फिर से अपने हिस्से की बलि लेगा राष्ट्रवाद का ये 2020 का दौर

सिर्फ भस्मासुर बोल देने से भारत में लोग समझ जाते हैं कि अपना ही विनाश करने वाला कुछ खड़ा करने की बात की जा रही है.

ये किस्सा कुछ पचास साल पुराना है, अभी जो बिहार के लोग साठ-पैंसठ के होंगे, ख़ास तौर पे संघी, वो इसकी गवाही भी दे देंगे.

पहले जब बिहार में भी छात्र संघ होते थे तब हुआ यूँ कि 1974 में पटना विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव में लालू यादव ने समाजवादी युवजन सभा से अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने की तैयारी की.

उस दौर में बेगुसराय बिहार का मास्को कहलाता था, कन्हैया कुमार जैसों के पिताजी लाल झंडा फहराया करते थे. सांस्कृतिक रूप से मिथिलांचल के कारण भाजपा का विद्यार्थी परिषद भी मजबूत स्थिति में होता था. कांग्रेसी ब्रांड का समाजवाद डूबते दौर में था.

जाहिर है लालू को पता था कि इनके होते उनकी नवोदित समाजवादी पार्टी का क्या होना है. तो लालू जी पहुंचे आरएसएस के पुराने नेता नानाजी देशमुख के पास और विद्यार्थी परिषद के साथ समाजवादी युवजन और समाजवादी युवजन सभा का गठबंधन कर छात्रसंघ का चुनाव लड़ने की अपील की.

अब मजबूत विद्यार्थी परिषद ये मूर्खतापूर्ण गठबंधन करने को तैयार नहीं थी तो गोविन्दाचार्य और नानाजी देशमुख के पता नहीं क्या समझाने बुझाने पर वो आखिर तैयार हुए.

चुनावों का नतीजा क्या हुआ था ये अंदाजा लगा लीजियेगा. लालू प्रसाद यादव, “श्रीमान” सुशील मोदी और “श्री श्री” रविशंकर प्रसाद सभी जीत गये थे.

बात यहीं ख़त्म हो जाती तो क्या बात थी. करीब पंद्रह साल बाद लालू जी को संघ की मदद की जरूरत फिर से पड़ गई.

जब 1990 के बिहार विधानसभा चुनाव हुआ तो जनता दल को 122 सीटें ही मिल पाई. उस समय बिहार विधानसभा में 324 सीटे हुआ करती थी. सरकार बनाने के लिए 41 सीट और चाहिए थे.

आरक्षण के नाम पर युवाओं को जिन्दा भून कर खाने वाले वी पी सिंह तो पूर्व मुख्यमंत्री राम सुन्दर दास को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे और चंद्रशेखर का इरादा रघुनाथ झा को मुख्यमंत्री बनाने का था. उस साल भाजपा के 39 विधायक जीते थे.

लालू जी ने दावा ठोका कि अगर वो मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनेंगे तो भाजपा से हमें समर्थन मिल जाएगा, तब जनता दल ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने पर हामी भर दी.

इस बार सुविख्यात जार्ज फर्नांडीस दौड़े सीधा लालकृष्ण आडवाणी जी के पास लेकिन आडवानी जी ने समर्थन देने से साफ इंकार कर दिया. अब लालू जी ने फिर से संघ के कई नेताओं को मनाया.

संघ की “कृपा” से भाजपा का समर्थन मिला और लालू जी मुख्यमंत्री बने. बिहार में कांग्रेस युग का जगन्नाथ मिश्र की पारी से अंत हुआ.

इसी संघ की “कृपा” के बदले में लालू यादव जी ने बिहार से संघ को उखाड़ फेंकने की हर संभव कोशिश की. बिहार में सैकड़ों के हिसाब से भाजपा के छोटे-बड़े नेताओं और समर्थकों की हत्या हुई है. सिर्फ आखिरी बिहार विधानसभा चुनाव से लेकर अबतक का दौर देखिएगा तो 50 हत्याएं निकल आएँगी.

अब इस कड़ी को थोड़ा और पीछे ले जायेंगे तो नज़र आएगा कि एक और दलित नेता कभी भी कोई चुनाव नहीं जीत पाए थे.

आज जिनका नाम भी नहीं लेते दलित चिन्तक, वैसे योगेन्द्र नाथ मंडल उस दौर में सिर्फ चुनाव ही नहीं जीत रहे थे, कई इलाकों को भारत के बदले पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) बना देने में भी कामयाब हो रहे थे.

बाद में योगेन्द्र नाथ मंडल तो पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री बन गए लेकिन दलित चिन्तक कोई चुनाव नहीं जीत पाए.

इन्हें बाद में राज्यसभा के रास्ते संसद में भेजने में भी संघ का अभूतपूर्व योगदान है. उन्हें कांग्रेस या कम्युनिस्ट या किसी क्षेत्रीय नेतृत्व ने नहीं, संघ ने संसद पहुंचाया था.

आज के कई भाजपा वालों से विचारधारा के बारे में पूछेंगे तो वो कहते हैं, किताबों से दस वोट आयेंगे क्या? अगर किसी दलित नेता को श्रद्धांजलि देने का उनका ज्वार थम गया हो तो उन्हें याद करना चाहिए कि वोट के लालच में जिनके लिए वो भावविह्वल हुए जा रहे हैं उन्होंने भी कोई चुनाव नहीं जीता था. बस किताबें ही लिखी थी.

आज जो यदा-कदा दिखती है, बहुजन और सर्वजन के बीच की ये लड़ाई, समय के साथ साथ और स्पष्ट होने लगेगी.

सन 1920 के दौर में “आर्य समाज” हिन्दुओं का एक बड़ा संगठन हुआ करता था, जिसे राष्ट्रवाद का ज्वर निगल गया. दस साल में ये गांधी को अप्रासंगिक और कांग्रेस से अलग कर गया था.

राष्ट्रवाद का ये 2020 का दौर फिर से अपने हिस्से की बलि लेगा.

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