जतन: एक भीतरी सुरति

जतन का अर्थ है: बड़ी होशपूर्वक, सम्हाल कर. जैसे कबीर किसी वचन में कहे हैं कि लौटती हैं स्त्रियां पनघट से तो गपशप करतीं, बात करतीं, गीत गातीं–घड़े को सिर पर रखे हाथ से पकड़ती भी नहीं! फिर कैसे पकड़ती होंगी, किससे पकड़ती होंगी? जतन से, स्त्रियां लौटती हैं पनघट से. अब तो स्त्रियां नहीं मिलती, क्योंकि पनघट नहीं हैं–नलघट हैं, और वहां उपद्रव है.

कबीर के वक्त पनघट थे और वहां से लौटती स्त्रियां थीं. एक मीठा काव्य था, उस लौटने में पनघट से. और बात करतीं, चीत करती और घड़े को सिर पर रखे, न हाथ से सम्हालतीं! फिर किससे सम्हालतीं?

भीतर एक होशपूर्वक सम्हाल है–बारीक है, जतन से–गिरता नहीं है घट, टूटता नहीं घट. चर्चा चलती रहती है, जतन जारी रहता है.

तो कबीर कहते हैं कि रहो इस संसार में ऐसे, जैसे पनघट से आती स्त्री घड़े को रखती है जतन से. जाओ दुकान पर, लेकिन सम्हालो चेतना को. घूमो बाजार में, खो मत जाओ, सम्हालो अपने को. धन हो, स्त्री हो –सम्हालो अपने को.

जतन का अर्थ है: एक भीतरी सुरति.
गुरजिएफ ने एक शब्द उपयोग किया है: सेल्फ-रिमेम्बरिंग, आत्म-स्मरण. कुछ भी करो, खुद का होश बनाए रखो –वही जतन है.

बुद्ध का शब्द है: सम्यक स्मृति, राइट माइंडफुलनेस.
कुछ भी करो, लेकिन स्मरण बना रहे कि मैं हूं.

बुद्ध का शब्द स्मृति ही बिगड़-बिगड़ कर सुरति हो गया. कबीर और नानक जिसको सुरति कहते हैं, वह बुद्ध का स्मृति शब्द है. वह लोकभाषा में चलते-चलते सुरति हो गया. पर सुरति ज्यादा मधुर है. और स्मृति से तो मेमोरी का संबंध जुड़ जाता है–सुरति अलग ही हो गया. सुरति का तो मतलब ही हो गया–एक आत्मभाव एक बोध.

– ओशो

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