महँगी शिक्षा : वृद्धि, कारण और निवारण, भाग-1

पिछले कुछ दिनों से स्कूल इत्यादि में अभिभावक फीस वृद्धि का विरोध कर रहे हैं. सोशल मीडिया में यहाँ तक प्रचार हो रहा है कि यदि सरकारी कर्मचारी और नेताओं के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ें तो सरकारी स्कूलों का स्तर बेहतर हो जायेगा और निजी स्कूलों की मनमानी से आज़ादी मिल जाएगी.

मतलब यह माना जाता है कि सरकारी स्कूल यदि बेहतर आयें तो निजी स्कूल में फीस कम हो जाएगी. इसमें यह माना जा रहा है कि सरकारी स्कूलों की फीस नहीं बढ़ेगी परन्तु यदि सरकारी स्कूल के स्तर के बढ़ते ही उनकी भी फीस बढ़ जाए तो? आइये इसके एक अलग पहलू पर विचार करें.

कुछ वर्षों पहले यानी 1991 से पहले अभियांत्रिकी महाविद्यालय के अधिकाँश सरकारी संस्थान थे. कुछ निजी संस्थान खोले गए और वहां पर बहुत महँगी पढ़ाई हुई पर लोग शांत स्वभाव से अपने बच्चे भेजते रहे. मणिपाल विश्वविद्यालय इसका स्पष्ट उदाहरण है 70 के दशक से चल रहा था. कहीं विरोध नहीं हुआ.

जैसे ही WTO के प्रावधान देश पर लागू कर दिए गए, इन प्रावधानों के तहत शिक्षा को सेवा से व्यवसाय में बदल दिया गया. जहां इस देश में एक लाख से अधिक अभियंताओं की आवश्यकता 10% की विकास दर पर है 16 लाख अभियंता तैयार किये जाते हैं और एक निजी संस्थान में लगभग दस लाख एक अभिभावक का खर्च आता है.

सब चुपचाप दे रहे हैं मतलब देश का 1.5 लाख करोड़ रूपया बिना किसी उपयोग के खर्च हो रहा है उस पर कोई विरोध नहीं. अब धीरे-धीरे आई आई टी जैसे सरकारी संस्थान भी अपनी फीस कुछ वर्षों में बहुत अधिक बढ़ा रहे हैं और 2016 में तो फीस लगभग 90,000 से 2,00,000 यानी दोगुनी कर दी गयी.

इसके साथ ही समस्त रिपोर्टे, चाहे ASER हो या कोई और सरकारी या निजी संस्था यहाँ तक के भारत के उद्योगपति यह मानते है कि 90% से अधिक अभियंता जो देश के निजी संस्थान में तैयार हो रहे हैं, नौकरी के लायक नहीं है जिसे unemployable कहा जाता है.

फिर भी प्रतिवर्ष आज भी 29 लाख विद्यार्थी ऐसे कॉलेज में जा रहा हैं और कुल 16 लाख बाहर आ रहे हैं. दूसरे शब्दों में 13 लाख लोग कॉलेज जा कर भी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते हैं. यह 29 लाख और 16 लाख का आंकड़े मानव संसाधन मंत्रालय से दिए गए हैं.

इसी रिपोर्ट का अनुसार हर वर्ष 60% इंजिनीयर कभी भी इंजिनीयर की नौकरी नहीं प्राप्त करते हैं. यदि आप वाणिज्य इत्यादि संकाय को भी जोड़ देंगे तो कुल विद्यार्थी दो करोड़ से अधिक हैं.

नॉएडा की एक अकेली AMITY UNIVERSITY में 1,25,000 युवा तथाकथित रूप से पढ़ रहे हैं जिसमें औसतन 2.5 लाख रूपए की फीस है और इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि 3000 करोड़ तो अभिभावक एक ही विश्वविद्यालय को दे रहे हैं.

भारत के कुल 2 करोड़ विद्यार्थी जिसमें से 90% निजी और गैर ज़रूरी शिक्षा ले रहे हैं जिसकी कोई गुणवत्ता नहीं है. एक अनुमान से लगभग 6 लाख करोड़ से अधिक रूपया अभिभावकों से, सच कहें तो लूटा जा रहा है. सब शांत स्वभाव से लुट रहे हैं.

इस उदाहरण से स्पष्ट है कि महँगी शिक्षा तब तक महँगी है जब तक सरकारी सस्ती विद्यमान है. इसके साथ ही दूसरा प्रश्न है कि अभिभावक और युवा क्यों इस दौड़ में भाग रहे हैं?

दरअसल अभिभावक यह मानते हैं कि मेरे बेटे-बेटी का भविष्य बन जाएगा पढने से. यदि सरकारी उच्च संस्थान नहीं तो कम से कम निजी में अपनी पूँजी का सदुपयोग कर लूँ. परन्तु वास्तव में 90% से अधिक का धन और उससे भी महत्वपूर्ण देश के युवा के समय का दुरूपयोग हो रहा है.

सिर्फ इतना ही नहीं इतने वर्षों की पढ़ाई के बाद जब वह युवा अपने आप को किसी रोज़गार/ कार्य क्षेत्र में असफल पाता है तो जिस निराशा से वह गुज़रता है, कम से कम मेरे लिए वह सबसे महत्वपूर्ण है. उसके मन में एक ही भावना घर कर लेती है कि मैं ही इस समाज के लायक नहीं हूँ.

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