अगर मेरा खून तुम्हारे बीच शांति ला सकता है, तो… और चाकुओं से गोद दिए गए विद्यार्थी जी

23 मार्च 1931 को सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी हुई थी. ठीक दो दिन बाद 25 मार्च 1931 को आदरणीय, महान स्वतंत्रता सेनानी, निर्भीक संपादक, भगत सिंह के गुरु श्री गणेश शंकर विद्यार्थी एक सांप्रदायिक दंगे में मारे गए थे.

कुछ घंटी बजती है कानो में. कुछ विचलित करने वाली बात दिखती है. क्या ये संयोग है, इत्तफाक है?

भगत सिंह एवं साथियों को फांसी देने की घटना मामूली नहीं थी. पूरा देश क्रोध में था. फिर क्या कानपुर अछूता था?

क्या कानपुर सांप्रदायिक हिंसा में व्यस्त था बजाय भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को फांसी दिए जाने पर शोकग्रस्त होने के.

गणेश शंकर विद्यार्थी जी जेल में बंद थे, 9 मार्च को ही रिहा हुए थे. मात्र 41 साल के थे.

20 मार्च को भगत सिंह की फांसी की सजा रद्द करने की मांग अंग्रेजी न्यायालय ने ठुकरा दी थी.

इसके विरोध में कानपुर में हड़ताल करने का फैसला हुआ. दुकाने बंद करायी जाने लगी. लेकिन मुस्लिम इलाकों में मुस्लिम दुकानदारों ने इसका विरोध किया. पत्थरबाजी हुई हिंसक झड़प हुई. कुछ लोग घायल हुए. माहौल में अशांति थी.

23 मार्च को भगत सिंह सुखदेव राजगुरु को फांसी दे दी गयी. अगले दिन 24 मार्च को कानपुर में आम हड़ताल का ऐलान हुआ.

लेकिन सांप्रदायिक तनाव से ग्रस्त मुस्लिम दुकानदारों ने भागीदारी से इंकार कर दिया. जबरदस्ती हुई, हिंसा शुरू हुई. उसी दिन 400 आदमी इस हिंसा की भेंट चढ़ गए.

गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने इस हिंसा को शांत करने के लिए खुद हिंसा ग्रस्त इलाकों में जाने का लोगों को समझाने का प्रयास किया. बहुत से हिन्दू, मुस्लिम लोगों खासतौरपर महिलाओं को उन्होंने बचाया.

25 मार्च को दो मुस्लिम कार्यकर्ता उनके घर पहुंचे और बताया कि एक मुस्लिम इलाके में कुछ हिन्दू परिवार फंसे हुए हैं. आप चलिए.

विद्यार्थी जी उनके साथ उस इलाके में पहुंचे, उन हिन्दू परिवारों को सुरक्षित निकाला.

लेकिन तब तक भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी. और कुछ ही देर में मुस्लिम दंगाइयों ने उन दो मुस्लिम कार्यकर्ताओ को मार गिराया. फिर वो गणेश शंकर विद्यार्थी जी की ओर बढे.

विद्यार्थी जी ने कहा – “अगर मेरा खून तुम्हारे बीच शांति ला सकता है, तो.” विद्यार्थी जी अपनी बात पूरी नहीं कर पाए, चाकुओं से गोद दिए गए.

एक महान कार्यकर्त्ता, नेता, भारत का भविष्य, पत्रकार देश की मिटटी में समा गया.

कहते हैं उनकी मौत ने उसी कानपुर में सांप्रदायिक सौहार्द को वापस ला दिया. उसके बाद सालों तक दंगे नहीं हुए, जब तक बाबरी मस्जिद नहीं ढही.

खैर सेक्युलर धर्म निरपेक्ष भारत में जो की इंडिया है आप ये कहानी जानते थे?

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY