पूरे देश में अपनी शाखाएं फैलाये संघ का कश्मीर में क्या रोल है?

कश्मीर समस्या और मोदी सरकार की कश्मीर नीति पर पिछले लेख (शायद अब समझ में आए वायरल वीडियो में सैनिकों की चुप्पी का राज़) के जरिये मैं इसी बात पर जोर देना चाहता था कि कश्मीर की समस्या मूलतः इस्लामिक है.

ISIS का खतरा विश्व पर अब आया है लेकिन 2006 के बाद कश्मीरियत की पहचान पूरी तरह रेडिकलाइज़ होकर इस्लामिक हो गयी.

इसकी शुरुआत वैसे तो 90 के दशक में कश्मीरी पंडितो के पलायन से शुरू हुई थी. लेकिन जोर पकड़ा जब 2006 में कश्मीर में एक वेश्यावृत्ति का बड़ा रैकेट पकड़ा गया जिसमे बहुत सी लड़कियों को जबरन फंसाया गया था और क्लायंटल कहते हैं बड़े-बड़े पॉलिटिशियन, अधिकारी और ऑफकोर्स सेना पर भी इल्जाम थे.

इस वेश्यावृत्ति की सरगना का घर जला दिया गया और एक नयी नेत्री का उदय हुआ आसिया अंद्राबी. अलगाववादी नेताओं और अंद्राबी का आरोप था कि कश्मीरियत को ख़त्म करने के लिए हिन्दू भारत राष्ट्र ने लड़कियों को वेश्यावृत्ति में धकेला. इल्जाम सेना पर लगे. लोगों को हिन्दू मुस्लिम लाइन पर भड़काया गया.

उसी समय दो नाबालिग बहनों से बलात्कार और उनकी हत्या की घटना सामने आयी. इसमें भी सेना को आरोपी बनाया गया और लोगों को भड़काने के लिए आरोप लगाया गया कि मर जाने के बाद भी बलात्कार चलता रहा.

इस आग में घी तब पड़ा जब 2008 में राज्य सरकार ने अमरनाथ श्राइन को एक जमीन का टुकड़ा एलॉट किया ताकि तीर्थयात्री अस्थायी रूप से वहां रह सकें. इसे हिन्दुओं को कश्मीर में बसाने की साजिश बता कर प्रचार किया गया.

इस रेडिकलाइज़ेशन का नतीजा तब स्ट्रीट प्रोटेस्ट के रूप में सामने आया. जो महीनो तक चला और दर्जनों जानों के जाने के बाद समाप्त हुआ.

आज उत्तरप्रदेश में एंटी रोमियो स्क्वाड की बात होती है, प्रेमी जोड़ो को परेशान किये जाने का आरोप लगता है. 2006 के बाद ऐसे बहुत से रेस्टोरेंट जला दिए गए, प्रेमी जोड़ों की पिटाई हुई जो इस्लाम को क्षति पहुंचा रहे थे.

कश्मीर की ताज़ा समस्या बहुत बदली हुई है. आतंकवाद के नए स्वरुप में सामने है. पहले खतरा विदेशी या पाकिस्तानी आतंकवादियों से था. अब 10 और 12 साल के बच्चे हाथ में पत्थर लिए हैं.

खुद दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि 28 साल से बड़ी उम्र का आदमी क्यों नहीं पेलेट गन से घायल है? बच्चों की ओट छुपने वाले कौन हैं?

वैसे मुझे बहुत से बुद्धिजीवी याद हैं जो जीप पर एक पत्थर फेंकने वाले कश्मीरी को आगे बैठा कर गाँव से चुनावी मशीन लेने गए सेना के जवानों की आलोचना कर रहे थे. लेकिन वही बौद्धिक बच्चों को पेलेट गन के आगे खड़ा करने वालो पर खामोश रहते हैं.

क्या कश्मीर की समस्त जनता भारत के खिलाफ हो चुकी है. फिर वो तस्वीरें किन नौजवानों की हैं जो सैकड़ों की संख्या में भारतीय सेना की भर्ती में शामिल होने पहुँचते हैं. जो पुलिस में हैं सरकारी नौकरियों में हैं. जो खुद इन पत्थरबाजों के खिलाफ जान जोखिम में डालते हैं.

अगर कश्मीरी जनता भारत के खिलाफ है तो भारत के पक्ष में जनमत संग्रह माने जाने वाले चुनावो में इतनी भारी संख्या में वोट कौन डाल रहा है.

कश्मीर का सच फिर क्या है? कौन सा चेहरा कश्मीर को रिप्रेसेंट करता है? मीडिया के भरोसे रहेंगे तो 370 को ही कश्मीर की असल समस्या और हल मानते रहेंगे. क्योंकि मीडिया और विपक्ष इन्ही बातों पर चर्चा रखना चाहता है. डायलॉग जरूरी है, हिंसा नहीं आपसी बातचीत हल है. पूरा डिस्कोर्स इसी पर रखना चाहता है.

पूरे देश में अपनी शाखाएं फैलाये संघ का कश्मीर में क्या रोल है?

ITO दिल्ली के पास एक जम्मू कश्मीर स्टडी सर्किल है. जैसे JNU में तमाम वामपंथी पॉलिसी सेंटर हैं. वैसे ही संघ का ये एक सेंटर है.

7 मई को इसी सेंटर में एक मीटिंग प्रस्तावित है. एक गोष्ठी जो इन्ही सवालों के जवाब देगी. सुनिए उनसे जिसने कश्मीर में सालों रहकर इन समस्याओ को समझा है.

7 मई रविवार, समय 3 बजे जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर, 50, प्रवासी भवन, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग निकट ITO, मेट्रो स्टेशन गेट नंबर वन ITO मेट्रो स्टेशन.

उम्मीद है आप आएंगे.

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