शायद अब समझ में आये वायरल वीडियो में सैनिकों की चुप्पी का राज़

कश्मीर में आतंकवादी बुरहान वानी की मौत के बाद से शुरू हुआ अनरेस्ट अभी तक थमा नहीं है. 9 अप्रैल को श्रीनगर में हुए उपचुनाव में सिर्फ 7% वोटिंग ही हो सकी. लेकिन वोटिंग से ज्यादा महत्वपूर्ण ये बात रही कि भड़की हिंसा में 8 लोगों की जान गयी.

इसी चुनाव का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें सेना के जवानों को लोग गाली देते हुए मारते हुए दिखे. पूरे देश में इसके खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया हुई और लोगों ने मोदी सरकार को दोषी ठहराना शुरू किया.

ये सच है कि मोदी सरकार की कश्मीर नीति के ज्यादातर पहलू पब्लिक डोमेन में नहीं हैं. मोदी सरकार का कश्मीर को लेकर क्या रूख है, लोगों को नहीं मालूम.

जुलाई 2016 से भड़की हिंसा जिसमें पत्थरबाजी प्रमुख है कोई पहली बार नहीं हुई. जुलाई से जारी हिंसा में डेढ़ सौ से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हैं और पेलेट गन से हजारों जख्मी हुए हैं. जख्मी होने वालों में सैकड़ों की तादाद में आर्मी, अर्ध सैनिक बल और पुलिस के जवान भी हैं.

ऐसी हिंसा जुलाई 2016 से पहले 2008 और 2010 में भी भड़की थी. तब भी स्ट्रीट प्रोटेस्ट का दौर महीनों चला था, सैकड़ों जाने गयी थीं. हजारों उसी पेलेट गन से जख्मी हुए थे.

हालाँकि हिंसा का इतिहास इससे भी पुराना है. 1989 से भड़की हिंसा में अब तक हजारो जान गयी हैं.

2008 में जब हिंसा भड़की थी तब केंद्र में मनमोहन सरकार थी. तब उसने हिंसा को समाप्त करने के लिए इकोनॉमिक पैकेज दिया था. अलगाववादी नेताओं के खजाने अलग से भरे गए थे.

2010 में भड़की हिंसा के बाद उसी मनमोहन सरकार ने अलगाववादी नेताओं, आतंकवादियों से बात करने के लिए तीन लोगों का एक समूह बनाकर इंटरलोकेटर भेजे थे. जिन्होंने हर पक्ष से बात करके कश्मीर समस्या के समाधान के लिए सुझाव देने थे.

2016 जुलाई से भड़की हिंसा को खत्म करने के लिए अब तक मोदी सरकार ने कोई पैकेज घोषित नहीं किया है, न ही किसी पक्ष से बात करने के लिए कोई पहल की है.

9 अप्रैल को उपचुनाव में हुई हिंसा के बाद उपचुनाव में नेशनल कांफ्रेंस के उम्मीदवार फारूख अब्दुल्लाह ने कई बयान दिए. हर बयान में एक ही दर्द था कि सरकार बात नहीं कर रही है.

इस हिंसा के ऊपर अखबारों में बुद्धिजीवियों ने बहुत से लेख लिखे हैं, फेसबुक पर बौद्धिकों ने पोस्ट लिखी है, हुर्रियत के नेता मीर वाइज फारूख, अलगाववादी नेता गिलानी, यासीन मलिक, और पाकिस्तान लगातार मोदी सरकार पर बात करने का दबाव डाल रहा है.

डायलॉग, कश्मीर समस्या का हल डायलॉग है, आपसी बातचीत है. भारत, पाकिस्तान और कश्मीर के अलगाववादी नेताओ में डायलॉग. हर बौद्धिक, सो काल्ड पत्रकार, विपक्षी नेता सभी का ज़ोर डायलॉग पर है.

और मोदी सरकार यही नहीं कर रही.

बातचीत हमेशा हुई है, डायलॉग नेहरू के ज़माने से होते रहे हैं. और डायलॉग के नतीजे में चार बार समझौते भी हुए. नेहरू शेख अब्दुल्लाह के बीच, इंदिरा शेख अब्दुल्लाह के बीच डायलॉग के चलते ही समझौते हुए.

पहली बार अटल सरकार ने बातचीत के दायरे में अलगाववादी नेताओं के साथ आतंकवादी संगठनों को भी शामिल किया. हुर्रियत के नेताओं को पाकिस्तान जाकर मुशर्रफ़ सरकार से बात करने का मौका दिया. अटल जी के ही समय पहली बार फेयर इलेक्शन हुए.

दरअसल कश्मीर की आधुनिक समस्या की शुरुआत ही 1987 में हुए चुनावों में घपलेबाजी से हुई थी. तब कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस एक साथ थे.

मुस्लिम यूनिटी लीग इनके खिलाफ चुनाव लड़ रही थी. और लीग के चुनाव जीतकर सरकार बनाने के पूरे चांस थे. राजीव गाँधी के दिशा निर्देशन में चुनावो में धांधली हुई और फारूख अब्दुल्लाह की सरकार फिर से बन गयी.

लीग के कई नेताओं ने उसके बाद हिंसा का रास्ता अख्तियार किया. लोकतंत्र के जरिये सत्ता पाने से उनका विश्वास उठ गया.

इसके पहले भी नेहरू के ज़माने से चुनाव कभी फेयर नहीं रहे. कांग्रेस ने हमेशा किसी न किसी तरह सत्ता की कुंजी अपने पास रखी. बस जनता पार्टी के समय हुए चुनाव एक अपवाद हैं.

अटल जी अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद कश्मीर के लिए समाधान नहीं ला सके. तमाम बातचीत के बावजूद.

कारण?

कश्मीर में कोई एक पक्ष नहीं है. दो प्रो इंडियन पार्टी हैं, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी जिसके नेता पहले मुफ़्ती मोहम्मद सईद थे अब मुफ़्ती महबूबा हैं. लेकिन प्रो इंडियन अर्थ यहाँ भारत समर्थक होना नहीं है. ये दोनों पार्टी भारत के साथ रहकर ऑटोनोमी (नेशनल कांफ्रेंस) और सेल्फ रूल (पीडीपी) की बात करती हैं.

दूसरा पक्ष JKLF है, जिसके नेता यासीन मलिक हैं. हुर्रियत के मीर वाइज फारूख हैं. ये दो पार्टी अलगाववादी हैं जो आजाद कश्मीर की बात करती हैं.

तीसरे पक्ष गिलानी हैं, जो वयोवृद्ध हैं, 90 के आसपास हैं और जो कश्मीर को पाकिस्तान में मिला देने की बात करते हैं.

यासीन मलिक, मीर वाइज, गिलानी आपसी बातचीत के जरिये कश्मीर समस्या का समाधान ढूंढने की बात करते हैं. हिंसा के रास्ते नहीं.

हिंसा का रास्ता अपनाने वाले आतंकवादी संगठन हैं.

हिज्बुल मुजाहीदीन कश्मीर का होम ग्रोन आतंकवादी संगठन है. लश्करे तैयबा, जैश ए मोहम्मद पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन हैं.

फिर एक पक्ष पाकिस्तान खुद है. इनके अलावा मशर्रत आलम और आंद्रे अंद्राबी और एक पक्ष बनकर खड़े हुए हैं.

फिर इनमें से कौन है जो कश्मीर की जनता को रिप्रेसेंट करता है. कोई एक, या सभी. इन सबके हित आपस में टकराते हैं.

हुर्रियत को बातचीत में भाव देने से नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी आहत होते हैं, उनकी राजनीति कमजोर होती है. वो दोनों रोड़े अटकाते हैं.

और कई पक्षों को इन्वॉल्व किया जाता है तो आतंकवादी संगठन भड़कते हैं. और इन सभी को, पाकिस्तान को भी इन्वॉल्व किया जाता है तो जम्मू भड़कता है, लद्दाख भड़कता है.

कश्मीर की समस्या का एक पक्ष जम्मू और लद्दाख भी है. जो इस पूरी समस्या को हिन्दू-मुस्लिम और कम्युनल रंग देता है.

कश्मीर की समस्या सिर्फ 4 जिलों की है साउथ कश्मीर की. जम्मू, लद्दाख, नॉर्थ कश्मीर (कारगिल) किसी अलगाववाद के साथ नहीं हैं.

अटल जी की असफलता के बाद मनमोहन सिंह को इतिहास पुरुष बनने का बहुत गंभीर रोग हुआ था.

मनमोहन सिंह कश्मीर समस्या को बिलकुल हल करने के एकदम कगार पर थे लेकिन समय ने उनका साथ नहीं दिया.

उनके मुख्य पक्षकार परवेज मुशर्रफ़ को सरकार से हटना पड़ा जब समाधान एक दम नजदीक था. इस समाधान को फोर स्टेप सोल्यूशन के नाम से जाना जाता है.

इसके मुताबिक भारत पाकिस्तान् के बीच की लाइन ऑफ़ कंट्रोल ही एक्चुअल सीमा हो जाती. लेकिन बॉर्डर सिर्फ कागज़ो पर होता. हकीकत में ये एक पोरस बॉर्डर होता जिसमें कश्मीरियों को इधर से उधर जाने, व्यापार करने की पूरी छूट होती.

दोनों कश्मीर, भारतीय कश्मीर और पाकिस्तान आक्युपाइड कश्मीर में सेल्फ रूल होता. और दोनों कश्मीर का डी मिलिट्री लाइजेशन

ये पूरा वार्तालाप बेहद सीक्रेट रहा था. इसमें हुर्रियत, JKLF, पाकिस्तान, उसके आतंकवादी संगठन सभी शामिल थे. लेकिन अंतिम चरण पहुँचने से पहले मुशर्रफ हट गए. बातचीत टूट गयी. और फिर 2008 का अनरेस्ट आया.

इस बार का अनरेस्ट अपने साथ रेडिकलाइजेशन यानी इस्लामीकरण लेकर आया. वजह बनी कश्मीर सरकार द्वारा अमरनाथ यात्रियों के लिए कुछ एकड़ की जमीन देने की व्यवस्था. जिसे अलगाववादी नेताओ ने इस्लाम के खिलाफ पेश किया.

कई सालों से चली आ रही शांति खत्म हो गयी. यहाँ से आतंकवाद में स्ट्रीट प्रोटेस्ट में इस्लामीकरण का तड़का लगा. जिसने बेरोजगार लेकिन पढ़े लिखे कश्मीरियों खासतौर पर युवाओं के अपनी तरफ आकर्षित किया.

फिर 2014 में केंद्र में मोदी सरकार आयी. और उसके बाद पहली बार कश्मीर में पीडीपी और बीजेपी में सरकार बनाने का गठबंधन हुआ.

2014 में हुए स्टेट इलेक्शन में पीडीपी ने सबसे ज्यादा सीटें जीती थी. उसने ये चुनाव बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के नाम पर लड़ा.

पीडीपी यूँ भी प्रो आजादी पार्टी मानी जाती है जिसे अघोषित तौर पर अलगाववादी धड़ो का समर्थन हासिल था.

बीजेपी जम्मू को सत्ता में उचित प्रतिनिधित्व देने, हिन्दू हितों की रक्षा के नाम पर जीती थी. दो विपरीत ध्रुवो वाली पार्टियों को गठबंधन करना पड़ा. सरकार बनानी पड़ी.

हिन्दू मुस्लिम की दृष्टि से न देखें तो ये एक तरह से कश्मीर और जम्मू का गठबंधन था.

मुफ़्ती मोहम्मद की असमय मृत्यु के बाद उनकी बेटी चार महीनो की नानुकुर के बाद मुख्यमंत्री बनीं.

जहाँ मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने प्रमुख अलगावादी नेता मशरत आलम को रिहा किया और अफस्पा को हटाने के लगातार वकालत की, वहीँ उनकी मृत्यु और महबूबा मुफ़्ती के CM बनने के बाद मोदी सरकार ने अपनी नीतियों को कश्मीर में लागू करने का प्रयास शुरू किया.

अब तक चली आ रही बातचीत की परिपाटी से एकदम अलग. जैसे चीन ने तिब्बत में किया. कभी बातचीत नहीं की. विकास, इंफ़्रास्ट्रक्चर पर पूरा जोर. तिब्बत की डेमोग्राफी बदलने पर जोर.

मोदी सरकार ने कुछ ऐसी ही नीति बनाई. इसका पहला चरण था कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को पुनः बसाने का प्रयास. उनके लिए अलग कालोनी. पूरी तरह सुरक्षित और गारंटीड.

पूर्व सैनिको को कश्मीर में बसाने की योजना और इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बनाने की योजना. FDI लाने की, सड़क, बिजली पर जोर रखने की. विकास के जरिये अलगाव को ख़त्म करने की योजना.

लेकिन इसका पूरा विरोध हुआ. बुरहान वानी ने अपनी मौत से पहले फेसबुक पोस्ट में पंडितो के लिए बन रही कालोनी पर अटैक करने की इच्छा जताई थी. लेकिन उसके मंसूबे पूरे नहीं हुए. उसे सुरक्षा बलों ने मार गिराया.

लेकिन उसकी मौत ने अलगाववादी नेताओं को पुनः एकजुट होने, जनता को हिंसा की तरफ मोड़ने का मौका दे दिया. पिछले दस महीनो से चलता विरोध, हिंसा, पत्थरबाजी अकारण नहीं है. ये अलगाववादी नेताओं के लिए जीवन-मरण का सवाल है.

सन 2014 के संसदीय चुनावों में और फिर विधानसभा इलेक्शन में बम्पर वोटिंग ने दुनिया भर में सन्देश दिया कि कश्मीर लोकतंत्र की राह पर है.

इसीलिए इस उपचुनाव में 9 अप्रैल को भारी हिंसा हुई. पूरी कोशिश हुई कि वोटिंग का प्रतिशत बढ़ने न पाए. कश्मीर समस्या जिन्दा रहे.

शायद अब समझ में आये कि वायरल हुए वीडियो में सैनिकों की चुप्पी का क्या राज था.

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