क्या आपको पता है जनता क्यों नफरत करने लगी है आप जैसों से!

रामचंद्र गुहा का कश्मीर पर लेख पढ़ा. इसलिए नहीं कि इन्हें पढ़ना पसंद करता हूँ बल्कि इसलिए की कोई ‘हमारे कश्मीर’ के बारे में लिख रहा है तो एक जागरूक नागरिक होने के नाते पता होना चाहिए कि क्या-क्या लिखा जा रहा है.

इस लेख में गुहा ने हमें ‘हिंदुत्व का साइबर योद्धा’ कह कर सम्बोधित किया. बड़ा मजा आया. यह लिखना यह दर्शाता है कि इन योद्धाओं ने इनकी नींद खराब की है और इन लोगों की दुकान बंद कर दी है.

वैसे हम भी एक नाम देते हैं इन जैसे लोगों को “आतंकवाद के स्लीपर सेल”. कैसा लगा नया नाम? यहाँ मैं उस धर्म का नाम जानबूझ कर नहीं लिख रहा क्योंकि आतंक का धर्म आप लोगों को नहीं दिखता जबकि पूरी दुनिया जानती है.

और यही कारण है जो दुनिया के सामने आप लोगों के चेहरे बेनकाब हो गए. और आप लोगों के चेहरों से दुनिया इतनी नफरत करती है कि पिछले हफ्ते जब मैंने राजदीप सरदेसाई के एक लेख के जवाब में पोस्ट लिखी और उसमें सरदेसाई के लेख का लिंक लगाया तो उनकी फोटो भी साथ आ कर पोस्ट हो गई. जिसे देख कर मेरे कई मित्रों ने यह प्रतिक्रिया दी थी कि यह फोटो आप के फेसबुक वॉल पर अच्छी नहीं लग रही.

[इनके लेख के खोखलेपन और दोगलेपन का जवाब देता एक सवाल]

गुहा जी, आप को पता है आप लोगों से जनता क्यों नफरत करने लगी है, क्योंकि आप लोग दोगलेपन से लिखते हो, पक्षपात करते हो, एक तरफ़ा लिखते हो, किसी एजेंडे के तहत लिखते हो और समस्या के समाधान की जगह उस पर बौद्धिक राजनीति करते हो.

आप लोगों के पास कश्मीर समस्या का कोई हल नहीं है क्योंकि आप लोगों को उसकी असली समस्या का पता ही नहीं जबकि पूरी दुनिया जानती है. और अगर आप लोग सच में जानना चाहते हो तो आज ही आप की साथी तवलीन सिंह का लेख पढ़ लीजिये.

इस लेख को संक्षिप्त में कहना हो तो कहा जा सकता है कि कश्मीर समस्या अब एक शांतिप्रिय(?) धर्म की कट्टरता और विस्तारवादी नीति का हिस्सा मात्र है. इस शांतिप्रिय धर्म के नाम और चेहरे को आप जैसे लोग ना जानते हैं ना मानते हैं. जबकि इनका पूरा इतिहास खून से रंगा है. लेकिन उस इतिहास लेखन में भी आप लोगों ने अपना बौद्धिक षड्यंत्र रचा.

बहरहाल, अब सच कहे तो आप लोग भी आजकल पत्थरबाजों की तरह खुल कर मैदान में आ गए हैं और अपने लेख लिख-लिख कर एक बौद्धिक पत्थरबाज का रोल अदा कर रहे हैं. आप को पता है दिल्ली इसपर क्यों कुछ नहीं कर रहा क्योंकि इस शांतिप्रिय धर्म की इस मानसिकता का इलाज पूरी दुनिया ढूंढ रही है, जो उसे पिछले हजार साल से अब तक तो मिला नहीं.

हाँ, अभी तक अगर किसी ने इस समस्या को थोड़ा बहुत नियंत्रित करके रखा है तो वो चीन है. आप लोगों का प्रिय वामपंथी देश. कितना रोचक है यह देखना कि एक धर्म की कट्टरता का हल कुछ हद तक एक कट्टर विचारधारा के पास ही निकला. अब क्या कहें, लोहा लोहे को काटता है, यह प्रकृति का सिद्धांत है. और हम सब प्रकृति से बाहर नहीं.

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