानदार हैं व संवेदनशील हैं, तो बस्तर के माओवाद को समझने के लिए हवाई कल्पनाओं व प्रायोजित तर्कों/ तथ्यों से बाहर आना होगा.

जब तक आप बस्तर के माओवाद को आदिवासी पक्ष मानते रहेंगे तब तक आप कभी भी बस्तर के आदिवासी के साथ नहीं खड़े हो सकते हैं.

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