हिन्दू जीवन शैली : पारंपरिक परिधान का महत्व

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हमारे धर्मग्रंथों की एक बहुत महत्वपूर्ण घटना से इस लेख को आरम्भ करना चाहूंगी…

द्रोपदी चीरहरण, एक तरफ दु:शासन द्रोपदी की साड़ी खींच रहा था दूसरी तरफ कृष्ण उस साड़ी को इतना लम्बा किये जा रहे थे कि वो साड़ी खींचते खींचते थक जाता है… कृष्ण चाहते तो सीधे ऐसा कोई उपाय करते कि दु:शासन साड़ी खींच ही न पाता.. उसे पेरालिटिक कर देते या मूर्तिवत कर देते..

लेकिन फिर उस परिधान की क्या भूमिका रह जाती … बहुत लम्बी योजना के तहत ये ग्रन्थ लिखे गए हैं… कृष्ण को ये पता था कि कलयुग में कोई तृप्ति देसाई नुमा महिला ब्रिगेड आएगी और हमारे परिधानों के विरोध में उतरेंगी…

ये तो हुई मज़ाक की बात लेकिन पहले भी यही कहा था कि धर्म ग्रंथों में जो कुछ भी लिखा गया है वो घटित तो हुआ ही है, लेकिन कुछ प्रतीकात्मक कहानियां भी इसलिए जोड़ी गयी है ताकि हम उन प्रतीकात्मक घटनाओं के पीछे छुपे वास्तविक सन्देश को पहचान सकें…

तृप्ति देसाई ब्रिगेड को मैं महिला ब्रिगेड नहीं कहूंगी, क्योंकि उसमें वास्तव में नारी सुलभ गुण होते तो वो साड़ी पहनने की परंपरा तोड़ महालक्ष्मी मंदिर में घुसने वाली हरकत कभी न करती. मैं इस ब्रिगेड से सिर्फ इतना पूछना चाहूंगी यदि द्रोपदी ने साड़ी की जगह उसकी तरह जींस या मिनी स्कर्ट पहना होता तो दु:शासन को क्या इतनी मेहनत लगती?

जैसे पिछले साल महालक्ष्मी मंदिर में उपस्थित महिला पुजारियों को जब पुलिस ने “बलपूर्वक” हटाने की कोशिश की तो तृप्ति के साथ छीना झपटी हुई थी. उसे कहना अगली बार ऐसी किसी जगह पर जाए तो साड़ी पहन कर ही जाए… कोई कृष्ण-स्वरूप जींस पहनी किसी लड़की की मदद कितनी देर कर पाएगा…

चलिए अब आते हैं वास्तविक मुद्दे पर, परिधान कोई बुरा नहीं होता यदि वो गरिमामय हो, गरिमामय परिधान कहा है, छोटा-बड़ा नहीं, वरना फिर यही ब्रिगेड आकर कहेंगी भारतीय नारी सबसे अधिक तो साड़ी में ही सेक्सी लगती है. पीठ कमर सबकुछ खुला रहता है.

यदि किसी ने परिधानों पर खोज की होगी तो उसे ये बात पता होगी की भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार जैसे भोजन में भिन्नता आ जाती है वैसे ही कामुक दिखने की परिभाषा भी जगह के अनुसार बदल जाती है.

विदेश में औरत की पिंडलियाँ दिखना और जांघे दिखना कामुकता की निशानी है, इसलिए वहां मिनी स्कर्ट का चलन अधिक है, क्योंकि वो कामुक दिखना चाहती हैं. भारत में नारी के वक्षों का दिखना अधिक कामुक कहा गया है इसलिए यहाँ के परिधानों में साड़ी और दुपट्टों का महत्व है..

दूसरा हमारे यहाँ मंदिर जैसे पवित्र स्थल पर जाने के लिए सर पर पल्लू डाला जाता है. और यह रिवाज केवल महिलाओं को ही नहीं पुरुषों पर भी लागू होता है, उन्हें भी सर पर कोई कपड़ा डालकर ही ऐसी जगह पर प्रवेश करना चाहिए क्योंकि हमारी “हिन्दू जीवन शैली” यह बात “जानती” है कि ऊर्जा उर्ध्व गमन करती हैं, इसलिए जब आप ऐसी जगहों पर जाते हैं जो शुद्ध ऊर्जा का कुण्ड होता है वहां ऊर्जा आपके पाँव से प्रवेश कर सर से निकल न जाए इसलिए सर पर कपड़ा डाला जाता है ताकि आपका शरीर और आत्मा उस ऊर्जा का उन्नयन के लिए उपयोग कर सके.

दूसरा जब आप ऐसा कोई परिधान पहनते हैं जो शरीर से बिलकुल चिपका हो तो त्वचा को सांस लेने में दिक्कत होती है. स्वास्थ्य और वैज्ञानिक दृष्टि से भी टाइट जींस टीशर्ट हानिकारक है, इसलिए हमारे यहाँ धोती का रिवाज था.

आपके कपड़े के अनुसार आपका व्यक्तित्व बदलता है आप स्वयं इसका अध्ययन कीजिये.

किसी बहुत पुरानी परम्परा को जब आप ध्वस्त करने निकलते हैं तो उसके गुण अवगुणों पर पहले पूरा अध्ययन कर लीजिये. मैं किसी भी तरह के वस्त्र पहनने के विरोध में नहीं हूँ… कभी कभी खुद भी जींस पहन लेती हूँ, गाउन पहन लेती हूँ, लेकिन जिस जगह आप जा रहे हैं, वहां आप से पहले आपका परिधान प्रभाव डालेगा.

कुछ मंदिरों में विशेष परिधान पहन कर जाने का रिवाज है तो पहले उस पर पूरा अध्ययन कर लीजिये कि उसके पीछे कौन से सामाजिक, दार्शनिक या आध्यात्मिक कारण है.

शुक्र है द्रोपदी इसका महत्व जानती थी, अंधे के बेटे को अँधा कहने का अभिमान और पांच पतियों के साथ भी गर्व से सर उठाकर चलने वाली द्रोपदी तक की रक्षा के लिए स्वयं कृष्ण आ जाते हैं, तो उस नारी के आत्मिक बल में कोई तो बात होगी, वरना अंगिया और धोती पहनने का रिवाज तो उन दिनों भी था.

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