…तब तक, कम से कम सैनिकों को मरने से बचाइए

कहने की घड़ियां रही नहीं, करने के क्षण हैं बचे शेष….
तू वकोध्यान क्यों लगा रहा, जब करना है, यह युद्ध शेष..

यह मैं बचपन से जानता हूं कि राजनीति का अंतिम लक्ष्य सत्ता होता है, माननीय प्रधानमंत्री जी!

इसके साथ लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि सत्ता हासिल करने के बाद आपकी अपने वोटर्स के प्रति ‘न्यूनतम ज़िम्मेदारी’ होती है.

आपकी सरकार को अरुण शौरी ने जब कांग्रेस+गाय कहा था, तो कई लोगों को बहुत गुस्सा आया था.

समय आ गया है कि आप अपने तीन साल के शासन का लेखा-जोखा करें और उस गु्स्से को ज़मीन पर उतारकर दिखाएं कि आप कांग्रेस का सुघड़ संस्करण मात्र नहीं हैं.

कश्मीर पर आप अपनी सरकारी ढुलमुल नीति को कसते क्यों नहीं? जवान क्या इसीलिए हैं कि वे कश्मीर में हरामखोर मोहम्मडन उग्रवादियों के थप्पड़ खाएं…

या इसलिए है कि आपके अचानक से सड़कों पर उतर जाने पर आपकी गाड़ी के पीछे, साथ और खड़े होकर दौड़ें, आपकी चिंता करें…

या फिर जवान इसके लिए हैं कि वे फारूक अब्दुल्ला एंड गिरोह जैसे हरामखोरों की सुरक्षा करें? या फिर, जवान इसलिए हैं कि अचानक ही किसी बम-धमाके में उड़ जाएं.

एक जवान बनने में कितना पसीना और खून बहता है, ये आपको पता है? अगर नहीं, तो पता कीजिए. आखिर, छत्तीसगढ़ में आपको यह खूनी खेल बंद करने से कौन रोक रहा है.

और, जनाब! यह भारतीय जनता है, जान लीजिए कि मुफ्तखोरी इसकी रग-रग में है. आप जिस तरह इसे नौकरी से, सब्सिडी से और हरामखोरी से वंचित कर एक नयी आर्थिक नीति लाना चाह रहे हैं, वह काम नहीं देगा.

वैसे भी, आर्थिक मोर्चे पर भी Tangible नतीज़े नहीं दिख रहे हैं, वे सब आपकी लंबी परियोजनाएं हैं और उनके नतीज़े आने में वक्त लगेगा.

तब तक, कम से कम सैनिकों को मरने से बचाइए….

राम मंदिर, धारा 370 और यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए 2019 के बहाने तो तैयार होंगे न आपके पास?

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