मां-बाप की खोखली महत्वाकांक्षा के बोझ तले पिसते बच्चे

इसमें कोई दो राय नहीं कि कुछ स्कूलों ने वाकई लूट मचा रही है… पर सब ऐसे नही हैं… दरअसल समाज मे 3 किस्म के स्कूल हैं.

एक वो जो कि मगरमच्छ हैं. महंगे Branded स्कूल. वो जिनमें 2000 से 4000 तक बच्चे हैं. ऐसे स्कूल बहुत मोटी फीस वसूलते हैं… 3500 रूपए महीने से ले के 6000 रूपए महीने तक. इसके अलावा हर साल एडमिशन फीस और dev fee और न जाने क्या-क्या?

ऐसे स्कूल पैसा कमाने का कोई जरिया नहीं छोड़ते. नित नए जरिये खोजते रहते हैं. hidden charges लेते हैं. books और uniform में कमीशन खोरी करते हैं.

मेरे स्कूल ने पिछले 7 साल से यूनिफार्म नहीं बदली है. पहले दिन से ही स्कूल NCERT की किताबें पढ़ा रहा है.

मैं पहले बता चुका हूँ कि कैसे हम सिर्फ 5 या 6 किताबें स्कूल में चलाते हैं और खुद parents हमारे ऊपर दबाव बनाते हैं कि शहर के एक स्कूल की तरह 18 किताबें लगाई जाएं.

NCERT की 60 रु की घटिया सस्ती किताब न लगा के निजी प्रकाशन की महंगी उच्च क्वालिटी की रंग बिरंगी किताबें लगाई जाएं.

हमारे स्कूल की किताबें शहर की एक bookshop पे मिलती है पर 90% parents चाहते हैं कि बाज़ार जाने का झंझट न हो और किताब यूनिफार्म यहां तक कि जूते भी स्कूल से ही मिल जाएं.

सभी parents को ज़ोर देकर कहा जाता है की बच्चों को घर पे tuition पढ़ाना बंद करें पर parents हैं कि मानते नही , और एक नही बल्कि 3 – 3 ट्यूशन पढ़वाते हैं.

मैं चाहता हूँ कि बच्चा घर से सिर्फ टिफिन और पानी की बोतल ले के आये. उसकी किताबें स्कूल में ही रहें.

होमवर्क SMS, Whatsapp या Teno App से दे दिया जाए जिसे parents एक loose sheet पे करा दे. पर parents ऐसा नहीं चाहते. सहयोग नहीं करते.

मैं चाहता हूँ कि सभी विषयों की सिर्फ एक ही नोटबुक हो… 3 in 1, जिस से कि बच्चा कापियों के बोझ तले न मरे….. parents मानते ही नहीं….

मैं चाहता हूँ कि स्कूल यूनिफार्म ट्रैक सूट और स्पोर्ट्स शूज़ हों… parents का status down होता है…. अगर उनका बच्चा कोट पहन के टाई न लगाएं तो….

parents का बस चले तो वो क्लास रूम और स्कूल बस भी AC करवा दें. parents चाहते हैं कि  स्कूल बस में CC TV हो और एक दाई भी भेजी जाए. बस के संचालन में कितना खर्च बढ़ेगा इस से वो बेपरवाह हैं.

parents हमेशा ये ज़िद करते हैं कि उनके बच्चे को उनके गेट से उठाया जाए. वो ये समझने को तैयार नहीं कि उनके गांव की संकरी गलियों में बस कैसे घुसेगी.

वो गाँव के सभी बच्चे गांव से बाहर एक जगह एकत्र करने को तैयार नहीं. सबको अपने गेट पे बस चाहिए. फिर स्कूल में इस बात पे भी झगड़ा करते हैं कि बस 2 घंटे लगा देती है स्कूल पहुंचने में.

मैं नही चाहता कि परीक्षा में बच्चों को रैंकिंग दी जाए. क्लास के टॉपर को तो वाहवाही मिलती है पर बाकी बच्चों को क्या कहा जाए ? why should kids be ranked?

पर parents राज़ी नही होते. उनको रैंकिंग चाहिए.

मैं चाहता हूँ कि home work न दिया जाए. Rote Learning न हो ……. parents नही मानते.

मैं चाहता हूँ कि शिक्षा Activity based हो. parents कहते हैं कि ये क्या नाटक है. ये नाटक बंद करो. पढ़ाई कराओ.

Sports, Dramatics, activities सब बंद करो ……. सिर्फ पढ़ाई ……. पढ़ाई मने Rote ……. रट्टा …….

स्कूल status Symbol बन चुके हैं. बच्चे गिनी पिग बने पिस रहे हैं. माँ बाप की खोखली महत्वाकांक्षा और आत्म श्लाघा के बोझ तले पिसते बच्चे.

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