युद्धं देहि, एक के बदले सौ…

हमारे यहां समस्या यह है कि लोगों ने कुछ पढ़ा ही नहीं है. रामायण-महाभारत छोड़िए, ढंग से अगर पुराणों को पढ़ लें, तो कल्याण हो जाता. खैर, एक कहानी सुनिए.

रघुकुल के एक प्रतापी राजा हुए – मरुत. त्रिलोक को जीत लिया साहब उन्होंने. तो, बेटे जब बड़े हुए उनके, एक से एक लंठ, दुर्द्धर्ष योद्धा, अपराजेय सेनापति, तो उनके जीतने के लिए कुछ रहा ही नहीं. अब, आज की ही पीढ़ी को दोष मत दीजिए. नालायक बेटे हरेक युग में हुए हैं.

नालायकों ने पिता पर ही तलवार तान दी. कहा- युद्धं देहि. बाप ने हंसकर पूछा, ये क्या नालायकी है बे?

सबसे छोटे पुत्र यानी नालायक ने जवाब दिया, ‘पिताजी पूरी दुनिया तो आपने जीत ली. हमारे लिए अब कुछ बचा तो है नहीं, तो युद्ध दीजिए, आप ही हमें.’

पिता तो पिता ठहरे. मुस्कुराते हुए कहा, ‘अरे भद्र. मुझ बूढ़े से क्या युद्ध करोगे, जाओ इंद्र के पास. उसके पास हमारा तीन महीने का लगान पड़ा है. बदमाश है इंद्र. जाओ उसी से युद्ध लो और जीत कर आओ.’

चारों सपूत चढ़ दौड़े इंद्रासन पर. अब इंद्र कभी जीतते तो हैं नहीं, तो यहां भी हार गए. हार के बाद चारों विजेताओं का सम्मान किया.

फिर कहा, ‘अरे बाबा लोग, जीत तो गए ही हो तुम. तो, हमारा जो सुमेरु पर्वत है, वह एक तरह से टैली के काम आता है. उस पर इंद्रासन को जीतने वाले विजेताओं का नाम गोद देते हैं, तो आप लोग भी जाइए, वहां अपना नाम गोद आइए.’

चारों राजकुमार काफी उत्साह में गए, सुमेरु के पास. सुमेरु अब देवलोक का पर्वत है, तो सोच लीजिए कितना ऊंचा और विशाल .होगा.

पर, ये क्या? उन्होंने देखा कि जौ रखने की भी जगह खाली नहीं है वहां. चौंककर इंद्र से पूछा तो इंद्र खिलखिला दिए, बोले कि अपने पिता से टक्कर लेने चले थे. यहां देख लो, इंद्र पर कोई पहली बार विजय नहीं पायी तुमने. तुम्हारे पिता तो तीन बार मुझे जीत चुके हैं. तुमने युद्ध मांगा, तो पिता ने तुम्हें दे दिया.

चारों पुत्रों को समझ आयी, जाकर शस्त्र पिता के चरणों .में रख दिए.

आदरणीय मोदीजी, राजनाथ जी!

नक्सली वही उद्दंड राजकुमार हैं. वे हत्यारे हैं, हमारे भाई-बहन नहीं. उन्होंने आपसे युद्ध मांगा है. उन्हें युद्ध दीजिए.

एक जवान के बदले कम से कम 100 सिर… एक जवान के बदले कम से कम 100 नक्सली… युद्धं देहि. युद्धं देहि.. युद्धं देहि….

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