वीर योद्धा तो जुझारू को ही चुनेंगे अपना नेता, किसी चचा को नहीं

हम बहुत जल्द फेसबुक पर गर्मी खाते हैं. बात-बात पर नेताओं को गरियाते हैं. इतिहास के कई निर्णय पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं और उन्हें लेने वालों पर दोष मढ़ देते हैं.

क्या वे अकेले दोषी हैं?… गलत, बिलकुल गलत. जितने कायर और नालायक नेता हैं उतने ही हम भी हैं. जयचंद भरे पड़े हैं हर युग में हर जगह.

ज्यादा दूर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी, घर के आसपास ना मिले तो किसी भी ऑफिस में चले जाएँ, एक नहीं कई मिल जाएंगे.

उस पर से यह पीढ़ी, यह तो कमाल की है, एक मुफ्त कोक की बोतल और पिज़्ज़ा के लिए घंटो लाइन में लगेंगे, लेकिन देश समाज के लिए कुछ करना पड़े तो सौ बहाने तैयार हैं.

फ़िल्मी नकली हीरो-हिरोइन को देखने के लिए तपती धूप में खड़े रहेंगे लेकिन सड़क चलते गुंडई, अराजकता और असामाजिकता देख कर आँख फेर लेंगे.

अपने मोहल्ले में अगर कोई गलत हो रहा है और उसे रोकने में सहयोग के लिए कोई घर बुलाने आ जाए तो किसी कोने में छिप जाएंगे.

यह हकीकत है. उदाहरण से बता सकता हूँ. जब कश्मीरी पंडित घाटी से भगाये गए थे तो वे लाखों में थे, हर घर का जवान अगर इकठ्ठा होकर चौराहे पर खड़ा भर हो जाता तो आज कश्मीर का इतिहास कुछ और होता.

यही आज भी कई जगह हो रहा है और आगे भी होता रहेगा. हमारे घरों, स्कूलों, संस्थाओं में संघर्ष का मतलब सिर्फ व्यक्तिगत हो गया है, वो भी शिक्षा, नौकरी, और पैकेज तक सीमित कर दिया गया है.

सामाजिक संघर्ष की कोई बात भी नहीं करता. और यह दोष हम सब के खून में आ चुका है.

उस पर से अहिंसा का पाठ पढ़ा-पढ़ा कर आने वाली पूरी पीढ़ी को नपुंसक बना दिया गया. जबकि जीवन एक संघर्ष है और शांति के लिए शक्ति की जरूरत होती है.

युद्ध इतिहास का सच है और आगे भी होते रहेंगे. चाहे हम चाहे या ना चाहे. हां उसका स्वरुप भिन्न हो सकता है. इसलिए, हमें अपने गुस्से को पालना सीखना होगा.

ये सब नेता हमारी ही देन है. जिस दिन हम वीर योद्धा होंगे तो अपना नेता भी किसी जुझारू को ही चुनेंगे, किसी चचा को नहीं.

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