राष्ट्रगान पर आपत्ति यानी अलग राष्ट्रगान और फिर अलग राष्ट्र की तैयारी!

टीवी पर बहस के बीच अंसार रजा बड़ी बेबाकी के साथ कहते हैं कि हम नहीं बोलेंगे वंदे मातरम्. राष्ट्रगान के बीच में आने वाले “भारत भाग्य विधाता” से भी उन्हें आपत्ति है.

वैसे यह आपत्ति उन्हें इसलिये है क्योंकि उनका मजहब उन्हें इसकी इजाजत नहीं देता. यह बात अलग है कि उसी बहस में शामिल दो अन्य मुसलमानों को इससे कोई आपत्ति नहीं है. इस पर अंसार रजा उन्हें मुस्लिम कौम से ही खारिज करते नजर आने लगते हैं.

इस मसले पर कुछ कहने से पहले इतिहास में जाना जरुरी हो जाता है. क्योंकि वंदे मातरम् वह नारा है जो हिन्दुस्तान की आजादी के आन्दोलन से जुड़ा रहा है. आजादी की लड़ाई और उसके बाद मिली आजादी के बीच हिन्दुस्तान विभाजित होकर पाकिस्तान को बनने देता है.

पाकिस्तान के जन्म का मूल कारण क्या है? इसका जवाब खोजा जाय तो वह सारी बातें सामने आती हैं जो पाकिस्तान को आज एक इस्लामिक राष्ट्र बनाये हुये हैं. यह सच है कि विभाजन के समय जमीनों का बटवारा हुआ, अवाम का नहीं.

मतलब उस समय लोगों को पूरी छूट दी गयी कि मजहब के नाम पर बने एक अलग राष्ट्र पाकिस्तान में अपनी आस्था रखने वाले लोग वहां जा सकते हैं. बहुत सारे लोग गये भी, लेकिन जिन लोगों ने उस दौर में भारत में अपनी आस्था रखी, वह यहीं रह गये.

बाद के हालात में पाकिस्तान एक मुस्लिम देश, तो भारत एक पंथनिरपेक्ष राष्ट्र के रुप में आगे बढ़ा, जोकि आजादी के साथ हुये विभाजन के समय से ही तय माना जा रहा था.

पचास सालों तक भारत में इन नारों से किसी को कोई आपत्ति नजर नहीं आयी. लेकिन जब विभाजन के बाद की दूसरी तथा तीसरी पौध समाज में पलने लगी तो इन नारों पर आपत्ति की सुगबुगाहट सुनाई देने लगी है.

वैसे तो ये लोग अभी भी मुट्ठी भर ही हैं. लेकिन विभाजन का इतिहास हमें बताता है कि शुरुआती दौर में जिन्ना और उनके समर्थक भी मुट्ठी भर ही थे.

उनकी लगातार बढ़ रही मांगों और उनकी पूर्ति का नतीजा आज पूरा देश देख चुका है. फिर आज के दौर में यह थोड़ी सी सुगबुगाहट भी क्यों बर्दाश्त कर ली जाय?

आज कुछ शब्दों और वाक्यों पर जिन्हें आपत्ति है वह कल अपने मजहब का हवाला देकर पूरे राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का विरोध करेंगे. उसके बाद इन्हें इस देश की अस्मिता से जुड़ी चीजों पर आपत्ति नजर आयेगी.

अभी हाल ही में बाबा साहब की मूर्ति को मजहब के नाम पर क्षति पंहुचाने का मामला सामने आ चुका है. फिर वह दिन भी दूर नहीं जब इन लोगों द्वारा अपने लिये अलग से राष्ट्रगान बनाये जाने की मांग भी उठने लगे. इसके बाद अलग राष्ट्र की मांग का रास्ता इनके लिये स्वत: ही खुल जायेगा.

हमारे यहां घरों के उपर पक्षियों के बीट के साथ कभी कभार पीपल या बरगद के बीज घरों की दिवारों और छतों पर छोड़ दिये जाते हैं. अनुकूल मौसम में वह बीज अंकुरित होते हैं और उनमें से पौधे निकलने लगते हैं.

कोई कितना भी प्रकृति प्रेमी हो, अपने घर की दीवारों और छतों पर बढ़ रहे इन पौधों को देखकर छोड़ता नहीं है.

उसे पता होता है कि यह पौधा भविष्य में उसके घर के लिये बड़ी मुसीबत बन सकता है. लिहाजा वह तत्काल जतन करके उसे उखाड़ फेकता है और उसकी जड़े दोबारा न बढ़े इसके लिये उस पर चूने का लेप भी लगा देता है.

फिर आज हम अपने देश के अंदर इस तरह के विरोधों को बढ़ते हुये क्यों देखते रहते हैं? क्या इन्हें इनकी शैशवावस्था में ही उखाड़कर फेंक नहीं देना चाहिये?

सरकारों और अदालतों पर इस मसले पर कड़े कानून बनाने चाहिये जिससे न सिर्फ ये पौधे उखड़ जाएं बल्कि इनपर चूने का लेप भी लग जाय जिससे दोबारा इनके पनपने का कोई खतरा न रहे.

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