राजनीति तो वह स्कूल है जहाँ इस साल के टॉपर को अगले साल फेल होने का दस्तूर ही है

1986 की बात है… मैट्रिक की परीक्षा दी थी. परीक्षा के बाद इस खुमारी में थे कि मैंने कितनी मेहनत की है… कितनी पढ़ाई लिखाई की है, कितनी रातें सोया नहीं हूँ, कितने किले फतह किये हैं. तो थोड़ा सुस्ताना बनता है… तो खेलना-कूदना, घूमना-फिरना, नॉवेल कहानियां पढ़ना हक़ से किया.

फिर रिजल्ट आ गए… जैसी की उम्मीद थी, स्कूल में टॉप कर गए. पटना यूनिवर्सिटी में जैसे तैसे एडमिशन ले लिया… सिंदरी जैसी छोटी सी जगह से निकलने की, कुछ और देखने की कसमसाहट थी…वह पूरी हुई. सिंदरी से निकल कर पटना पहुंचने पर जो विराट की अनुभूति हुई थी, वह बाद में कलकत्ता-मुम्बई या लंदन-पेरिस देखने पर भी नहीं हुई…

पर जो खुमारी थी वह नहीं गयी. कॉलेज जाना, घर आना, गांधी मैदान के पास या अशोक राजपथ के किनारे पुरानी किताबों की दुकाने खंगालना, पटना मार्किट में घूमना, सेंट जोसफ और पटना कॉलेज के सामने लड़कियाँ देखना…

समय बीतता गया, खुमारी नहीं उतरी. 1986 का 87 हो गया… होली की छुट्टी, गर्मी की छुट्टी, दशहरे, दीवाली, छठ की छुट्टी… हर छुट्टी में सिंदरी आता, दोस्तों के साथ गली गली घूमता, प्रियदर्शिनी पार्क में अड्डे लगाता, कल्याण केंद्र के जिम में लोहा उठाता, बास्केटबॉल, टेबल टेनिस खेलता समय बीत रहा था.

सुबह पिताजी के ड्यूटी जाने के बाद अड्डा लगाने निकल जाता. लौटता तो दोपहर का खाना खाकर सो जाता. शाम को उठकर घूमने निकल जाता… लौटता अंधेरा होने पर… थोड़ी देर कोई किताब लेकर बैठने का नाटक करता, फिर रात का खाना खाकर टहलने निकल जाता. रात ग्यारह, साढ़े-ग्यारह तक किसी पुलिया पर अड्डा लगता… लौट कर सोने से पहले कोई उपन्यास उठा कर बिस्तर पर चला जाता…

सुख चैन से दिन कट रहे थे… नवंबर का महीना बीत गया. 1987… छठ की छुट्टियों के बाद वापस कॉलेज खुलने का समय आ गया. वापस जाने वाला था, कि एक दिन बड़े भैया ने बिठाया और हड़काया… राजू, मैंने ऐसे कई लड़के देखे हैं जो मैट्रिक में टॉप करते हैं और उसके बाद इंटरमीडिएट में फेल कर जाते हैं… अगर तुम्हारे साथ ऐसा हुआ तो यह पहली बार नहीं होगा. तुम्हारे लक्षण पढ़ने वाले बच्चे के तो बिल्कुल नहीं हैं… इज्जत बचानी है तो जाग जाओ…

मैंने किसी तरह से तमतमा कर अपनी अकड़ बचाई… वहाँ से हटा तो फिर समय का हिसाब लगाया. नवंबर आ गया था. अगले साल मार्च-अप्रैल में यूनिवर्सिटी की परीक्षाएं होनी थी. यानि कुल 4-5 महीने थे… पहाड़ जैसा 2 साल का कोर्स था, जिसमें से पढ़ा कुछ भी नहीं था…

तो जरा जरा सी आँख खुली… जैसे तैसे हिम्मत और अक्ल जुटाई और फोकस करने का काम शुरू किया और किसी तरह से अगले साल इज्जत बचाने भर नंबर जुटाए… अगर उस दिन भैया ने वह झटका नहीं दिया होता ना, तो कसम से, सचमुच फेल कर गया होता…

मैं कहानियाँ सुनाता हूँ, पर यूँ ही नहीं सुनाता. जब अपने बेटे को बारहवीं में यूँ ही समय बर्बाद करते और लंदन के मजे लेते देखा तो बिठा कर एक दिन यही कहानी सुनाई… बेटा! जाग जा… हवा में मत उड़… घड़ी और कैलेंडर पर नज़र डाल, सिलेबस और कोर्स पर नज़र दौड़ा… नहीं तो मुंह के बल गिरेगा…

मन करता है, एक दिन मोदी जी को बिठा कर यही सुनाऊँ और समझाऊं… आप बहुत तोप स्टूडेंट हैं… पर पिछले एग्जाम में टॉप करने की खुमारी से बाहर निकलिये. दुनिया घूमना, मैडिसन स्क्वायर और वेम्बले के चौराहे पर अड्डा लगाना बहुत हुआ…

आबे शिंजो और ओबामा के साथ गप्पें हांकना खूब किया… टॉयलेट सफाई से लेकर मन की बात भी हुई… बीच बीच में जागे तो एकाध सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी का चैप्टर भर पढ़ा है… पर सिलेबस पर नज़र दौड़ाइये… बहुत कोर्स बाकी है…

ये नक्सली, काश्मीरी-बंगाली जिहादी, जेएनयू और लाल झंडे वाले गुंडे, मीडिया-माफिया और सुप्रीम कोर्ट में फन काढ़े बहुत से साँप बैठे हैं… ये सब भी हैं सिलेबस में.. और इंटरनल सिक्योरिटी कंपल्सरी पेपर है, जिसमें आप पास होते नज़र नहीं आ रहे…

यह विकास गेस पेपर छोड़ कर जरा सचमुच की कोर्स की किताबें उठाइये… नहीं तो फेल होते समय नहीं लगेगा… और राजनीति तो वह स्कूल है जहाँ इस साल के टॉपर को अगले साल फेल होने का दस्तूर ही है… और कुछ नहीं तो बड़े भाई अटल जी का मार्क्स-शीट ही देख लीजिए…

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