बाहुबली 2 : हिन्दुओं को नीचा दिखाए बिना भी बन सकती है सुपर हिट फिल्म

बाहुबली 2 एक बेहतरीन फिल्म है. इसे सच्चे अर्थों में पहली भारतीय फिल्म कहा जा सकता है. यह फिल्म ना सिर्फ उत्तर या दक्षिण भारत की है, ना ही सिर्फ पूरब या पश्चिम की. यह कई कारणों से अखिल भारतीय के साथ अंतर्राष्ट्रीय हिन्दुस्तानी फिल्म भी बन चुकी है. जिसे हर हिन्दुस्तानी, भारत से लेकर अमेरिका और दुबई से लेकर यूरोप तक में देख रहा है. और जो नहीं देख रहा उसे देखना चाहिए. जिसके अनेक कारण हैं.

यह मनोरंजक है. फिल्म अंत तक दर्शक को हिलने नहीं देती. कसी हुई स्टोरी लाइन है जिसमे रोचकता बनी रहती है. इसके सीन भव्य हैं. प्राकृतिक मनमोहक विहंगम दृश्य परोसा गया है. अद्भुत फोटोग्राफी और उसका बेहतरीन प्रस्तुतिकरण है.

कह सकते हैं कि यह एक ग्रेट शोमैन की फिल्म है. जिसमे ना तो राजकपूर का जबरन ठूसा हुआ ग्लैमर है और ना ही आज के किसी तथाकथित शोमैन की बीमार मानसिकता दिखती है, जो देवदास तक को एक टूटे हुए प्रेमी से सिर्फ एक शराबी बन देता है और उसकी प्रेमिका को किसी रंगीन महफ़िल में नचवा देता है.

इन लोगों की संक्रमित मानसिकता ने कितना नुकसान किया है उस पर एक किताब लिखी जा सकती है. ये इतने बीमार हैं कि एक शूरवीर बाजीराव को किसी मस्तानी का सिर्फ आशिक बना देते है. यही नहीं अपनी फिल्म को हिट करने के लिए पद्मावती के ऐतिहासिक चरित्र के साथ छेड़छाड़ करने के चक्कर में रहते है.

बाहुबली का डायरेक्शन इन सब को एक करारा जवाब है कि हिन्दुओं को नीचा दिखाए बिना और हिन्दुस्तान के गौरवशाली इतिहास से छेड़छाड़ किये बिना भी एक सुपर हिट फिल्म दी जा सकती है.

बाहुबली के फाइट सीन तो इतने मौलिक हैं कि फिल्म की रचनाशीलता उभर आती है और यह अपने समय के साथ खड़े होकर भी इस काल में पसंद की जा सकती है. इसका श्रेय फिल्म की पूरी टीम को जाता है. इसे बच्चे-बूढ़े-जवान परिवार के साथ देख सकते हैं. युगल जोड़े रोमांस का मजा ले सकते हैं.

यह हॉलीवुड प्रेमियों को भी रोमांचित करेगी और इसे देख कर उनका अभिमान भी जागेगा कि हिन्दुस्तान इस क्षेत्र में भी अब पीछे नहीं. कह सकते हैं कि यह मेड इन इंडिया का एक सफल प्रयोग है जिसे देख कर घर का पैसा घर में ही रहेगा.

बाहुबली बॉलीवुड के स्थापित मानक और कुछ मिथ्यों को भी तोड़ती है.

यह बॉलीवुड के “बौने खानों” के जबरन थोपे गए हीरोइज़्म के आकर्षण को धुंधला करती है. यह वो झूठा नायकत्व है जिसे बड़ी चतुराई से एक गिरोह के द्वारा प्लांट किया गया था. इन बौने खानों के चारों तरफ जिस तरह एक मजबूत किला बना दिया गया था, उसकी नींव को बाहुबली की सफलता ने हिला दिया है.

जिससे इस किले के साथ खड़ी कई दीवारें, जो दोयम दर्जे के कई कहानीकार, गायक, गीतकार, संगीतकार के रूप में जबरन खड़ी कर दी गई थी, ध्वस्त हुई है. पहले बाहुबली 1 और अब बाहुबली 2 की सफलता यह प्रमाणित करती है कि डी कम्पनी के पाले हुए समीक्षकों और मीडिया दलालों के बिना भी फिल्म सुपर-सुपर हिट हो सकती है. जिसे फिर किसी कपिल शर्मा के भौंडे कार्यक्रम के द्वारा प्रचार की जरूरत नहीं.

इस तरह यह बॉलीवुड के अहम को तोड़ती है. जिसके बूढ़े हो रहे बौने खानों के बासीपन को जबरन झेलने के लिए मजबूर दर्शक के सामने बाहुबली फिल्म का हीरो प्रभास एक ताजी हवा का झोंका बन कर आया है.

यह देव आनंद, राजेश खन्ना, अमिताभ, धर्मेंद्र, विनोद खन्ना के उस युग की याद दिलाती है जब इन हीरों को प्रत्यक्ष देखकर भी युवतियां अपना होश खो देतीं थीं. यह पुनः वैजन्तीमाला, हेमामालनी, रेखा और श्रीदेवी की याद दिलाती है और बतलाती है कि आज भी दक्षिण भारत में अनुष्का शेट्टी और रमैया कृष्णन जैसी खूबसूरत और सशक्त अभिनेत्रियां हैं. इन दोनों के अलावा भी अन्य कई कलाकारों ने बाहुबली में बेहतरीन एक्टिंग की है.

यूं तो बाहुबली एक व्यवसायिक फिल्म है, मगर इसे हरेक देशभक्त को भी देखनी चाहिए. क्योंकि युद्ध सिर्फ सीमा पर ही नहीं लड़े जाते और ना ही सिर्फ गोली बन्दूक से दुश्मन पर वार किया जाता.

कुछ युद्ध संस्कृति-कला और साहित्य के धरातल पर भी लड़े जाते हैं और जिनके अधिक दूरगामी परिणाम होते हैं. इसके द्वारा दर्शक के विचारों पर कब्जा करके हमेशा के लिए उसको गुलाम और कमजोर कर दिया जाता है.

जिस तरह पीके जैसी फिल्मो के द्वारा एकतरफा ज्ञान परोस कर हमारी हँसी उड़ाई गई उसे भोला भाला दर्शक आसानी से समझ नहीं पाता. भारत जैसे अति प्राचीन देश का मुख्य आधार उसका आध्यात्मिक चिंतन है, दर्शन है. उस पर जिस तरह से हमला हुआ है वो यूं तो दिखाई नहीं देता मगर बॉलीवुड में धीरे-धीरे हो रहा है जो अत्यंत घातक है.

ध्यान से देखें, कैसे हमारे आराध्य शिव, गणेश फिल्म से ओझल कर दिए गए, फिल्मो में भजन गीत बंद हो गए, मंदिर की घंटियाँ नहीं बजती, माता के जयकारा नहीं लगता. बॉलीवुड को बड़े शातिराना ढंग से हमारी सांस्कृतिक विरासत से दूर किया गया.

बाहुबली के द्वारा इन सब ने वापसी की है. इस फिल्म की सफलता इस बात का प्रमाण है कि ये सब हमारे दिल से अब तक दूर नहीं. इस लड़ाई में हरेक देशभक्त, इस फिल्म को देखकर, एक दर्शक के रूप में ही सही, सांस्कृतिक यज्ञ में आहुति डाल सकता है.

इससे यह फिल्म और अधिक हिट होगी जो बॉलीवुड के कई लोगों की दुकानों को बंद करेगी और अन्य फिल्मकारों को इसे अपनी फिल्मो का अंग बनाने के लिए मजबूर करेगी.

यह मात्र संयोग नहीं था जब स्वतंत्रता के तुरंत बाद मुगले आजम जैसी भव्य फिल्म बनाई गयी. और अकबर को जिस तरह से पेश किया गया वो हमारे जेहन में हमेशा के लिए उतर गया जबकि यह पूरी तरह से झूठ था.

अकबर हमारे गौरव का नहीं बल्कि गुलामी का प्रतीक है. इस उदाहरण मात्र से फिल्म के गहरे प्रभाव को समझा जा सकता है. फिल्म में अकबर का जो चरित्र गढ़ा गया वो वास्तवकिता से परे है मगर क्या आने वाली पीढ़ी इस बात को स्वीकार करेगी? नहीं.

वो अकबर और सलीम को पृथ्वीराज कपूर और दिलीप कुमार के फ़िल्मी चरित्र में संजो कर ही रखेगी. यहां यह पूछा जाना चाहिए कि हिन्दुस्तान की जनता को कश्मीर के चक्रवर्ती सम्राट ललितादित्य के ऊपर एक भव्य फिल्म बना कर क्यों नहीं दिखाई गई जबकि उनका राज्य अब तक के हिन्दुस्तान के सभी राजाओं से अधिक फैला हुआ था. उनका तो नाम भी हमारी पीढ़ियां नहीं जानती.

शूरवीर चन्द्रगुप्त पर कोई भव्य फिल्म क्यों नहीं बनी जिनका जीवन किसी फ़िल्मी कहानी से अधिक रोचक है. महान विक्रमादित्य पर अब तक कोई भव्य फिल्म क्यों नहीं बनी जबकि उनका शासनकाल हिन्दुस्तान का स्वर्णिम काल माना जाता है.

बहरहाल बाहुबली की सफलता इन फिल्मो के बनने का रास्ता खोलती है. यही कड़ी आगे जाएगी जब छत्रपति शिवाजी और महाराजा रणजीतसिंह के ऊपर फिल्म बनाने के लिए फिल्मवालो को मजबूर करेगी.

आज बाहुबली कमाई के सारे रेकॉर्ड तोड़ रही है. शायद १००० करोड़ के आंकड़े को पार कर जाए. जिसे फिर किसी को तोड़ना आसान नहीं होगा.

बॉलीवुड में कलात्मकता से अधिक पैसे के लालची लोग बैठे हैं, वे बाहुबली से अधिक पैसा कमाने के लिए लालायित होंगे. ऐसे में वे सब हिन्दुस्तान के असली बाहुबलियों पर फिल्म बनाने के लिए प्रेरित होंगे. क्योंकि बॉलीवुड के दुकानदारों को पता चल चुका है कि हिंदुस्तान की आत्मा में क्या हैं.

और जिस दिन इनमे से किसी भी महान राजा पर कोई फिल्म बनेगी वो अद्भुत होगी. वो सारे रिकार्ड तोड़ेगी, बाहुबली का भी. कोई और बाहुबली का रिकार्ड तोड़ने से रहा. इन सब के चक्कर में हिन्दुस्तान अपने असली नायको को परदे पर देख पायेगा. इसलिए हर हिन्दुस्तानी को बाहुबली देख कर फिल्मकारों इसके लिए मजबूर करना होगा.

फिल्मो में भी ज्ञान और सन्देश की बात ढूंढ़ने वालो को भी बाहुबली निराश नहीं करती. बशर्ते वे अपने सेक्युलर चश्मा उतार कर देखे. एक सफल राजा को कैसा होना चाहिए, यह फिल्म बताती है. साथ ही यह भी दिखाती है कि सत्ता में कैसे-कैसे षड्यंत्र होते रहे हैं और होते हैं. शासकों को आगाह भी करती चलती है.

मगर मेरी नजर में सबसे खास बात है यह फिल्म हम हिन्दुस्तानी के मूल चरित्र को दिखाती है कि हम “प्राण जाए पर वचन ना जाए” वाले लोग हैं. फिल्म के सभी मुख्य चरित्र, कैसे अपने वचन से जुड़े हैं, यह फिल्म में जाने अनजाने हुआ है. मगर हमारी विशेषता बता गया.

ठीक है इसके कारण हमने हमेशा नुकसान उठाया है और बाहरी लुटेरों ने हमें धोखे से लूटा है मगर वो हमारे इस विशिष्ट चरित्र को नहीं चुरा पाए, जिसने हमें विश्व में अनोखा और विश्वसनीय बनाया है. आज हम अपने चरित्र के साथ सजग हैं तो धोखेबाजों से सतर्क भी हुए हैं.

फिल्म का डायलॉग “जय महिष्मति” राष्ट्रवाद का एक नारा है, जिसे फिल्म देखकर निकलते हुए हम “जय हिन्द” के रूप में लगा कर अपने में जोश भर सकते हैं.

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