कर्तव्य पथ में जो मिले, यह भी सही, वह भी सही…

कल नक्सली हमले में जवान मारे गए… हम हाय-हाय कर रहे हैं. कल सरकार 10 नक्सलियों को मार गिराएगी… हम वाह-वाह करते इंची टेप लेकर सीना नापने लगेंगे.

परसों 4 बुद्धिजीवी, गरीब आदिवासियों पर अत्याचार का रोना टीवी पर परोसेंगे… हम फिर आंसू बहाएंगे… फिर मी लॉर्ड एक फरमान जारी कर देंगे… संविधान को देश का धर्मग्रंथ मानने वाले प्रधानमंत्री सज्जनता से सर झुका देंगे…

साल भर पहले कश्मीर में फौज पर आतंकी हमले का जवाब दिया गया पाकिस्तान में घुस कर की गई सर्जिकल स्ट्राइक से. खूब वाह-वाह हुई… हमारी फौज ने सिद्ध कर दिया कि हम क्या कर सकते हैं…

फिर सवाल उठता है कि जब हम यह कर सकते हैं तो करते क्यों नहीं? जब हमारे फौजी जान मुट्ठी में लेकर सीमा पार जाकर दुश्मन को धूल चटा सकते हैं तो फिर बेशर्मों की तरह निहत्थे लुच्चे जिहादियों से थप्पड़ क्यों खा रहे हैं?

क्योंकि आतंकवाद का मुँहतोड़ जवाब देना हमारी पालिसी का अंग नहीं है. कल गालियाँ पड़ी तो आज हरकत में आये… फिर तालियाँ बजीं तो मगन हो गए… काम हो गया…

किसी निर्णय के मूल में परिणाम नहीं है, तारीफ लेने का लालच है… कभी अपने समर्थकों से, कभी मीडिया से, कभी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से.

तो अगर तारीफ का लालच है तो आलोचना का भय भी होना स्वाभाविक ही है… यह व्यवहार वयस्क परिपक्वता नहीं दिखाता. यह स्कूली बच्चों का व्यवहार है.

नहीं, इस बार इक्का-दुक्का कार्रवाई पर ताली बजाने से बचें. सरकार को सिद्ध करने दें कि पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक करके आपने जो दम दिखाया था, वह आपकी सुरक्षा नीति का भाग है.

आप सक्षम हैं और देश की आंतरिक सुरक्षा के प्रश्न पर सजग हैं… समर्थकों की तालियों और आलोचकों की गालियों से पेड़ के पत्तों की तरह हिलने डुलने वालों में नहीं हैं..

देश भूला नहीं है आपके उद्गारों को… देश नहीं झुकने दूंगा…

और कुछ याद करना है तो वाजपेयी जी के ये शब्द भी याद करने लायक हैं…

कर्तव्य पथ में जो मिले
यह भी सही, वह भी सही…

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