डेमोक्रेसी को सेक्युलर बना, उसमें इस्लामिक एलिमेंट को पनपने की छूट नहीं दी जा सकती

यह सही है कि हमने देश में अपनी पसंद की सरकार बना दी है, राजनीतिक विरोधियों को धूल चटा दी है… पर इससे जनता की इच्छा शक्ति का ही पता चलता है, सरकार की नहीं…

आज भी वर्तमान सरकार में कड़े राजनीतिक निर्णय लेने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई दी. दी भी है तो फ़्लैश में… एक बार पाकिस्तान में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी…

और नोटबंदी का एक बहुत ही बड़ा कदम उठाया गया जिसे जनता ने अनेक कष्ट सह कर भी बहुत सराहा…

जनता डट कर खड़ी है नेता के साथ. आपने जब हिम्मत दिखाई है, हमने उससे चार गुना ताक़त दिखाई है. पर यह शक्ति प्रयोग आपकी क्षमता को तो दिखाता है, आपकी इच्छाशक्ति को नहीं दिखाता.

ये मजबूत निर्णय आपके शक्ति प्रयोग के लिए लिए गए ना कि आपकी नीति का भाग रहे हैं. आपने जोरदार घूंसा मारकर शत्रु का जबड़ा तोड़ा है पर उसकी हिम्मत नहीं तोड़ी है. फॉलोअप पंच नहीं लगाया है…

दो बड़ी समस्याएं अछूती हैं… पहला, मीडिया पर आपका नियंत्रण नहीं के बराबर है. दूसरा, मुस्लिम डेमोग्राफिक बम को डिफ्यूज़ करने की आपकी कोई नीति नहीं है.

आप आज सत्ता में हैं… चीजें लगभग ठीक-ठाक चल रही हैं… पर इस बात की कोई गारंटी नहीं ले सकते कि आप हर चुनाव जीतेंगे, हमेशा सत्ता में रहेंगे.

हर 5 साल पर 13 साल के बच्चों की फौज 18 साल की हो जाएगी. उन 18 साल के बच्चों में मुस्लिम का अनुपात हर 5 साल पर बढ़ता जाएगा… आज नहीं तो कल, वे शुद्ध लोकतांत्रिक हथियार से हम पर कब्ज़ा करने की स्थिति में होंगे.

उसमें आपका “सबका साथ, सबका विकास” वह खेत है जिसमें धान गेहूं के साथ-साथ खरपतवार को भी खाद पानी दिया जा रहा है…

देश के नैरेटिव की दिशा निर्धारित करनी होगी. हमारे पब्लिक स्पेस में क्या बोलने की आज़ादी है और क्या बोलना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा… यह आपको तय करना होगा.

प्रेस की आज़ादी कोई सोने की चिड़िया नहीं है, उसे पता होना चाहिए कि उसकी औकात क्या है, किसी दिन उसका बटर चिकन भी बन सकता है…

और एक डेमोक्रेटिक सिस्टम को सेक्युलर बनाकर आप उसमें इस्लामिक एलिमेंट को पनपने, फलने-फूलने की छूट नहीं दे सकते, वे एक से दो पीढ़ी में सिस्टम पर कब्ज़ा कर लेंगे.

इस पर नियंत्रण रखने का रोडमैप बनाना होगा, और वह रोड मैप “सबका साथ, सबका विकास” नहीं हो सकता… सिर्फ चुनाव जीतकर शपथ ग्रहण कर लेने को ही सत्ता चलाना नहीं कहते..

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