मई तो आ गयी साहेब, कर लीजिए बाढ़ के दौर में बिहार के दुर्दशा पर्यटन की तैयारियां

शायद अफ्रीका की एक तस्वीर कभी-कभी इन्टरनेट पर भागती-दौड़ती दिखती थी, उसमें एक कुपोषित बच्चा बिलकुल मौत की कगार पर होता है. उसके ठीक पीछे-पीछे कुछ फुट दूर पर एक गिद्ध आराम से इंतज़ार करता नजर आता है. बच्चा पल-पल नजदीक आती मौत से लड़ रहा होता है, गिद्ध अपने शिकार के ढेर होने तक घात लगाए होता है. शायद आपने भी देखी होगी.

कहते हैं जिस फोटोग्राफर ने वो तस्वीर खींची थी, वो काफी दिनों तक अवसाद में रहा था. जब ये समझ में तो आ रहा हो कि कुछ तो किया जाना चाहिए, लेकिन ना तो ये समझ आये कि क्या किया जाए, ना कैसे, और घटना हो जाए तो अवसाद में आ जाना कोई अनोखी बात भी नहीं. इंसान हो तो भावना का असर भी होगा.

बिहार में बाढ़ आती है. सन 1954 में राज्य सरकार ने फैसला किया कि वो अपनी प्रमुख नदियों के किनारे तटबंध बनाएगी. ऐसी मान्यता थी कि किनारे ऊँचे हो जाने से बाढ़ का पानी नदी के किनारे तोड़कर बाहर नहीं आ पायेगा.

प्रकृति को बाँधने की इस चेष्टा का नतीजा दिनकर की कविता वाला हो गया है : “जंजीर बढ़ा अब साध मुझे, आ आ दुर्योधन बाँध मुझे!” तटबंध जैसे-जैसे बढ़ते गए वैसे वैसे बाढ़ भी बढ़ती गई. पहले गिनती में और अब तो भयावहता में भी. कभी महीने भर में ख़त्म होने वाली बाढ़ का पानी अब जुलाई से नवम्बर तक जमा रहता है. महीनों खेती के लिए जमीन ना होने से पलायन बढ़ता जाता है.

नदियों के किनारे ऊँचे तटबंध हैं, ग्रामीण-किसान जाकर नदी में कूद नहीं सकते, दूसरी तरफ सरकारी अफसरशाही के किलों की ऊँची दीवारें. दो पाटन के बीच में साबुत बचा ना कोई की तर्ज पर गाँव अब आंकड़ों में तब्दील हो गए हैं.

इन तटबंधों का नुकसान आज पता चला हो ऐसा भी नहीं है. सन 1997 में ही सी.ए.जी. की रिपोर्ट में ऑडिटर जनरल सीधा-सीधा इस नुकसान का इल्जाम सरकारों पर लगाते हुए कहते हैं कि सरकारें लोगों की बाढ़ से सुरक्षा-बचाव में भी बुरी तरह नाकाम रही है.

चुपचाप झेलते रहने के अलावा जनता के पास विकल्प भी नहीं हैं. पिछले साल (2016) में भी बाढ़ राहत में धांधली की शिकायत कर रहे ग्रामीणों को पुलिस की गोलियां नसीब हुई हैं.

ऐसी जगहों में से एक है, या कहिये थी, सहरसा की पहाड़पुर बस्ती. बूढ़े से लाल मुहम्मद सन 1999 में इसके मुखिया थे. अपनी जवानी के दिनों में लाल मुहम्मद ने इसी कोशी नदी के किनारे अपने गाँव के बाहर तटबंध बनवाने के लिए आन्दोलन किया था.

लाल मुहम्मद को पता था कि इस साल अगर बाँध टूटा, तो गाँव में कुछ नहीं बचेगा. कई साल पहले बाढ़ का आना सुख-समृद्धि का आना माना जाता था. तालाबों-पोखरों में मछलियाँ बढ़ जाती थी, खेत ज्यादा उर्वर हो जाते थे.

अब करीब दो हज़ार लोग बेघर होने वाले थे. आती हुई बाढ़ गाँव वालों को दिखाई देती है. नदी में पानी का बढ़ता स्तर देखकर अंदाजा होता है कि रात के किस वक्त तक पानी तट तोड़कर घुस आएगा. जानवरों के गुर्राने जैसी आवाज बहुत देर पहले से आ रही होती है.

लाल मुहम्मद और दूसरे गाँव वालों को भी पता था कि तटबंध टूटेगा, बाढ़ आएगी. यहाँ रहने वाले लोग अब टूटते हुए पूर्वी कोशी तटबंध (जो कि 1984 की बाढ़ के बाद ही रिटायर घोषित था) और नदी के प्रकोप के बीच फंसे थे.

वे लोग स्थानीय दफ्तरों, एग्जीक्यूटिव इंजिनियर वगैरह के पास भागे दौड़े. इंजिनियर ने कहा आप भगवान से दुआ कीजिये, आपकी मदद अब भगवान ही कर सकते हैं.

4 सितम्बर, 1999 को गाँव के लोगों ने भागकर इसी पूर्वी तटबंध के ऊपर आसरा लिया था. पानी भरने के बाद ये इकलौती ऊँची जगह बची थी. रात के ग्यारह बजे तटबंध टूट गया. सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 20 परिवार बेघर हो गए थे. जब हर तरफ पानी ही था, तो बाकी का गाँव कहाँ गया पता नहीं.

आज की सरकारी रिपोर्ट में देखेंगे तो वर्ष 1999 में बाढ़ आई थी बिहार में, या कि राज्य में सूखा पड़ा था, ये भी किसी को नहीं पता है. ये लालू राज का दौर था.

बीरपुर में उस दौर में कोशी के पूर्वी तटबंधों के विभाग के एग्जीक्यूटिव इंजिनियर के मुताबिक तटबंध की मरम्मत पर पंद्रह लाख रुपये खर्च हुए थे. वो लोग (सितम्बर में टूट कर बह चुके) तटबंध की मरम्मत की पूरी योजना, नवम्बर में तैयार करने वाले थे.

सन 1952 से 1998 के बीच सरकारें तटबंध बनाने और उनके रख-रखाव पर 800 करोड़ रुपये से ऊपर का खर्च दिखा चुकी है. दिखा चुकी है, किया है या नहीं, ये मुझे नहीं पता. सन 1990-99 के बीच राज्य सरकार ने तटबंधों का कोई ख़ास निर्माण भी नहीं किया था, केवल 11 किलोमीटर तटबंधों का नया निर्माण हुआ था.

बिहार की बाढ़ों के बारे में बात करने लायक सरकार के पास कोई जानकार नहीं होता. इस बारे में एक ही जानकार हैं डॉ. दिनेश मिश्रा, उनसे पूछने पर पता चलता है कि 1998 में सवा सौ के करीब तटबंधों के टूटने की घटनाएँ हुई थी, लेकिन सरकार के हिसाब से 16 ही तटबंध टूटे.

ऐसा आंकड़ों का फर्क इसलिए होता है क्योंकि राज्य सरकार का मानना है कि कई तटबंध जो पुराने जमाने के जमींदारों के बनवाये हुए हैं, उनकी देखभाल और रख-रखाव तो उन्हीं जमींदारों की जिम्मेदारी है, सरकार की थोड़ी ना है!

बाढ़ की वजह से राज्य में उस दौर में हुए फसलों के नुकसान का हिसाब देखें तो 1990-98 के बीच औसत नुकसान हर साल 50 से 70 करोड़ रुपये के बीच का होता रहा.

सन 1999 में ये अचानक बढ़कर 366 करोड़ रुपये से ऊपर चला गया. सन 1954 से 1999 तक तटबंधों का खर्च कुल 800 करोड़ और सिर्फ 1999 में फसल का नुकसान 366 करोड़ !

सन 1999 लोकसभा चुनावों का भी साल था. इस साल अपना विरोध प्रदर्शित करने के लिए कई ग्रामीणों ने आम चुनाव का बहिष्कार कर दिया था. इस बहिष्कार का कोई असर नहीं पड़ा.

सरकार मतलब, राष्ट्रपति तक को चिट्ठी लिखकर 1999 के इस बहिष्कार की सूचना दी गई थी. सैकड़ों गाँवों ने उस साल मतदान ही नहीं किया और फिर भी आज तक किसी ने किसानों-ग्रामीणों की सुनी ही नहीं है.

मुख्यधारा की पेड मीडिया और टुकड़ाखोरों की भी ऐसी ख़बरों में रूचि नहीं रहती. बाढ़ आ रही है, उनके घर, उनकी फसल सब बहा कर ले जायेगी ये जिन लोगों को पता हो उनकी शक्लें देखी तो नहीं होंगी, कल्पना कर लीजिए.

मवेशी बहेंगे, मौतें होंगी, भूख और बीमारी आएगी, ये सब जिन्हें पता हो उन लोगों का चेहरा बिलकुल वैसा ही होता है जैसे कोई अगली सुबह को फांसी पाने वाला शाम को दिखता हो.

बाकी जिनकी संवेदनाएं बची ही नहीं, अवसादग्रस्त होने के बदले जिन्हें बाढ़ की तस्वीरों में अपना पुल्तिज़र नजर आता हो, उन्हें समय से याद दिला दें. मई तो आ गयी साहेब, टिकट ले लीजियेगा, बाढ़ के दौर में बिहार के दुर्दशा पर्यटन का इरादा हुआ तो फिर टिकट लेने में दिक्कत ना हो कहीं…

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