बस्तर, पुलिस व बलात्कार

विवेक उमराव, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया.

लेख लंबा है लेकिन पढ़ जरूर लीजिये, आखिर दुःख, गुस्सा, क्षोभ में आप भी हैं. हाथ जोड़ के निहोरा है, बिना पढ़े लाइक करने की औपचारिकता न करियेगा.

जिस समय मैं बस्तर रियलिटी चेक की सीरीज़ में कुछ पोस्टों को लिख रहा था, उस समय मेरी इच्छा हुई थी कि मैं बस्तर में पुलिस व बलात्कार के मुद्दे पर कुछ लिखूं.

लेकिन बस्तर के संदर्भ में जितना मैनीपुलेशन व तर्क की कंडिशनिंग की गईं हैं, जितना बस्तर की विशेषज्ञता व मानवाधिकार के स्वयंभू ठेकेदारों की दुकानदारी इत्यादि के अपने-अपने स्वार्थों, एजेंडों व विद्वता के अहंकारों के कारण विभिन्न स्तरों पर मैनीपुलेशन्स होते हैं. कि मैनीपुलेशन्स व भ्रामकताएं विभिन्न स्तरों पर स्थापित व प्रतिष्ठित होती चली जाती है. इसी तरह गति करते हुए बस्तर से जुड़े मुद्दों के लिए तथ्यात्मक संदर्भों के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं.

करेला ऊपर नीम चढ़ा यह कि लोगों की विद्वता व तार्किकता के भीषण अहंकार के आगे विवेकशील तर्कसंगत बात कहना असंभव हो जाता है.

सुकमा में माओवादियों द्वारा सुरक्षाबलों की हत्या किए जाने के बाद मुझे लगता है कि शायद मेरी बात को चंद लोग विवेकशील तर्कसंगतता से समझने का प्रयास करें. इस संभावना को देखते हुए यह लिख रहा हूं.

कारकों की बात करेंगें तो बात लंबी खिचती चली जाएगी, लंबी बात के लिए मेरी किताब पढ़ लीजिएगा. अभी प्रथम दृष्टया पहली बात यह समझिए कि बस्तर की पुलिस दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर, कोलकाता, मद्रास, लखनऊ, जयपुर, गुजरात आदि जैसे इलाकों की भी तुलना में आम लोगों के साथ तुलनात्मक बेहतर व्यवहार करती है. तुलनात्मक बेहतर नागरिक संबंधों के साथ काम करती है.

दूसरी फंडामेंटल बात यह कि बस्तर की पुलिस बलात्कार नहीं करती है. सौ प्रतिशत फूलप्रूफ तो कोई नहीं होता है, अपवाद स्वरूप छिपकर कभी कुछ हो जाता हो, ऐसी अपवाद बात अलग है. ऐसी घटनाओं को पुलिस के एजेंडे की बजाय बलात्कार करने वाले व्यक्ति की आपराधिक प्रवृत्ति के रूप में देखा जाना चाहिए.

मुख्यधारा के आम समाज में हजारों लाखों बलात्कार होते रहते हैं. पारिवारिक सदस्य बलात्कार करते रहते हैं. पिता द्वारा पुत्रियों का लगातार बलात्कार किए जाने की सैकड़ों घटनाएं होती रहती हैं. इसका मतलब यह नहीं कि भारत का प्रत्येक आदमी या पिता बलात्कार का एजेंडा रखता है.

लेकिन जिस तरह के बलात्कारों को मुद्दे बनाकर मानवाधिकार के हंगामे खड़े किए जाते हैं. सोशल मीडिया में सबूत तैराए जाते हैं. अदालतों में पुलिस को लताड़ लगाई जाती है. उस तरह के बलात्कार नहीं ही होते हैं.

अपवाद छोड़कर अधिकतर बलात्कार के आरोप जिन इलाकों से आते हैं वे माओवादी नियंत्रित इलाके होते हैं. माओवादी इलाकों का मतलब क्या है, कुछ यह भी समझ लिया जाए.

पिछले लगभग 25 वर्षों से भी अधिक समय से हर एक आदिवासी परिवार से 7 – 8 वर्ष जैसी छोटी सी उम्र के कम से कम एक बच्चा-बच्ची को माओवादी जबरन अपने शिक्षा केंद्रों व ट्रेनिंग के लिए ले जाते हैं.

ये आदिवासी बच्चे-बच्चियां माओवादी शिक्षा केंद्रों में जाने के पहले भी झोपड़ी में रहते हैं, महुआ बीनकर तेंदू पत्ता बीनकर चार पैसे कमाते हैं. कई-कई वर्षों तक माओवादी शिक्षाकेंद्रों में रहने के बाद भी वैसी ही झोपड़ियों में पूर्ववत स्तर में ही रहते हुए, महुआ, टोरा, तेंदू पत्ता इत्यादि बीनते हुए, मुर्गी-मुर्गा, सुअर इत्यादि पालते हुए, शराब बनाकर पीते हुए अपना जीवन जीते हैं.

ऐसा तो है नहीं कि इन बच्चों-बच्चियों को शिक्षित करके IIT, IIM, JNU या यूनिवर्सिटीज़ में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा जाता हो ताकि उच्च शिक्षा प्राप्त करके माओवादी विचार का प्रचार प्रसार कर सकें.

ऐसा भी नहीं है कि बस्तर के इन आदिवासी बच्चों को माओवाद की लीडरशिप सौंपी जाती हो. दिखावटी रूप से रखे जाने वाले इक्का-दुक्का अपवाद को छोड़कर माओवादियों की मुख्य लीडरशिप की स्थानीय लीडरशिप तक में भी बस्तर के आदिवासी नहीं होते हैं.

ठीक से लिखना पढ़ना तक नहीं आता है.

बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कई-कई वर्षों तक माओवादियों के शिक्षा केंद्रों में रहने के बावजूद आखिर ये बच्चे-बच्चियां सीखते क्या हैं. उनको सिखाया क्या जाता है, ट्रेनिंग क्या दी जाती है.

जो लोग रेशनल हैं वे आसानी से समझ सकते हैं कि लड़कियों को इन माओवादी शिक्षाकेंद्रों व कैंपों में किस प्रकार की शिक्षा व ट्रेनिंग दी जाती होगी.

पिछले लगभग 30 वर्षों में माओवादी प्रभावित गांवों के हर परिवार में माओवादियों के शिक्षा-केंद्रों से ट्रेनिंग पाए स्त्री पुरुष हैं. कल्पना कीजिए कि हर परिवार के कितने सदस्य होगें जिनको ट्रेन किया गया है लैंड माइन्स लगाने के लिए, झूठ बोलने के लिए, बलात्कार जैसे आरोप लगाने के लिए.

ट्रेनिंग पाए इन लोगों के द्वारा शारीरिक दाग, धब्बे, मारपीट इत्यादि ऐसा क्या है, जो प्रायोजित नहीं किया जाता या नहीं किया जा सकता है. जब भी पुलिस का दबाव अधिक पड़ने लगे तो बलात्कार का आरोप लगाकर मानवाधिकार के मुद्दों को प्रायोजित कर दीजिए.

यदि बलात्कार सच में हो तो उस पर कार्यवाही हो. लेकिन यदि पुलिस पर दबाव डालने के लिए माओवादियों का प्रायोजित प्रोपगेंडा हो, तो कितने भी ठोस सबूत हों, प्रायोजित प्रोपगेंडा से अप्रभावित रहने की जरूरत है.

चूंकि हर एक सूचना, क्रम से मैनीपुलेटेड ही प्लांट की गई है पिछले कई दशकों में. इसलिए क्या सच है क्या झूठ है, समझना असंभव सा हो जाता है. मैनीपुलेटेड सूचनाएं तथ्य बन गए, मैनीपुलेटेड तथ्य संदर्भ बन गए. यह श्रृंखला चलती रहती है.

इसलिए तथ्यों को समझने के लिए वस्तुनिष्ठता व वास्तविक धरातलीय समझ व दृष्टि का होना मूलभूत आवश्यकता है.

बहुत ऐसे लोग भी होते हैं जो बताते हैं कि वे फलाने गांव गए वहां महिलाओं से बात की. महिलाओं ने बताया कि उनके साथ पुलिस ने अत्याचार करते हुए बलात्कार किया. इन लोगों में से बहुत लोग तो झूठमूठ का ही बोल देते हैं ताकि उनकी बात में वजन रहे.

मान लीजिए इनमें से कुछ लोग, जो जाते भी हैं तो वे भी अचानक ऐसे कैसे किसी माओवादी क्षेत्र के आदिवासी गांव में पहुंच जाएंगे. किसी न किसी माध्यम से पहुंचेंगे. जो पहुंचाएगा क्या गारंटी है कि उसका अपना कोई एजेंडा नहीं होगा. इतनी सरलता से बिना बार-बार जाए, बिना महीनों-महीनों आदिवासियों के बीच रहे हुए वास्तविक परिस्थितियों व माइंडसेट को कैसे समझा जा सकता है.

मैं इन लोगों को ईश्वरीय अवतारों की कैटेगरी में रखता हूं, यह लोग इतने महान होते हैं कि इनकी महानता के आभामंडल से प्रभावित होकर माओवादी ट्रेनिंग पाए लोग व महिलाएं सत्य बोलने लगते हैं. वह भी पहली व दूसरी औपचारिक मुलाकात में ही.

मुझे मानवाधिकार के ठेकेदारों की तुलना में इस कैटेगरी के लोगों का विद्वता का अहंकार बस्तर की स्थितियों के लिए अधिक खतरनाक लगता है. क्योंकि ये लोग मैनीपुलेशन्स को, प्रायोजित झूठों को ठोस रूप में स्थापित करने में जाने-अनजाने में प्रयोग हो जाते हैं.

जिन इलाकों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की कंपनी की हत्या कर दी जाती हो. जिन इलाकों में हर परिवार में माओवादियों की ट्रेनिंग स्त्री-पुरुष मौजूद हैं. वहां पीठ पर भारी बैग लादकर कई-कई दिनों तक भीषण जंगलों में जान का जोखिम लेकर में चलते हुए, थोड़ी सी सनसनाहट की आवाज सुनकर चौकन्ने हो जाने की स्थितियों में बलात्कार संभव नहीं. पुलिस अपनी जान की चिंता करेगी या बलात्कार करेगी.

सुरक्षा बल जब माओवादी प्रभावित इलाकों में निकलते हैं तब आवश्यकतानुसार 50 से 200 या अधिक की संख्या में निकलते हैं. विभिन्न प्रकार का रैंक के लोग होते हैं. अधिकारी से लेकर सिपाही तक. यदि अधिकारी बलात्कार जैसी घटनाएं करवाएगा तो एक सिपाही कितना अनुशासन मानेगा. यह बताने की जरूरत नहीं.

पुलिस व सुरक्षा बलों की इस तरह के फोर्स में महिला नहीं होती हैं इसलिए आदिवासी महिलाओं की तलाशी पुरुष लेता है इस प्रक्रिया में होने वाली हाथापाई को भी बलात्कार के रूप में प्रायोजित किया जाता है.

लेकिन जब बस्तर में पुलिस के द्वारा गैंग रेप किए जाने वाली घटनाओं के बारे में सोशल मीडिया में व मानवाधिकार ठेकेदारों की बातें सुनिए तो यूं लगता है कि जैसे पुलिस का मतलब कुछ लफंगे हंसी-ठिठोली करते हुए निकले और किसी आदिवासी गांव में जाकर महिलाओं के साथ बलात्कार करने लगे.

नॉर्थ-ईस्ट व कश्मीर जैसे इलाकों तथा बस्तर की स्थितियों, सामाजिक ढांचों आदि में ज़मीन आसमान का अंतर है. नॉर्थ-ईस्ट व कश्मीर जैसे इलाकों की घटनाओं जैसी ही कल्पनाएं बस्तर के बारे में कर लेना तथ्यों व संदर्भों के मैनीपुलेशन को बढ़ावा देना ही है.

जिस तरह के विकास व शिक्षा के कार्य बस्तर मे चल रहे हैं. संभव ही नहीं हो सकते यदि पुलिस व नागरिक प्रशासन आदिवासियों का दिल नहीं जीतेंगे. माओवादियों की भड़भड़ाहट का कारण ही यही है कि पुलिस व नागरिक प्रशासन आदिवासियों का विश्वास अर्जित करते जा रहे हैं.

मैं यह नहीं कहना चाहता कि बस्तर पुलिस परफेक्ट है. मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि बस्तर का वास्तविक चेहरा समझने के लिए तथ्यों की वस्तुनिष्ठता सबसे अधिक आवश्यक है. मैनीपुलेटेड, प्रायोजित, प्लांटेड तथ्यों व संदर्भों से अप्रभावित रहने की जरूरत है.

जाने-अनजाने में बस्तर के आदिवासियों का जीवन नारकीय बनाने में सहयोगी न बनिए. पहले गंभीरता के साथ तथ्यों को परखिए. सही-गलत का विश्लेषण कीजिए, मानवीय संवेदना को मिश्रित कीजिए, फिर किसी प्रोपगेंडा आदि का हिस्सा बनिए.

कुछ बातें बिलकुल गांठ बांध लीजिए. बस्तर का आदिवासी हिंसक नहीं है. बस्तर का आदिवासी माओवाद का ककहरा नहीं जानता. बस्तर में माओवाद पहले आया, पुलिस बाद में आई. बस्तर में आदिवासी परंपराओं, घोटुल, नृत्य, संगीत इत्यादि को विलुप्त करने में माओवादियों का प्रमुख योगदान रहा है. बस्तर माओवादियों के लिए रणनीतिक रूप से सबसे अधिक महत्वपूर्ण है.

चलते-चलते :

यदि आप अर्थशास्त्र, साम्यवाद व माओवाद के रटे-रटाए सिद्धांतों, तर्कों आदि से बस्तर की स्थितियों को समझना चाहते हैं तो बेहतर है कि आप न समझें. बिना दृष्टि व ईमानदारी के समझ में आना ही नहीं. आपका विद्वता का अहंकार भले ही तुष्ट होता रहे.

यह आपको तय करना है कि आप कन्फ्लिक्ट रिज़ोल्यूशन के प्रयासों के साथ खड़े हैं या नहीं. जैसा समाज होगा, जैसे नौकरशाह होंगे, जैसे नेता होंगे, जैसे विद्वान होंगे, जैसे समाज के लोग होंगे. कान्फ्लिक्ट रिज़ोल्यूशन का तानाबाना भी वैसा ही होगा.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY