पिंजरे में बंद शेर को कोई भी मार देता है कंकड़

चुनाव, रैली या किसी दंगे या आपदा की स्थिति में मुस्तैद खड़े किसी सेना के जवान को देखा है आपने? आपको क्या लगता है, क्या आप उसे अकारण सिर्फ एक थप्पड़ मार सकते है?

थप्पड़ छोड़िये…. क्या आप उस अकेले खड़े जवान को गाली दे सकते हैं? गाली को भी जाने दीजिये, क्या आप उसकी आंख में आंख मिलाकर ऊंची आवाज में उससे बात कर सकते हैं?

मैं तो नहीं कर सकता. लेकिन आप अगर यह सोच रहे हैं कि यह काम आपके वश का है तो उसके बाद के अंजाम को भी एक दफा जरूर सोच लीजिये और फिर बताईये कि क्या आप उपरोक्त हरकतें कर सकते हैं?

फिर कश्मीर घाटी के युवकों में इतना साहस कहां से आ गया कि वह जवानों के साथ गाली-गलौज करते हुये हाथापाई तक करने लगें.

पिछले कुछ दिनों से इस संबंध में वायरल वीडियो को अगर आपने देखा होगा तो यही सोचा होगा कि आखिर ये अलगाववादी इतने मजबूत कैसे हो गये जो एक जवान से उलझने लगे.

दरअसल घाटी के युवक और अलगाववादी मजबूत नहीं हुये हैं बल्कि शेर को पिंजरे में बंद देखकर उनमें वह साहस आ गया है.

जिस प्रकार पिंजरे के शेर को कोई भी कंकड़ मारकर निकल जाता है उसी प्रकार की हालत जवानों की घाटी में बनी हुई है. विभिन्न प्रकार के दबावों और उकसावे के बावजूद भी उन्हें संयमित रहने की सीख दी गयी है.

लेकिन संयम आखिर क्यों? सतही तौर पर सोचा जाय तो इस क्यों का कोई सार्थक उत्तर नहीं मिलेगा. फिर अंत में हम केंद्र सरकार को इसके लिये जिम्मेदार ठहराकर मामले की इतिश्री कर लेंगे.

लेकिन कश्मीर के हालात और इस मसले पर देश के भीतर से लेकर बाहर तक के दबावों के साथ संवैधानिक संस्थाओं तक के रवैये को देखा जाय तो मामले की गंभीरता का अहसास किया जा सकता है.

आज कुछ वायरल वीडियो को देखकर लोगों का खून खौल रहा है, उन्हीं में से कुछ लोग उन युवकों को भटके हुये बालक करार देकर उनके पक्ष में खड़े नजर आते हैं.

सेना द्वारा बल प्रयोग की बात आये तो सुप्रीम कोर्ट के ‘मी लॉर्ड’ तक को पैलेट गन से चोट लगने लगती है. पत्थरबाजों पर सख्ती की जाय तो मानवाधिकार वालों का हूजूम टूट पड़ता है इस मसले को लेकर वैश्विक बिरादरी में राग अलापने के लिये.

फिर अलगाववादी इस तरह के वीडियो जानबूझ कर वायरल कराते हैं जिससे उनकी राजनैतिक चमक फीकी न पड़े. वह इन वीडियो को अपनी शेखी बघारने की नीयत से वायरल करते हैं.

बेशक इससे लोगों का खून खौलता है. लेकिन मामले का दूसरा पहलू यह है कि वही अलगाववादी जो तोहमत सेना पर लगाते रहे हैं, उस तोहमत से संबंधित तथ्य उस वीडियों में छूकर भी नहीं है.

इसलिये इन्हें वायरल करते समय इस बात पर भी ध्यान देना चाहिये कि इससे सेना की संयमशीलता को भी प्रमुखता दी जाय जिससे उन लोगों को तमाचा लग सके जो लगातार सेना पर विभिन्न प्रकार के आरोप लगाते रहते हैं.

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