मैं निश्चिंत हूँ चिंतित नहीं

ma jivan shaifaly poem

मैं निश्चिंत हूँ चिंतित नहीं
जो थम गया-सा लगता है
वो थमा नहीं है,

क्योंकि धरा को किसी ने धुरी पर घूमते नहीं देखा है,
उम्र को बढ़ते और झुर्रियों को चेहरे पर चढ़ते नहीं देखा है..

आज जो थमे हुए से लगते हैं
तो वो एक परिक्रमा को
पूरा करने का ग़ुरूर है…

अपनी ही धुरी पर घूमता अपना अस्तित्व,
परिपक्वता की प्राप्ति पर इठलाता,
मैं को पाकर मदमाता,
कुछ आँसुओं की आर्द्रता
और तुझको छूने की पराधीनता,
यही सब का बोझ लेकर खड़ा है
उस छोर पर जहाँ से आरंभ करना है दूसरी परिक्रमा..

कुछ हार और कुछ जीत
या न हार न जीत का भाव लिए
व्याकुल मन और व्यग्र तन,
चेहरे पर निश्चिंतता
और माथे पर कुछ असहनशीलता लिए
परिपक्वता की दूसरी धुरी पर
घूमने की कोशिश कर रहा है…

कुछ शुभकामनाएँ हैं,
कुछ आशीर्वाद है,
कुछ छुअन की कल्पना और
सब कुछ अछूता-सा भाव है
फिर भी मैं निश्चिंत हूँ, चिंतित नहीं.

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