वो झापड़ CRPF जवान नहीं, नरेंद्र मोदी नहीं, हिन्दोस्तान के गाल पे पड़ा है

क्रोध मानव स्वभाव का एक बेहद महत्वपूर्ण गुण है. क्रोध से शरीर मे बहुत तीव्र संवेग पैदा होते हैं. बहुत ऊर्जा नष्ट होती है क्रोध में.

क्रोध को और इस ऊर्जा को अगर पाल लिया जाए, channelize कर लिया जाए तो इसे सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है.

आप ये मान लीजिए कि कश्मीर में जो कुछ हो रहा है, बहुत अच्छा हो रहा है. भरी हुई loaded AK 47 लिए आदमी को आप लात मार रहे हैं और वो कुछ नही कह रहा….

इस अवस्था को प्राप्त व्यक्ति को ही शायद स्थितप्रज्ञ कहते हैं. ये Video ये भी बताता है कि हिंदुस्तानी फौज की ट्रेनिंग कितनी उच्च क्वालिटी की है…. बुद्धत्व को प्राप्त है भारतीय सेना.

विशाल भारद्वाज की कालजयी रचना ‘मक़बूल’ में एक सीन है. उसे मैं भारतीय सिनेमा के सबसे बेहतरीन दृश्यों में गिनता हूँ.

नया आया पुलिस कमिश्नर, माफिया डॉन अब्बाजी के अड्डे पे गिरफ्तारी वारंट ले के पहुंचता है.

मियाँ मक़बूल (इरफ़ान) उसे दुत्कार के कल आने को कहता है. कमिश्नर सरेआम, सरेबाज़ार मियाँ को एक झापड़ रसीद कर देता है.

हतप्रभ मियाँ का हाथ कमर में लगी पिस्तौल पे जाता है. पंडित (पीयूष मिश्रा) मियाँ को जकड़ लेता है और पिस्तौल वाले हाथ को वहीं दबा लेता है… नहीं मियाँ… नहीं… ना… मियाँ… नहीं…

अगला दृश्य :

मियाँ प्रतिशोध की आग में जल रहा है… उसे बदला लेना है… पुलिस कमिश्नर को मारना है…

अब्बा जी (पंकज कपूर) उसे हाथ पकड़ के घसीटता हुआ उसी चौबारे पे ले आता है… ले… मार झापड़… मार ना… मेरे गाल पे मार झापड़…

मार… जिस से तेरे गुस्से की आग तो बुझे मियाँ… अगर ये आग न बुझी तो हम सब उस आग में जल के खाक हो जाएंगे…

मक़बूल… वो झापड़ तेरे गाल पे नही, मेरे गाल पे पड़ा था… अब्बा जी के गाल पे…

उस दिन कश्मीर में, वो झापड़ और वो लात उस CRPF के जवान के गाल पे नही… नरेंद्र दामोदरदास मोदी के गाल पे नहीं… राजनाथ सिंह के गाल पे नहीं… हिन्दोस्तान के गाल पे पड़ा है… भारत माता के गाल पे पड़ा है…

गुस्से को पालना सीख मक़बूल… ये गुस्सा आगे कभी बहुत काम आएगा…

थोड़े लिखे को ज़्यादा समझना.

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