और कोई यदि तुम्हारा नाम पूछे, तो बेखौफ होकर कहना – ‘मैं शाहबानो हूँ’

मैं शाहबानो हूँ. लोग कहते हैं मैं मर चुकी हूँ …पर नहीं, मैं मर नहीं सकती… मेरा इंतकाम अभी पूरा नहीं हुआ है…. मेरे रूह को चैन तब मिलेगा जब मैं उन लोगों से बदला लूँगी जिन्होंने मुझ पर ज़ुल्म था जिंदा रहते.

मैं भारत में पैदा हुई थी, इसी देश की बेटी थी… हिन्दू या मुसलमान बनने का चुनाव मैंने नहीं किया था. अल्लाह के फज़ल से मैं मुसलमान के घर पैदा हुई थी …बड़ी हुई तो निकाह हुआ …अपने दीन ईमान पर चलते हुए मैंने अपने घर को सजाया सँवारा …शौहर और बच्चों में ही खुद की जिंदगी खपा दी.

साल 1978, मेरी उम्र ढल चुकी थी, हाथ पैर अब जवाब देने लगे थे, आँखों की रोशनी कम हो चुकी थी… उम्र के 62 वें पड़ाव पर थी तभी मेरी जिंदगी में वो तूफ़ान  आया जिसने जीते जी मुझे मार डाला. जिस वक्त मुझे मेरे शौहर की सख्त जरूरत थी, उन्होंने मुझे तीन बार तलाक कहकर घर से निकाल दिया था.

मेरी परवरिश कैसे होगी इतना भी ख्याल नहीं रखा उसने.

मैंने उससे आरजू की थी, हाथ जोड़े थे, जिंदा रहने के लिए पैसों की जरूरत थी, पर उसने यह कह कर इनकार कर दिया था कि इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं लिखा है.

फिर मुझे ख्याल आया कि मैं मुसलमान होने के अलावा एक हिन्दुस्तानी भी हूँ. मैं अपने हक के लिए सुप्रीम कोर्ट गई, मुझे कोर्ट पर यकीन था. सात सालों तक मैंने अपने हक की लड़ाई लड़ी. फैसला मेरे हक में आया. मैं जीत गई थी अपनी लड़ाई. मैंने इतिहास रचा था. मैं बहुत खुश थी कि अपनी कौम की बहनों के लिए मैंने बहुत बड़ा काम किया है.

पर ये क्या ?

जिस कौम पर मुझे इतना गुमान था वो मेरी जीत पर तूफ़ान खडा कर देगी, मैं सोच भी नहीं सकती थी.

कुरान और इस्लामिक आइनों का हवाला देकर पूरे मुल्क में बवंडर मचाया इन्होंने. वे हिन्दुस्तानी आइन की धज्जियाँ उड़ाने को बेकरार थे.

पर मैं निश्चिंत थी क्योंकि मुझे पता था कि दिल्ली में एक मजबूत सरकार है… इतनी मजबूत कि आजादी के बाद ऐसी मजबूत सरकार कभी नहीं बनी थी.

मुझे राजीव गांधी पर भरोसा था, भरोसा इस बात का कि इस्लामी शरियत को अपनी बपौती मानने वाले मुल्ले मौलवियों के सामने वे घुटने नहीं टेकेंगे.

पर हुआ इसके उलट.

नेहरू सल्तनत के उस वारिस ने कठमुल्लों और इस्लामिक संगठनों के दबाव में आकर मेरा भरोसा तोड़ दिया.

साल 1985, हिंदुस्तान के आईन को एक झटके में बदल कर रख दिया गया. सारी पोलिटिकल पार्टियों के मुँह पर ताला लग चुका था.

अब जो फैसला आया कोर्ट का वो मेरे खिलाफ था… मैं अपनी बाजी हार चुकी थी… मैं पूरी तरह से टूट गई… मेरी जिंदगी की लौ अब फड़फड़ाने लगी थी… मुझे गम सिर्फ इस बात का था कि मैं कुछ नहीं कर पायी अपनी बहनों के लिए …आधी मुस्लिम कौम के लिए.

पर हाँ … मैंने एक काम जरूर किया था …मैं अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाकर अल्लाह से कही थी कि – ” या अल्लाह ! मेरे परवरदीग़ार ! सुना है तेरी लाठी बेआवाज होती है… जिन लोगों ने मेरे साथ अन्याय किया है उन्हें सजा जरूर देना, इस्लाम को खतरे में बताने वाले झूठे और मक्कार लोगों के गुरूर को जरूर तोड़ना”.

मैं आज जिंदा नहीं हूँ, पर मैंने देखा था… उस घटना के बाद हिन्दुस्तान को बदलते हुए… एक नई तारीख लिखे जाने की कवायद शुरू हो चुकी थी.

कठमुल्लों के दबाव में जब सेकुलर कांग्रेस ने आईन बदली तो हिन्दुओं में प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी…

हिन्दू लामबंद होकर सरकारी फैसले का विरोध करने लगे…. बीजेपी ने इस मुद्दे को लपक लिया.

कांग्रेस को डर लगा कि हिन्दू वोटर कहीं दूर ना हो जाए तो उन्हें खुश करने के लिए राम मंदिर का ताला खुलवा दिया.

पर जैसे ही ताला खुला बीजेपी को एक और आइडिया आया… अब राम मंदिर के लिए आंदोलन शुरू हो गया… बाबरी मस्जिद ढहा दी गई… मेरे खिलाफ साजिश करने वाली सरकार की धीरे-धीरे मौत होने लगी …मेरे खिलाफ तूफान खड़ी करने वाली मेरी कौम का गुरूर टूट चुका था.

आज मैं जहाँ भी हूँ खुश हूँ …मैं देख रही हूँ हिन्दुस्तान को बदलते हुए …देख रही हूँ कि कैसे मेरी बहन बेटियाँ अब उन मुल्ले मौलवियों के मुँह पर तमाचा मार रही हैं जिन्होंने मुझे तिल तिल कर मरने को मजबूर किया था…

मैं देख रही हूँ एक सल्तनत की तबाही जिसने मुस्लिम वोट बैंक के लिए हम मुस्लिम औरतों के साथ अन्याय किया था…. मैं देख रही हूँ मजहब के ठेकेदारों को कि कैसे उनकी बोलती बंद हो चुकी है, उन्हें बगले झाँकते देखकर मेरे रूह को सुकून मिल रहा है ….

एक बार फिर मुझे हिन्दुस्तानी हुकूमत और कोर्ट पर यकीन हो चला है कि मेरे जीते जी जो नहीं हो पाया वो अब होने वाला है.

हिन्दुस्तानी सरकार का मुखिया जब सरेआम दहाड़ कर कहता है कि मैं इस मुल्क की मुस्लिम बहनों के साथ खड़ा हूँ तब सच कहती हूँ, मेरे कलेजे को ठंडक पहुँचती है. अल्लाह ने जैसे फरियाद सुन ली हो मेरी.

जिस चिनगारी को मैं हौले से फूँक मार मारकर जिंदा रखी थी… वो चिनगारी अब शोला बन चुकी है और मेरी फूँक एक ताकतवर तूफान.

आगे बढ़ो मेरी बहनों ….मेरी दुआएँ तुम्हारे साथ है. पर एक गुजारिश जरूर करूँगी – मुझे कभी भूल मत जाना, अपनी बड़ी बहन को जरूर याद रखना ….मैंने इतनी दुष्वारियों के बावजूद कभी भी हार नहीं मानी थी… इस बात के लिए थोड़ी तारीफ जरूर कर देना.

कभी भी तुम्हें ऐसा लगे कि तुम तूफानों में घिरने लगी हो… ज़माना तुम्हारे खिलाफ होने लगा है …तो घर से बाहर निकलना …डट कर मुकाबला करना ….और कोई यदि तुम्हारा नाम पूछे, तो बेखौफ होकर कहना … मैं शाहबानो हूँ.

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