हॉलीवुड को बाहुबली की हुंकार, आओ कर लो मुकाबला

जब मैं बाहुबली-द कन्क्लूजन देखकर बाहर निकला तो काफी कुछ बदल चुका था. आज सुबह 11  बजे के बाद भारतीय फिल्म उद्योग का चेहरा हमेशा के लिए बदल गया. लोगों का नज़रिया फिल्म उद्योग के प्रति हमेशा के लिए बदल गया. आज के बाद कोई न कह सकेगा कि हमसे तकनीक में हॉलीवुड बेहतर है. बाहुबली की वापसी उम्मीद से ज्यादा हंगामेदार साबित हुई है. तगड़ी संभावनाएं हैं कि पहले दिन की कमाई का ऐसा कीर्तिमान बनेगा जो तीनो खान सितारे मिलकर भी नहीं तोड़ सकेंगे.

कहानी

अमरेंद्र बाहुबली (प्रभास) और भल्लाल देव (राणा दग्गुबाती) चचेरे भाई हैं, लेकिन दोनों का लालन-पोषण एक ही मां शिवगामी देवी (रमैया कृष्णन) ने किया है. रानी शिवगामी देवी महिष्मति का शासन भी संभालती हैं.

शिवकामी भले ही भल्लाल देव की सगी मां है, लेकिन चाहती है कि महिष्मति का राजा अमरेंद्र बाहुबली ही बने जो मां-पिता की मौत के बाद अनाथ हो चुका है. शिवगामी देवी को लगता है कि बाहुबली में अच्छे शासक बनने के सारे गुण हैं.

रानी को लगता है कि बाहुबली दयालु है, जबकि उनका अपना बेटा भल्लाल देव निर्दयी है. इसी के बाद कहानी में मोड़ आता है. भल्लाल अपने पिता के साथ मिलकर बाहुबली को उखाड़ फेंकने की साजिश करता है. दोनों इस साजिश में कटप्पा (सत्यराज) और शिवगामी को मोहरे की तरह इस्तेमाल करते हैं.

भव्यता की पराकाष्ठा क्या होती है ये बाहुबली-2 देखकर आसानी से समझा जा सकता है. महिष्मति साम्राज्य को कंप्यूटर ग्राफ़िक्स से ऐसा रचा गया है मानों पौराणिक भारत के आख्यानों का कोई वातायन खुला रह गया हो और आप चुपके से एक भव्य कालखंड में प्रवेश कर गए हो.

खूबसूरत दृश्य और कसी हुई फ्रेमिंग फिल्म की असल ताकत है.  निर्देशक ने कहानी को जहाँ से छोड़ा था, फिल्म ठीक वहीं से शुरू होती है. दोनों फिल्मों के बीच तीन साल का अंतराल है लेकिन ‘कंटीन्यूटी’ कहीं से भी टूटती हुई नहीं लगती.

प्रभास जब पहले दृश्य से फिल्म में प्रवेश करते हैं तो थियटर शोरगुल से गूंज उठते हैं. प्रभास अपने किरदार को नई ऊंचाइयों पर ले जाते हैं. कड़ी मेहनत और विशुद्ध समर्पण का सुनहरा ताप उनके चेहरे से झलकता है. बाहुबली और प्रभास एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं. बाहुबली- द कन्क्लूजन के बाद प्रभास उस पायदान पर पहुँच जाएंगे, जहाँ से एक पायदान ऊपर महान रजनीकांत विराजमान हैं.

प्रभास,  राणा दुगबत्ती, अनुष्का शेट्टी, रमैया कृष्णन और सथ्यराज ने फिल्म के लिए अपना शत-प्रतिशत योगदान दिया है. ख़ासतौर से रमैया  अपने साथी कलाकारों पर भारी पड़ी हैं. वे न होती तो बाहुबली में वो बात ही न होती.

रमैया का ‘मैनरिज्म’ बाहुबली की तलवार की धार है,  इससे इनकार नहीं किया जा सकता. कट्ट्पा के रूप में सथ्यराज दर्शकों का दिल चुराने में कामयाब होते हैं.  ऐक्शन डायरेक्टर पीटर हिन ने बाहुबली को अपनी बेहतरीन सेवाएं दी है. उनके चमकदार काम ने बाहुबली की अच्छी पैकेजिंग की है.

हालाँकि फिल्म के अंतिम बीस मिनट ये बताते हैं कि एस राजामौली को इसका तीसरा भाग बनाने का इरादा छोड़ देना चाहिए. क्लाइमेक्स में जबरन वीएफएक्स डालने का बचकाना प्रयास राजामौली की समझ पर सवाल खड़ा कर रहा है. अति उस समय शुरू हुई जब सैनिक लगभग उड़ते हुए भल्लाल देव के किले में घुसते हैं.

एस राजामौली का कद अब इतना बड़ा हो चुका हैं कि उनके समकालीन निर्देशकों को उनसे ऊपर जाने के लिए महान भागीरथी प्रयास करने होंगे. सुबह ग्यारह बजे जब पहला शो ख़त्म होने के बाद नंबर गेम भी तेज़ी से बदल गया है. अब एक से लेकर दस नंबर तक राजामौली का नाम आएगा, उसके बाद दूसरे निर्देशकों की गिनती होगी.

राजामौली आपको बाहुबली के आखिरी बीस मिनटों का वास्ता. अब आप नए प्रोजेक्ट पर फिर शून्य से काम शुरू करें. आपको अजनबी बनकर किसी आइसक्रीम पार्लर में चुपके से आइसक्रीम खाना अच्छा लगता है.  फिर वही अजनबी बन जाइये, क्या पता किसी दिन उसी पार्लर में आपका दिमाग कोई अनोखा विचार उत्सर्जित करे. बाहुबली को यही छोड़कर शिखर से एक कदम नीचे उतर आइये. शिखर नुकीला होता है, ज्यादा वक्त तक रहने नहीं देता.

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