धर्म और अधर्म के बीच युद्ध में कुरुक्षेत्र ही सर्वोच्च तीर्थ

बजने दो अब रणभेरी
तुम रणचंडी का आह्वान करो

दुष्टदलन को सज्जित होकर
काल भैरव का स्तुतगान करो

मत गिनो मृत्यु के कौरों को अब
समर प्रासंगिक गीता का सम्मान करो

गांडीव उठाओ पार्थ प्रथम अब
स्थगित विकास के सोपान करो

बुद्ध महावीर को भूलो कुछ दिन
बन महाकाल खल प्राण हरो

करो चिता भस्म से श्रृंगार अरि का
समर भयंकर धनु पिनाक से शरसंधान करो

खोलो त्रिनेत्र अब तांडव करो हर
चण्डिके अब हो प्रसन्न यथेष्ट रक्तपान करो

हिन्दू हृदय की सहज सौम्यता त्यागो
शोकरहित हो रक्षकों में अभिमान भरो

जा डटो वीर भूमि में कुछ दिन
सकल सैन्य संस्थानों में जान भरो

व्याकुल पाञ्चजन्य अब वायु मांगे
शक्ति साधना अपरिहार्य अब ध्यान धरो

वाणी से नहीं फलता पौरुष
भव रणधीर अब रिपुदमन के अभियान करो

पुष्प नही होते अभीष्ट उत्सर्गियों को
अथाह अरि शोणित से उनका पिंडदान करो

हर वस्तु अवलंबित है कालगति पर
सृजन, विकास तज रणभूमि को प्रस्थान करो

धरो कवच आभूषण तजकर नयनों में अब क्रोध भरो
किस उलझन में पड़े हो राजन! तत्काल कटि कृपाण धरो।।

“जब धर्म और अधर्म के बीच युद्ध हो रहा हो तब कुरुक्षेत्र ही सर्वोच्च तीर्थ होता है भ्राता बलभद्र.”

(योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दुर्योधन वध के समय बलराम जी से कहे गए अमर शब्द)

सुकमा के अमर प्राणोत्सर्गियो को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि.

इस आशा के साथ कि “नरेंद्र” उनका पिंडदान शत्रुओं के धारोष्ण लहू से करेंगे.

जय जवान, जय किसान

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