पीड़ित एवं शोषित वर्ग के न्याय प्राप्ति के सर्व सुलभ विकल्प भगवान परशुराम

आज अक्षय तृतीया है. कई अद्भुत संयोग एवं विशेषताओं के साथ आज रेणुकानंदन, महावीर, विष्णुअवतार भगवान परशुराम जी का प्राकट्य दिवस भी है. इस अवसर पर कई अद्भुत लेख फेसबुक पर छाए हुए है साथ ही कई विचित्र चर्चाएं भी.

भगवान परशुराम जी को मैं निजी रूप से एक महानायक मानता हूं. कारण भी स्पष्ट करने का प्रयास करता हूं.

महाभारत की एक महत्वपूर्ण घटना है जब माता सत्यवती के कहने पर भीष्म अपने पराक्रम के बल पर सत्यवती के पुत्र हेतु तीन राजकुमारियों अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका को विजित करके लाये थे जिसे तब क्षत्रियों की प्रचलित प्रथा में “वीर्यशुल्का” कहा जाता था.

अजेय भीष्म का किसी ने प्रतिरोध नही किया सिवाय एक राजकुमार शद्र के जो अम्बा से प्रेम करता था. वह भी पराजित हुआ.

जब यह बात हस्तिनापुर पहुंची तो राजकुमार विचित्रवीर्य ने अंबा को अपनाने से मना कर दिया. प्रसन्न अंबा जब शद्र के पास गई तो शद्र ने भी उसे स्वीकार करने से यह कह कर मना कर दिया कि क्षत्रिय हारी हुई कोई संपदा स्वीकार नहीं करते.

अपनी इस विकट परिस्थिति से परेशान अम्बा भीष्म के पास गई और उनसे निवेदन किया कि अब ऐसी परिस्थिति में वे उसे अपनाये क्योंकि उन्होंने ही उसे जीता था.

भीष्म ने अपनी अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा के चलते आदर सहित अंबा को मना कर दिया. अंबा ने काफी दबाव डाला लेकिन कोई भी भीष्म को आदेश देने में सक्षम नहीं था.

ऐसे में परिस्थितियों से पीड़ित वह राजकुमारी समर्थ, सक्षम, महावीर, भगवान परशुराम की शरण में गई और उनसे याचना की कि वह गंगापुत्र भीष्म को उनसे विवाह के लिए निर्देशित करें जिनकी वजह से उसकी जिंदगी इस प्रकार अवलंबित हुई.

परमकृपालु न्यायप्रिय भगवान परशुराम ने उस दीन स्त्री की याचिका को सत्य पाया और उसके साथ हुए इस अन्याय को पलटने के लिए भीष्म को संदेश पहुंचाया कि वह अंबा से विवाह करें.

शपथबद्ध भीष्म ने सादर अपने गुरु को अपने आजीवन अविवाहित रहने के वचन का कारण लेकर असमर्थता जाहिर कर दी. लेकिन भगवान परशुराम ने इस कारण को स्वीकार नहीं किया.

उन्होंने माना कि चाहे वो कोई भी क्यों ना हो उसे इस प्रकार से किसी स्त्री का जीवन बर्बाद करने का अधिकार नहीं है अतः उन्होंने अपने श्रेष्ठ एवं प्रिय शिष्य को समक्ष युद्ध के लिए ललकार दिया.

दोनों उस समय के परम योद्धा प्रलय की तरह आपस में लड़ने लगे. एक तरफ इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त गंगा पुत्र भीष्म और दूसरी तरफ सप्तचिरंजीवों में एक भगवान परशुराम.

युद्ध पूर्ण रूप से अनिर्णीत रहा अंततः निर्दोष प्राणियों के पीड़ित होने से सत्यवती स्वयं रणक्षेत्र में आई और भगवान परशुराम से याचना करने लगी कि भीष्म उनकी वजह से प्रतिज्ञाबद्ध है अतः इस दंड की वास्तविक भोक्ता वह स्वयं है. स्त्री को दंडित ना करने की परंपरा के चलते परशुरामजी ने युद्ध समाप्त कर दिया.

साथ ही भविष्य में किसी भी क्षत्रिय को शस्त्र शिक्षा प्रदान नहीं करने का वचन भी धारण कर लिया. स्वयं उनके द्वारा शस्त्र शिक्षा दिए जाने के कारण ही भीष्म इस प्रकार अजेय हो गए थे.

अतः भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति ना हो और इस कारण से धर्म की हानि ना हो इसलिए भगवान परशुराम ने क्षत्रियों को शस्त्र शिक्षा देना बंद कर दिया.

यह घटना यह सिद्ध करती है भगवान परशुराम पीड़ित एवं शोषित वर्ग के न्याय प्राप्ति के सर्व सुलभ विकल्प रहे है.

विश्व के श्रेष्ठ क्षत्रिय सदा परमवीर भगवान परशुराम का वंदन करते रहे है. आज के इस युग में भी देखें तो अक्सर अन्याय से पीड़ित आमजन उन्हें हृदय से याद करते हैं.

कड़ी निंदा वे भी करते थे लेकिन शस्त्रप्रयोग को उद्द्यत रहकर. भीष्म को दंडित नहीं कर पाने के कारण एवं अम्बा को पूर्ण न्याय न दिला पाने के कारण ही उन्होंने क्षत्रियों को शस्त्रज्ञान देने से मना कर दिया.

आज भी आप देख सकते है कि कैसे शक्तिप्राप्त कर्मणा क्षत्रिय अपनी शक्ति के दुरुपयोग के नित्य नवीन कीर्तिमान रच रहे हैं.

आज भारतभूमि को ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व को ऐसे परशुराम की आवश्यकता है जिसके एक हाथ में शास्त्र हो और एक में सक्षम शस्त्र, एक नेत्र में न्याय दृष्टि हो और एक नेत्र में प्रलय.

उनका सिद्धांत कि “दुष्टों को उचित दंड ना देना उनको पुरस्कृत करने के समान होता है” आज भी पूर्ण प्रासंगिक है.

शायद इसीलिए भगवान श्रीविष्णु के अवतारों की स्तुति करते हुए उनके लिए कहा जाता है –

जामदग्निम वरम ज्योतिर त्वं वन्दे जलशायीनमं।।

जय विष्णुवतार भार्गव परशुराम जी की।।

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