फिर फन काढ़ रहा है नाग, कौन तोड़ेगा इसका विषदंत!

अभी अग्निवेश को ज़रा सा ही देख पाया एक चैनल पर. एंकर ने जिस तरह कन्क्लूड किया और जैसा रिकॉर्ड रहा है अग्निवेश का, उससे यह समझ में आया था कि यही पाखंडी आया था अभी नक्सल प्रवक्ता बन कर.

मुझे याद आ रहे हैं जंतर मंतर के दिन. दंतेवाडा से लाल सलाम का नारा लगा कर वापस दिल्ली आया था अग्निवेश और तब अन्ना के आन्दोलन का एकमात्र चेहरा जैसा बना हुआ था. तो ऐसे ही एक दिन एक मित्र के साथ पहुच गया था जंतर-मंतर.

संयोग से उसी हफ्ते इस कथित स्वामी पर पाञ्चजन्य में अपनी कवर स्टोरी थी जिसमें काफी मेहनत से कुछ तथ्य जुटाए थे हमने, मसलन अग्निवेश इसाई है. भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन की अगुवाई करने वाला यह शख्स खुद आर्य समाज से आर्थिक गबन के आरोप में निकाला जा चुका है.

जिस आर्य समाज के नाम पर यह अपनी रोटी कमाता है, उस आर्य समाज से इसका कोई संबंध ही नहीं है, आदि-आदि.

निजी गारंटी देने पर कि कोई भी तथ्य ग़लत निकला तो उसकी लेखक के तौर पर सम्पूर्ण जिम्मेदारी मेरी होगी, तब के सम्पादक बलदेव भाई शर्मा जी ने छापा था उस स्टोरी को. काफी चर्चा हुई, इन्डियन एक्सप्रेस तक ने उस पर रिव्यू छापा था. खैर.

तो आन्दोलन के चेहरे के तौर पर चैनल-चैनल घूम कर वहां अग्निवेश बाईट दे रहे थे. उन तमाम कैमरों के सामने ही अपन ने पकड़ा वहां और चिल्ला-चिल्ला कर सवाल पूछने लगा उससे.

लाल सलाम बोल कर वह इस आन्दोलन में क्या करने आये हैं? इसाई होकर भगवा वस्त्र पहन कर आखिर क्यों घूम रहा है यहां? खुद गबन का आरोपी आखिर अन्ना साहब को क्यूँ बदनाम कर रहा है?

किसी तरह जवाब देते-देते भाग खडा हुआ था अग्निवेश. उसके बाद चिल्ला-चिल्ला कर वहीं अन्ना हजारे जी तक अपन ने बात पहुचाने की कोशिश की कि इस कमीने को निकाला जाए जंतर मन्तर से.

दर्ज़नों पत्रकारों और कैमरों के बीच यह घटना हुई. पुलिस वाले भी काफी आ गए थे. मुझे पता ही नहीं था कि राष्ट्रवादी लोग बड़ी संख्या में उस आन्दोलन से जुड़े हैं लेकिन अग्निवेश के भीतरघात से वे सारे परेशान हैं.

उन सबका समर्थन मिला तो वहां मौजूद आतंकियों की हिम्मत भी नहीं हुई अपने को छूने की, लेकिन हाय रे पत्रकारिता. हाथ जोड़-जोड़ कर सभी पत्रकारों को बताते रहा कि आप सबको इसे भी कवर करना चाहिए. सबने एक सिरे से मना कर दिया था.

कुछ परिचित-मित्र पत्रकारों ने तो साफ़-साफ़ कहा कि समूची मीडिया ने यह तय किया हुआ है कि आन्दोलन को पूरा समर्थन देना है और कोई भी निगेटिव न्यूज़ कवर नहीं करना है.

कुछ ने तो यह भी बताया कि ‘भूख हड़ताल’ पर बैठे कुछ वामियों को मंच के पीछे खाते-पीते भी देखते हैं वे लोग, लेकिन उसे कवर नहीं कर सकते. एजेंडा सेटिंग का बदतरीन उदाहरण थी वह घटना. खैर.

अग्निवेश की ताबूत में कीलों का पड़ना ऐसे ही शुरू हो चुका था. अंतिम कील थी जब कपिल सिब्बल से सौदा करते हुए वह रंगे हाथ पकड़ा गया.

उसके बाद अन्ना ने भी निकाला उसे और नक्सल मामले में भी इसकी दलाली ज़रा खत्म हुई थी. अब फिर से यह नाग अपना फन काढना शुरू कर चुका है. पता नहीं इस बार इसका विषदंत कौन तोड़ेगा.

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