क्या सरकार को यह अक्ल नहीं है कि कल यही इतिहास बनेगा?

तमिल नाडु से आये ‘किसानों’ के बारे में सरकार का मीडिया असफल रहा है. कैसे, यह समझ लेते हैं.

वैसे आप सब ने रंजय त्रिपाठी जी का खोजपूर्ण लेख पढ़ा ही होगा. मैंने भी शेयर किया है. उस लेख पर मुझे एक हिन्दू नामधारक जनाब कह गए कि मेरा जमीर मरा है और लानत भेज गए. आत्मा मरी है और शर्म आनी चाहिए नहीं कहा, बाकी आप समझ गए होंगे. लेकिन बात कुछ और करनी है इस लेख में.

जब पता था कि यह नौटंकी चलनेवाली है तब सरकार द्वारा इसका मीडिया में प्रभावी काउंटर मैनेजमेंट होना जरुरी था. इनके ऊपर 24 घंटे कैमरा तैनात हो जाता तो सभी बातें रिकॉर्ड हो जाती, अपने आप प्रूफ मिल जाता.

सूचना प्रसारण मंत्री प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर कवरेज दिखाते, और कवरेज के आधार पर उन तथाकथित किसानों से पुलिस से पूछताछ भी कराते तो मीडिया को मंत्री जी की प्रेस कांफ्रेंस झख मारकर कवर करनी ही पड़ती, इन तथाकथित किसानों के नेताओं के नाम भी लेते तो उन्हें सामने आना पड़ता. वे बचाव की मुद्रा में आ जाते.

आज यह समझ लें कि सरकार की भूमिका सोशल मीडिया पर ही राष्ट्रवादियों द्वारा रखी जा रही है. राष्ट्रवादी हैं उन्हें भी भाजपा के समर्थक होने का तमगा दिया जा रहा है और वो भी काफी अपमानास्पद ढंग से. यह बात सही नहीं है.

सरकार को यह पता होना चाहिए कि मीडिया में इस मुद्दे को सही ढंग से रखने में किसी को रस नहीं है, हर कोई इन तथाकथित किसानों के वीभत्स तस्वीरों को ही छापेगा.

कोई मीडिया यह सवाल नहीं उठा रहा कि भाई उपोषण तो आप के पहले भी कई लोग कर चुके हैं, यह वीभत्स प्रकार करके आप क्या हासिल करना चाह रहे हैं?

और प्रोसीजर का मुद्दा तो किसी मीडियावाले को उठाना ही नहीं है कि यह राज्य का मुद्दा है तो यह अनशन चेन्नई में क्यों नहीं हो रहा या फिर चेन्नई में आप ने इसकी क्या फ़रियाद की है.

क्या सरकार को यह अक्ल नहीं है कि कल यही इतिहास बनेगा?

यहाँ सरकार से मेरे मायने हैं सूचना और प्रशासन मंत्रालय के अधिकारियों से. मंत्री बदलते हैं, विभाग का प्रशासनिक ढांचा नहीं. नदिया का पानी बहता जाता है, घाट के पत्थर वहीँ रहते हैं.

क्यों नहीं ये सरकार को सजग करते, क्यों नहीं ये मीडिया के एकतरफा कवरेज का सामना करते? क्या सरकार के प्रति इनकी निष्ठा नहीं है? यहाँ मैं सरकार के प्रति निष्ठा की बात कर रहा हूँ, भाजपा के प्रति नहीं.

क्या पहले सरकार की इतनी भद्द पिटने देते थे ये लोग? तो क्या इनकी निष्ठा सरकार से न हो कर किसी और से है, जो ये इस सरकार की निरंतर भद्द पिटने दे रहे हैं?

अगर गृह मंत्रालय और सूचना प्रसारण मंत्रालय चाहते तो इनकी धज्जियां उड़ा सकते थे. आज ये मीडिया में छा जाने से क्या होगा आप ने सोचा है? आप को भले लगता होगा कि आप ने सोशल मीडिया में इनकी पोल खोल दी, लेकिन मीडिया के एकतरफा दुष्प्रचार का परिणाम महिलाओं पर होगा, युवा वर्ग पर होगा जिनमें वामी इसको प्रचारित करने से शिद्दत से लगे हैं.

आप देखिये, अब इनका रुख ये है कि कम से कम चूहे खाने का, मूत्र पीने का आदि जो उपक्रम इन तथाकथित किसानों ने किया है, उसके लिए तो वे सहानुभूति के हक़दार हैं. और यह रुख सोशल मीडिया पर है जहाँ राष्ट्रवादियों की कुछ पैठ है.

राष्ट्रवादी खुद से पूछे, क्या महिलाएं और युवा-युवतियां आप के साथ है या उन्हें वामिस्लामी शेरो-शायरी तथा कथा कहानियाँ ज्यादा पसंद है? क्या आप के स्त्री सहकर्मी या सहपाठी राष्ट्रवाद पर चर्चा करती हैं या उनके नजर में ईश्वरल्लाइसा एक ही है? क्या वे इस को गहराई से जानने की इच्छा रखती भी हैं या यह फर्क को जानना भी नफ़रत फैलाना समझती हैं?

सोचिये, उन पर यह एकतरफा दुष्प्रचार का क्या असर होगा? जब दो-चार दिनों में मीडिया कवरेज पर से यह मुद्दा हटेगा तब यह मुद्दा वामियों की प्रचार पुस्तिकाओं और पत्रिकाओं में आयेगा जरुर.

आज ही एक फोटो देखा, कोई तमिल लड़का तमिलनाडु का सपोर्ट कश्मीरी अलगाववादियों को जाहिर कर रहा था. उसके हाथ में पकडे बोर्ड पर लिखे शब्दों से उसकी वामी सोच साफ़ दिख रही थी. कितनी छात्राओं को यह दिमागी जहर खिलाया जाएगा?

ये फेल्युअर रहा है इस बात पर आप सहमत होंगे और मैं कहूँ कि यह मोदी सरकार का फेल्युअर रहा है तो आप उस बात से भी सहमत होंगे, पूरे जोश से, क्या नहीं? क्योंकि आप फेल्युअर का दोष भी मोदी सरकार याने मोदी जी को ही दे रहे है, राईट?

शायद आप को याद होगा, एक मिनट पहले आप ने इसी पोस्ट के छठे पैराग्राफ में स्पष्ट पढ़ा था कि मैं इसका असली दोषी किसे मानता हूँ. आप यहीं से ऊपर गिनेंगे तो पांचवा पैराग्राफ है, जरा शांति से पढियेगा.

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