कुमार विश्वास के नाम खुला पत्र : ऐसा भी क्या बिक जाना कि भाट चारण को भी मात दे दें

kumar vishwas

आश्चर्य होता है, सच कहूँ तो विश्वास ही नहीं होता… डॉ. कुमार विश्वास जैसा प्रखर राष्ट्रवादी कविहृदय युवा नेता एक ऐसी दोगली पार्टी का मेंबर भी है जो Rs13000/- प्रति प्लेट की थाली का भोज देकर स्वयं को आम आदमी का रहनुमां बताते हैं..! मैं तो इस वीडियो वाले कविवर को ही जानता और मानता आया हूँ हमेशा से…. जो ना जाने कितने रूप बदलता है.

आपने सुंदर राजनीतिक शुरुआत की और एक मार्मिक भावपूर्ण अंत किया अपने सन्देश का… अस्तु, मैंने भी अपने इस संवाद में राजनीतिक टिपण्णी के साथ शुरुआत की.

सर भोपाल में न्यूमार्केट की सड़क पर बिछी दरियों में बैठ कर आपको रात रात भर मंच संचालन करते जब 2007-08-09 में सुना करता था.. आप में अपना बड़ा भाई ही नज़र आता था. आज एक छोटे भाई के हक़ से आपसे कुछ सवाल कर रहा हूँ..!

सर कुमार विश्वास जी आपने अपने ओजपूर्ण और भावपूर्ण सन्देश में लगभग सभी नेताओं को नाप दिया… दलगत राजनीति से ऊपर उठने की बात आपने खुद को एक सेफ ब्रैकेट में रखते हुए बख़ूबी कही..!

पर अब, आप स्वयं बताएं…
तब आपका ज़मीर कहाँ था जब आपके पार्टी के आकाओं में से एक प्रशांत भूषण ने आपके भी आराध्य योगेश्वर श्री कृष्ण पर बेहूदा टिपण्णी की..?? “हो काल गति से परे चिरन्तन….” ये आज भी मेरा पसन्दीदा ‘भजन’ है सर..!

तब आपका ज़मीर कहाँ मर जाता है जब आपकी पार्टी प्रमुख को सपोर्ट करने की बात सीमा पार से आतंकी हाफ़िज़ सईद करता है….?? जब पाकिस्तान से आपको फण्ड आता है और सहर्ष स्वीकार किया जाता है..??

तब आपका राष्ट्रवाद कौन सी नींद की गोली खा कर सो जाया करता है जब आपके आका केजरीवाल जी सऊदी अरब जा कर अंतरराष्ट्रीय ताकतों से चन्दा जुगाड़ कर लाते हैं और देश के गद्दारों के साथ एक पंचम सुर में अलगाववाद, नक्सलवाद, तथाकथित सेकुलरिज्म के गान गाते हैं..??

तब आपकी श्रीकृष्ण भक्ति कहाँ पाताल में समा जाती है जब जाली टोपी पहनने के शौक़ीन श्री केजरीवाल पंजाब चुनाव में अपनी इमेज चमकाने के लिए दोगलेपन के शिखर पे आरूढ़ हो भगवतगीता को स्वीकार करने से मना कर देते हैं..???

कविवर तब आप क्यूँ मौन हो जाते हैं जब आपकी पार्टी ममता बनर्जी जैसों का समर्थन लेते देते हैं जो स्कूलों से रामायण महाभारत के अध्ययन पे रोक लगातीं हैं… जो सरस्वती माँ के पूजन पे लट्ठ चलवाती हैं… तब आपके भीतर का मान शारदे का बेटा क्यूँ पैसों की खनक राजनीतिक चादर ओढ़ कर सुनता है…??

आप टेक्नोसेवी युग के कवि हैं…. सऊदी मुशायरों के पुराने वीडियो यू ट्यूब में खँगालें तो देख सकें कैसे आप राष्ट्रवादी नेताओं की धज्जियाँ उड़ाने को बेताब बीके हुए कलमकारों के घटिया शेरों पे ठहाके लगाते और “बहुत उम्दा” कहते सुने जा सकते हैं…

सर मानता हूँ आप अतिविनम्रता का परिचय देते हुए अक़्सर स्वयं को ‘चारण परम्परा’ से जोड़ लेते हैं… मगर ऐसा भी क्या बिक जाना कि भाट चारण को भी मात दे दें हम… और उन शेखों को ख़ुश करने के लिए अपने पंतप्रधान का सरेआम मज़ाक बनता देखें, तालियाँ पीटें और दाँत निपोरें..???

सर, पार्टी लाइन से ऊपर आदमी को तब उठ जाना चाहिए, जब पार्टी आपकी मूल भावना के विरुद्ध जाए… क्या आप ऐसा नहीं मानते..??

अन्ना आंदोलन में अपनी क्षमता के अनुरूप मैं भी शामिल था, मैं भी दिल से दुआ करता था आप सभी के लिए… जब आदरणीय अन्ना जी के मंच से आप… किरण जी… अनुपम खेर… केजरीवाल जी… जस्टिस हेगड़े की टीम वंदेमातरम् का उद्घोष करती थी… मैं भी रोमांचित हो जाता था…!

मगर सब कैसे बिखरा… कैसे सपने तोड़े गए.. कैसे आंदोलन से अन्ना और राष्ट्रवाद दोनों ग़ायब हुआ… क्या आप नहीं देख पा रहे हैं सर…???

आप क्यूँ मौन रहे आये इतने वर्ष… सिर्फ़ किसी पार्टी मीटिंग में अपने पुराने साथी को धकिया के निकाले जाने की बात की सफ़ाई देते हुए आपका यह कह देना कि “मेरी और अरविन्द की बहस होती है… हम भी दो भाइयो की तरह झगड़ते हैं”…क्या ये पर्याप्त विरोध दर्ज़ करना था..???

सर… एक छोटे भाई के नाते आपसे आग्रह, और एक संवेदनशील भारतीय युवा होने के नाते आपको सुझाव है कि आप एक बार, सिर्फ़ एक बार ये ओढ़े हुए और ओढ़ाए गए सभी मुखौटे फेंक कर वो कहें जो आपका दिल कहता है…!

हम जो आपको प्रेम करते हैं वे इसलिए करते हैं कि हाँ, दिनकर, निराला, बच्चन की परम्परा में कोई धधकती मशाल को हाथ में थामे विद्रोह और प्रेम का कवि हमारे बीच है….

हम किसी मजबूर राजनीतिक कार्यकर्ता.. किसी चुनाव हारे नेता… किसी मँहगे एंटरटेनर या एंकर से प्रेम नहीं करते सर….!

आपने अपनी जो अप्रतिम राष्टवादी छवि बनायी है एक उसके अनुरूप हमेशा मुखर बने रहें…!

ईश्वर आपकी वाणी को ओज.. आपके हृदय को देशप्रेम, करुणा और आपके मस्तिष्क को सही निर्णय लेने का सामर्थ्य दे…

शुभम भवतु…. जय भारत… जय भारती…!
वंदेमातरम्..!!!
आपका अनुज-
सारांश गौतम

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