एक अधूरा उपन्यास – 4 : डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता?

हे अर्जुन सुनो रविन्द्र नाथ ठाकुर क्या कहते हैं-

“कोई भी स्त्री रहस्य नहीं सह सकती, क्योंकि अनिश्चित को लेकर कवित्व किया जा सकता है, वीरत्व प्रदर्शित किया जा सकता है, पांडित्य दिखाया जा सकता है, किन्तु घर-गृहस्थी नहीं चलाई जा सकती. इसी कारण स्त्री जाति जिसको समझ नहीं सकती, या तो वह उसके अस्तित्व का विलोप करके उसके साथ कोई मेल-जोल ही नहीं रख सकती या फिर उसको अपने हाथ से नया रूप देकर उससे अपने व्यवहार के लायक कोई वस्तु गढ़ लेती है- यदि दोनों में से एक भी न कर पाए, तो फिर वह उस पर बहुत अधिक गुस्सा करती है.

– यह भी सच है और वह भी… – अर्जुन दार्शनिक सी मुद्रा में बोला.

– वह भी?

– वह भी जो मैं कहता हूँ…

– और आप क्या कहते हैं?

– स्त्री की परिभाषा या कहें नायिका का चरित्र उपन्यास की घटनाओं के धरातल पर बनता है. स्त्री को त्रियाचरित्र यूं ही तो नहीं कहा गया ना!! वह कभी आप्तकाम दिखाई देगी तो कभी कामिता, कभी शांत सरिता तो कभी उद्वेगी झरना, कभी देवांगना कभी चंडालिनी, कभी चारुहासिनी कभी डाकिनी, कभी…..

– अरे अरे … आप तो पूरी चौंसठ योगिनियों के नाम गिना रहे हैं…. और ये आप ही कह रहे थे ना कि जब देवताले जी को स्त्री को समझने में हज़ार साल लगे तो फिर मेरी क्या औकात? – “वह” छूटते से ही बोला.

– अब समझे! भई ये वो सब नाम है जो आज तक नारी को दिए गए हैं. मेरी नायिका तो ऐसी होनी चाहिए जो इन परिभाषाओं से गुज़र चुकने के बाद स्त्री की एक नई परिभाषा निर्मित करें. – अर्जुन ने चेहरे पर शांति के भाव लाने का असफल प्रयास किया.

“वह” भी कहाँ मानने वाला था… कहने लगा – हम्म्म्म….. तो उसके लिए क्या करना होगा?

– खोज…

– कहाँ, पुस्तक मेले में?

– जी उन सभी जगहों पर जहां किताबें मिलती हो? उन सारी किताबों को पढ़ना होगा जिनमें औरत के विभिन्न रूपों को दर्शाया गया हो.

– मुझे भी ऐसे ही ढूंढा था?

– नहीं

– यानी मैं उन सब नायक से अलग नहीं हूँ जो बड़े बड़े लेखकों के उपन्यासों और कहानियों के नायक होते हैं?

– सबसे अलग हो…

– कैसे?

– क्योंकि तुम्हें किसी किताब से नहीं निकाला गया है… तुम सिर्फ उतने ही हो जितना मैं….

– और तुम खुद को सबसे अलग समझते हो?

– नहीं मैं आम लोगों की तरह ही हूँ. मैं तुम्हें सबसे अलग समझता हूँ….

– ये कैसे संभव है यदि मैं उतना ही हूँ जितना तुम तो फिर तुमसे अलग कैसे हुआ?

– क्योंकि तुम वो हो जिसकी मुझे खोज करनी अब भी बाकी है और मैं वो हूँ जितना मैंने खुद को तुम्हें खोजने में लगाया है… – इस बार अर्जुन सच में शांत था.

लेकिन “वह” कहाँ हार मानने वाला था – खोज करनी है मतलब अभी मुझे जानना बाकी है? मेरी परवरिश बाकी है, पहले मुझे पूरा करोगे फिर नायिका ढूंढोगे?

– नहीं नायिका ढूँढते ढूँढते ही मैं तुम्हें पा लूंगा…

– वो कैसे?

– अपने ठाकुर साहब यह भी तो लिख गए हैं कि –

“अमार माझारे जो आछे से गो कोनो विरहिणी नारी” अर्थात मेरे मन के अन्दर जो बसा है वह विरहिणी नारी है वही विरहिणी नारी अपनी कथा कहा करती है. मैंने तुम्हें जितना बनाया है या तुम जितने भी बने हो वह मेरी उस नायिका की तलाश का फल है. जितना मैं उसे जानता जा रहा हूँ उतने तुम बनते जा रहे हो. जिस दिन उसे पूरा जान लूंगा उस दिन तुम पूरे हो जाओगे और शायद मैं भी!

– तुम अधूरे हो?

– अधूरा भी और….

– और?

– यार तुम सवाल बहुत पूछते हो….

– न था कुछ, तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता,
डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता…. हा हा हा करता हुआ “वह” फिर किताबों वाली टेबल पर चढ़ कर किताबों में झाँकने लगा.

अर्जुन जानने लगा था कि उसके सवालों में उलझना मतलब खुद में उलझकर रह जाना है. ये सवाल जवाब का चक्कर जितना बढ़ता जा रहा था, अर्जुन उतना गहरे में डूबता चला जा रहा था… अर्जुन सोचते सोचते उतने गहरे में उतर जाता है कि कलम की सीढ़ी छूट जाती है, फिर जो झलक उसे दिखने लगती है वह उसी में एकरस हो जाता है.

वो भूल जाता है कि वो कौन है क्या है, फिर अचानक चेतन मन का कोई विचार तरंगित होता हुआ उस तक पहुंचता है और वह सांस लेने के लिए ऊपर आने लगता है, हाथ पैर फड़फड़ाता है और झट से कलम की सीढ़ी पकड़ कर ऊपर आ जाता है.

ऊपर आने के बाद एक बार फिर उसे अनुभव होता है कि वह आज भी उसी द्वंद्व में फंसा हुआ है जहां उसे एक कृष्ण की ज़रूरत है जो उसके लिए एक बार फिर गीता रच दे….

– तभी “वह” फुसफुसाता है… लगता है मुंह खोलकर ब्रह्माण्ड दिखाना ही होगा इस भ्रमित को…..

उपन्यास जारी है…

– माँ जीवन शैफाली 

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