कौन चाहता है, आतंकवादी आतंक फैलाएं और चुपचाप देखती रहे सरकार

चिदंबरम जी,

कश्मीर पर आप का लेख पढ़ा. चूंकि आप अनेक शीर्ष पदों पर रहे हैं इसलिए आपको पढता रहता हूँ जिससे आप का विज़न जान सकूं. मगर मैं यह आज तक नहीं समझ पाया कि आपके मतानुसार कश्मीर समस्या का हल क्या है?

जहां तक मैं आम भाषा में इस समस्या को समझ पाया हूँ कि इसे 1947 में धारा 370 देकर दूध का दही बना दिया गया और जब 1989 में घाटी से कश्मीरी पंडितों को भगाया जाने लगा तब इसका रायता बना दिया गया था और अब इस तरह से लिख-लिख कर इस रायता को फैलाने का काम किया जा रहा है.

वैसे 1947 में प्रधानमंत्री नेहरू थे और 1989 में राजीव गांधी, दोनों आप की ही पार्टी के सर्वेसर्वा थे. वैसे इतिहास ने एक मौका दिया था, 1971 बांग्लादेश युद्ध के समय, जब इसको मिष्ठी दही बनाया जा सकता था मगर तब एक बार फिर आप की पार्टी का शीर्ष नेतृत्व, इंदिरा जी चूक गई और इस दही को खट्टा होने के लिए छोड़ दिया. यहाँ दूध दही रायता फैलाने को प्रतीक रूप में लिया जाए, जो अपने आप में बहुत कुछ कह देता है.

बहरहाल ये सब इतिहास की बातें हैं मगर इसे नजरअंदाज करने पर वर्तमान को समझना भूल होगी. ऐसे में एक और सीधा व सरल सवाल उठता है कि जब आप अधिकांश समय सत्ता में रहे तब क्यों नहीं इसका समाधान निकाल पाए.

और जो भी सुझाव दे रहे हैं उसे इतनी बार सत्ता में रहकर भी क्यों नहीं लागू करवा पाए? किसने रोका था? जब 70 साल में आप नहीं निकाल पाए तो दूसरे को उतना नहीं तो कुछ समय तो देना होगा. और ऐसे में यकीनन आप के सुझाव नहीं चलेंगे जो इतने समय तक समाधान ना दे सके हों.

आप देश के गृह मंत्री रह चुके हैं इसलिए आप के लेख द्वारा यह तो समझ आता ही है कि आप क्या कैसे इस समस्या के बारे में कार्यवाही करते रहे होंगे, जब यह आज लेख के रूप में सार्वजनिक है तो ऐसे में एक आम नागरिक होते हुए प्रजातंत्र में उन बिंदुओं पर सवाल पूछने का हक़ तो मैं रखता ही हूँ. तो आज के लेख के अंत में आप ने पांच सुझाव दिए हैं उस पर पहले बात करते हैं –

1. आप के मतानुसार भाजपा-पीडीपी सरकार को इस्तीफा दे देना चाहिए. मगर इसके बाद एक राज्यपाल कैसे समस्या का समाधान निकाल लेगा. वो भी तब जब केंद्र में उसी भाजपा की सरकार है. और फिर ऐसा करना उलटे अधिक नुक्सान दायक नहीं होगा, जब पीडीपी भी सरकार से बाहर होने के कारण उसके कार्यकर्ता भी दूसरे पक्ष के साथ खड़े होंगे.

प्रजातंत्र द्वारा चुनी हुई सरकार के सत्ता में होने का मतलब ही है कि अधिकांश लोगों की सत्ता में भागीदारी है. तो यह सुझाव आप का राजनीति से प्रेरित लगता है जब आप एक ऐसी गठबंधन की सरकार को पसंद नहीं कर रहे जिसका जनादेश जम्मू और कश्मीर की जनता ने दिया.

इस संदर्भ में एक बात आप से जरूर पूछी जानी चाहिए कि सरकार बनाने में सिर्फ घाटी के लोगों की ही भावना का ध्यान क्यों रखा जाना चाहिए? आखिरकार जम्मू से ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों? सिर्फ इसलिए कि वो अपना आक्रोश पत्थर फेंक कर नहीं करते? यह, यह भी बतलाता है कि आप ऐसा करते रहे हैं जो किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं.

2. जहां तक रही बात करने की बात, तो 70 साल से बात ही तो कर रहे हैं. और कितना बात करना चाहते हैं? उस बातचीत के चेहरे, उनकी बातें, इन बातचीत में क्या होता है, यह अब सबको मालूम है, इसके पीछे क्या खेल होता है वो भी सब जानते हैं तो फिर इस बात में नया क्या होगा?

3. वार्ताकार, कौन से और क्यों? अगर बात ही करनी होगी तो अपने देश के ही नागरिक हैं, बात सीधे कर ली जाएगी. वो अधिक स्पष्ट होगी, वरना बीच के लोग अपना खेल भी खेल सकते हैं. क्या आपको नहीं लगता यह वार्ताकार, टालमटोल की राजनीति तो हो सकती है मगर समाधान की नहीं. और आप यह पिछले अनेक वर्षो से करते आये हैं. ऐसे में यहां यह पूछा जाना चाहिए, क्यों? जिस पर अपना मत मैं बाद में रखूंगा.

4. सेना की कटौती कोई मसला ही नहीं है. इसका क्रियान्वयन किया जा सकता है जिसमे सबसे पहले सारे कश्मीरी नेताओं के सुरक्षा में लगे जवानों को हटा लिया जाना चाहिए. शायद इस बात के लिए ये सब नेतागण खुशी-खुशी तैयार होंगे, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए. इसके आगे कहने की आवश्यकता नहीं.

5. सीमा पर घुसपैठियों पर कड़ी कार्यवाही से कौन मना करेगा, मगर आतंकवादी ऑपरेशन को रोकना मतलब एक आतंकी को खुला छोड़ना क्या किसी भी क्षेत्र की आम जनता के हित में कभी भी हो सकता है?

शायद कोई भी नहीं चाहेगा कि आतंकवादी आतंक फैलाये और सरकार चुपचाप देखती रहे. यह तो सीधे-सीधे आतंकी को सत्ता सौपने के समान हुआ. कहीं से भी यह तार्किक नहीं लगता, वो भी एक ऐसे व्यक्ति के मुँह से जो पूर्व गृहमंत्री हो साथ ही एक विद्वान वकील और लेखक भी.

तो फिर इस समस्या का समाधान क्या है? कम से कम वो तो नहीं जो सत्तर साल से होता रहा है जिसके फलस्वरुप शेख अब्दुल्ला से लेकर फारुख अब्दुल्ला, फिर उमर अब्दुल्ला सत्ता का स्वाद चखते रहे हैं और बदले में दिल्ली पर एक परिवार का राज बरकरार रहा.

आप के लेख में कहीं इसी बात की बेचैनी तो नहीं क्योंकि इस वक्त दोनों ही जगह दोनों परिवार सत्ता से बाहर हैं. वरना जो कुछ भी आप स्थिति की भयावहता के बारे में बता रहे हैं वो कोई पहली बार नहीं. जबकि सबसे भयवाह समय तो निकल गया जब लाखों कश्मीरी पंडितों पर जुल्म हो रहा था और वे भाग रहे थे.

सीधे-सीधे कहें तो इससे अधिक होने के लिए अब कुछ नहीं है बल्कि अब जो कुछ भी होगा उसमें घाटी के लोग ही नुकसान में रहेंगे. वे यह जानते होंगे और अगर नहीं जानते हैं तो इस कटु सच को बताना हमारा दायित्व बनता है.

हमें यह समझाना होगा कि अकेले घाटी का अस्तित्व, क्योंकि जम्मू और लद्दाख इनके साथ किसी कीमत पर नहीं जाएगा, संभव नहीं, वो भी तब, जब साल के छह महीने चारों तरफ सिर्फ बर्फ होती है. जहां तक रही पकिस्तान के साथ जाने की बात, उस नरक में कोई भी नहीं जाना चाहेगा. हाँ नारे लगाना अलग बात है वो भी तब, जब आप को ऐसा करने के पैसे मिल रहे हों.

हमारा-आपका का फर्ज बनता है कि लेख के द्वारा, गुमराह करने की जगह घाटी के आम लोगों को जमीनी हकीकत बतायी जाए. यह बताया जाए कि अलग होकर नेताओं को तो गद्दी मिल जाती है मगर आम जनता नुक्सान में रहेगी.

उन्हें यह बताना होगा ये जो उनके नेता हैं ये घाटी में कुछ और, और दिल्ली में कुछ और बोलते आये हैं. ये जो भावना भड़का कर सपने बुनते हैं उन सपनों को हिन्दुस्तान के साथ रह कर इन्हे पूरा करने से कौन रोकता है. बल्कि अलग होकर तो ये बेहद कमजोर होंगे क्योंकि तब दिल्ली सहायता के लिए नहीं होगी.

इन्हें हर बात खुल कर समझानी होगी. और अगर यह इस सच को स्वीकार नहीं करते तो फिर वो सच तो सामने आएगा जिसे दुनिया जानते हुए भी अनजान बनी हुई है. जिसे आप भी लिखने से बचते हैं.

कश्मीर समस्या के इस सच पर कोई बात नहीं करना चाहता. यह भौगोलिक रूप से पहाड़ों में घिरा एक कटोरा है जिसे एक कट्टर विचारधारा ने जकड़ रखा है. ऐसे कई अलग-अलग कटोरे दुनिया में हैं जो तेजी से फ़ैल रहे हैं.

यह विचारधारा ना कुछ सोचने देती है, ना चर्चा करने देती है और दुनिया से पूरी तरह अलग हो कर भी ना खुद खुश रहती है, ना अन्य को खुश रहने देती है. अगर हम सच में समस्या का समाधान चाहते हैं तो इस सच को स्वीकार करना होगा. वरना यही समझा जाए कि दुनिया इस समस्या को बनाये रखना चाहती है जिससे उसे भी कटोरे में से अपना हिस्सा मिलता रहे.

और जैसे ही जिस किसी को हिस्सा मिलना बंद हो जाता है वो छाती पीटने लगता है और ऐसा कुछ करना चाहता है कि कटोरे का रायता फैला दिया जाए. कह सकते हैं कि खाएंगे नहीं तो फैलाएंगे.

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