जानिये क्यों ओशो को इस्तीफा देना मंज़ूर था इंकम टैक्स नहीं!

कुछ हैरानी की बात है, इनकम टैक्स के आफिसों में जितने मेरे संन्यासी हैं, और किसी आफिस में नहीं. आनंद प्रतिभा है यहां, बोधिसत्व हैं यहां, और भी दोत्तीन….

अब मैंने जिंदगी में कभी इनकम टैक्स दिया नहीं. दूं ही क्या, देने वाला ही नहीं. नौकरी भी करता था तो जब वह घड़ी आई कि तनख्वाह मेरी इतनी हो जाए कि उस पर इनकम टैक्स लगे, मैंने कहा कि वह कम ही रहने दो! इनकम टैक्स की झंझट में कौन पड़ेगा? सो मैंने तनख्वाह नहीं बढ़वाई. जब वे ज्यादा ही जिद्द करने लगे कि तनख्वाह तो बढ़ेगी ही, क्योंकि वह तो नियम के अनुसार है, तो मैंने कहा, इस्तीफा ले लो, मगर इनकम टैक्स, वह मैं नहीं दूंगा. अपनी जिंदगी में मैंने नहीं दिया. कौन इस झंझट में पड़े? कम तनख्वाह पर राजी था, मगर वे राजी नहीं थे.

वे कहने लगे, तनख्वाह तो लेनी पड़ेगी, वह तो कानून है. कब तक हम इसको रोकेंगे? और आपकी रोकेंगे तो दूसरे लोग एतराज उठाएंगे. और आप क्यों परेशान होते हैं? इनकम टैक्स तो थोड़ा सा ही कटेगा, तनख्वाह ज्यादा बढ़ती है.

मैंने कहा, ज्यादा और कम का सवाल नहीं है. इनकम टैक्स का गणित ही मेरी समझ में नहीं आता. मेरा गणित और है.

तो मैंने कहा, इस्तीफा ही ले लो. वह झंझट मिटी. जब मैंने अपने प्रिंसिपल को कहा कि इस्तीफा ही ले लो, तो उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं पागल हूं. मैंने उनसे कहा, ऐसे मत देखो. हालत बिलकुल उलटी है, पागल तुम हो!

उन्होंने कहा, आप ऐसा करो कि सात दिन छुट्टी लेकर विचार तो कर लो, नौकरी छोड़नी कि नहीं?

मैंने कहा कि विचार करके मैंने कभी कुछ किया? अरे निर्विचार ही तो मेरी शिक्षा है.

उन्होंने कहा, भई तुम्हें जो करना हो– अपना सिर पीट लिया– तुम्हें जो करना हो करो.

तो मैंने कहा, कागज हो तो दे दो, तो यहीं मैं इस्तीफा लिख दूं.
फिर भी बेचारे समझाए कि घर से लिख कर भेज देना, सोच-विचार कर लो, परिवार में पूछ लो, मित्रों को पूछ लो, थोड़ा…. कोई भी कदम उठाना तो सोच-समझ कर. अच्छी नौकरी, इसे यूं नहीं छोड़ देते.

मैंने कहा, फिर वही बात! अरे नौकरी कितनी ही अच्छी हो, नौकरी ही है! मैं ठहरा मालिक आदमी. और क्या तुम सोचते हो कि तुम्हारी नौकरी में मैं कुछ खाक नौकर था?

उन्होंने कहा, यह तो मैं भी मानूंगा कि नौकर तो तुम थे, लेकिन नौकर तुम थे नहीं.

क्योंकि मैंने कभी छुट्टी की दरखास्त नहीं दी और जब चाहा तब छुट्टी पर रहा. सच पूछो तो महीने में पंद्रह दिन छुट्टी. और प्रिंसिपल इस डर से मुझसे कहें न, क्योंकि उन्होंने मुझसे कुछ कहा कि इस्तीफा. और विद्यार्थी मुझे प्रेम करें, तो वे कहें पंद्रह दिन आए तो भी ठीक, जितने दिन आए उतने ही ठीक. और यूं भी नहीं था कि मैं अपने गांव में ही रहा जहां विश्वविद्यालय था, सारे मुल्क में घूमता रहता. अखबारों में खबरें छपतीं. प्रिंसिपल मुझे कहते कि भैया, इतना तो कम से कम करो, तुम्हें छुट्टी नहीं लेनी है मत लो, मगर अखबार में खबर छपती है कि तुम कलकत्ते में थे और यहां हम दफ्तर में दिखा रहे हैं. तुम हमें फंसाओगे, फांसी लगवाओगे!

मैंने उनसे कहा कि चमत्कार होते हैं, इसमें क्या अड़चन है? यह तो आध्यात्मिक देश है, यहां तो हर तरह के चमत्कार होते हैं. इसमें कोई अड़चन नहीं है. शरीर यहां, आत्मा कलकत्ते में!

वे कहते, ये बातें मैं किसको समझाऊंगा और कौन मेरी सुनेगा?

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