ऐसे तो स्कूली बच्चे न संभले, आप इन्हें संभालने चले हो!

तरह-तरह की खबरें आ रही हैं… पता नहीं, असली या फ़र्ज़ी… इतनी बटालियन भेज दी, उतने नक्सली मार गिराए…

मुझे कोई खुशी नहीं हो रही है, कोई तसल्ली नहीं मिल रही. यह क्या खेल बना रखा है? वे पहले मारेंगे, फिर आप बयान देंगे…

वे फिर मारेंगे, तब आप निंदा करेंगे… वो फिर मारेंगे… तब आप उनका दिल जीतने निकलेंगे, विकास के पैकेज देंगे… उन्हें बाढ़ से बचाने के लिए अपने सैनिकों की जान जोखिम में डालेंगे…

वे फिर भी मारेंगे, गालियाँ देंगे, थूकेंगे, पत्थर मारेंगे… फिर जब जनता भी गालियाँ देने लगेगी तब आप एक सर्जिकल स्ट्राइक करेंगे… ऑपरेशन्स चलाएंगे, फौजें और अर्धसैनिक बल भेजेंगे… यह क्या कोई स्कूली बच्चों का खेल है?

तीन साल हो गए सत्ता में… मुझे तो दिखाई नहीं दिया कि सरकार के पास किसी तरह की कोई नीति या विज़न है आंतरिक सुरक्षा की इस समस्या से निबटने का. पहले की सरकारें आतंकवाद को पालती पोसती थीं, यह सरकार वह नहीं करती… बस, इतना ही.

पर पहले के शासन ने इसे पालपोस कर इतना पट्ठा बना दिया है, कि आपके कुछ नहीं करने से यह शांत नहीं रहेगा. इसे नाथना होगा, बांधना होगा… पर आपके पास तो बस गांधी की बकरी वाली रस्सी है.

पुचकारने चुचकारने से यह पालतू बनने वाला जानवर नहीं है… आपको किसी ने पढ़ा दिया है कि बुराई को अच्छाई से जीतो, हृदय परिवर्तन करो… और आप इसे दिल से लगाये बैठे हैं.

क्या मासूमियत है… इतनी भलमनसाहत से तो मिडिल स्कूल के बच्चे नहीं संभलें… आप किसी स्कूल के हेडमास्टर नहीं हैं.

आप 120 कऱोड की आबादी वाले एक ऐसे देश के राष्ट्राध्यक्ष हैं जो शोलों पर बैठा सुलग रहा है. और आप शासन करने के बजाय प्रवचन करने वाले समाज सुधारक बने हुए हैं.

आपके ऊपर देश के इतिहास के उस स्वर्णिम क्षण की जिम्मेदारी है जहां से आप आने वाली सदियों का इतिहास लिख सकते हैं… पर पता नहीं, आपको यह बोध है भी या नहीं.

आप ईमानदार हैं, मेंहनती हैं, कुशल प्रशासक हैं… आपसे पहले के ज्यादातर प्रधानमंत्रियों के बारे में इतना भी नहीं कहा जा सकता. पर बस इतना ही.

आप 18 घंटे काम करते हैं, वर्षों से लटके फ़ाइल निबटा रहे हैं…देश को साफ सुथरा रहने के उपदेश दे रहे हैं…

युग युगांतर के बाद एक हिन्दू शासक आया है, वह भी बाबूगिरी और बाबागिरी के बीच बीच कहीं झूल रहा है…

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