मस्जिदों के लाउडस्पीकर : सम्मान करना और सहना, दो अलग चीज़ें

मस्जिदों के लाउडस्पीकर धार्मिक अराजकता और कानून से खिलवाड़ के परिचायक हैं.

सोनू निगम को घेरने वालों ने बस एक ट्वीट पढ़ा है, जो कि स्वतंत्र रूप से भी सही है. चाहे आप उसे उनके पाँच ट्वीटों के सिरीज़ में पढ़ें, या अलग, बात सही है.

मुझे मुल्लों के बेवक्त अजान से दिक़्क़त है. दिक़्क़त इसीलिए नहीं है कि मुल्ला अजान दे रहा है, दिक़्क़त इससे है कि वो लाउडस्पीकर पर चिल्ला रहा है.

मुझे चार बजे जगने में दिक़्क़त है. और इस देश का कानून इस तरह के लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाता है.

चूँकि मैंने मुसलमानों के लाउडस्पीकर पर दिए जाने वाले अजान की निंदा की है तो मैं सेकुलर होने के लिए मंदिरों के भजन की बात नहीं करूँगा. उसकी बात मुझे जब करनी होगी करूँगा. इसीलिए मुझे इस बात पर घेरने वाले अपने तर्क तैयार करके आएँ.

मैंने नवाह, जगराते और अखण्ड कीर्तन के बारे में भी लिखा है, वो खोजकर पढ़ें. यहाँ नहीं लिखूँगा क्योंकि मुझे अपने पोस्ट को ज़बरदस्ती का बैलेंस करने की ज़रूरत नहीं है.

मस्जिदों से लाउडस्पीकर की आवाज़ चार बजे क्यों आती है? क्या लॉजिक है इसका सिवाय इसके कि मुसलमानों का एक गाँव है बग़ल में.

जिनको नमाज़ पढ़ना है वो अलार्म लगाएँ. जिनको सुनना है रिकॉर्डिंग सुनें. मुझे धर्म के नाम पर ये बेहूदगी, जी हाँ बेहूदगी ही है, पसंद नहीं.

ये समाज में धार्मिक वर्चस्व की लड़ाई या विज्ञापन के अलावा कुछ भी नहीं है. दूसरे धर्म की इज़्ज़त करने और उसकी बदमाशियों को सहने के बीच अंतर होता है.

लाउडस्पीकर बजाना बदमाशी है. जब मुझे नहीं सुनना, समाज के बहुत बड़े हिस्से को नहीं सुनना तो वो क्यों बजाया जाता है, वो भी क़ानूनी लिमिट से कहीं ज़्यादा आवाज़ में?

पीसफुल कोएग्जिस्टेंस का मतलब ये नहीं कि सब एक-दूसरे को सहें. सम्मान करना और सहना, दो अलग चीज़ें हैं.

मुझे एक मुसलमान के नमाज़ पढ़ने से दिक़्क़त नहीं है, ये सम्मान करना है. मुझे मस्जिद के लाउडस्पीकर से आती आवाज़ को सुनकर भी सोना है, ये सहना है.

उसी तरह जगरातों के नाम पर चौबीस घंटा आइटम सॉंग बजने पर किसी को दिक़्क़त हो, पर बोलता ना हो, ये सहना है. लेकिन किसी पुजारी को पूजा करने की जगह देना, सम्मान है.

दोनों का फ़र्क़ समझिए. तर्क का सहारा लीजिए. क़ुरान में लाउडस्पीकर नहीं है.

एक और ग़ज़ब की बात ये है कि भारत में ही इस तरह की लाउडस्पीकरबाजी होती है, लाहौर में इतनी तेज़ आवाज़ में आप अजान नहीं सुना सकते. मुसलमान ही नाराज़ हो जाता है! कराची में मस्जिदों के मौलवियों को लाउडस्पीकर पर सलाम दोहराने पर सज़ा हो जाती है.

आपको क्यों ज़रूरत पड़ती है पूरी दुनिया को ये बताने की कि अल्लाह अकबर है? वो तो अकबर है ही, रहे अकबर, आपके घर में रहे, दिल में रहे, दिमाग़ में रहे, समाज में रहे. इसके लिए इतना शोर करने की क्या ज़रूरत है?

अगर किसी धर्म के भगवान को हल्ला करके बताने की ज़रूरत पड़ती हो तो मुझे वैसे भगवानों पर संदेह है, चाहे वो जगराता की दुर्गा हों, अजान के अल्लाह हों, चर्चों के जीसस हों.

दुनिया में और भी धर्म के लोग हैं, जिनके लिए चार बजे किसी मस्जिद से आती दूसरी भाषा की तेज़ आवाज़ से जगना एक संघर्ष है. ये सहिष्णुता है कि लोग ऐसा करने दे रहे हैं.

मैं इस्लाम का सम्मान वहीं तक करूँगा जहाँ तक तार्किक है. फ़र्ज़ी का सेकुलर बनने के चक्कर में मैं ट्रिपल तलाक़, लाउडस्पीकर, पॉलीगेमी, हलाला आदि को डिफ़ेंड नहीं कर सकता.

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