मन कुन्तो मौला…

हजरत अली बिन अबू तालिब ने एक बार फरमाया था कि मुझसे मुतल्लिक दो जमातें बर्बाद हो जायेंगी. एक जमात वो होगी जो मेरी मुहब्बत में हद से निकल जायेगी और दूसरी वो जो मेरी नफ़रत में हद से निकल जायेगी.

हजरत अली ने ऐसा क्यों कहा था इसे समझने के लिये हजरत अली की उन तमाम पहचानों के बारे में जानना होगा जो उन्हें परिभाषित करतीं हैं.

हजरत अली बिन अबू तालिब का परिचय एक वाक्य में नहीं दिया जा सकता. पहला परिचय तो ये है कि वो हजरत मुहम्मद साहब के चाचा अबू तालिब के बेटे थे. जिनका निकाह बाद में रसूल साहब की सबसे प्यारी दुख्तर हजरत फातिमा ज़हरा से हुआ यानि आप रसूल साहब के दामाद भी थे.

अली मर्दों में पहले थे जिन्होंने सबसे पहले इस्लाम लाया था और मर्दों में सबसे पहले इन्होने ही नमाज़ अदा की थी. जब रसूल हिजरत करके मदीने जा रहे थे तब वो अली थे जिन्होंने अपने जान की परवाह न करते हुए रसूल साहब की जगह उनकी बिस्तर पर लेटने का साहस किया था और दुश्मनों से बाल-बाल बचे थे.

चौथे खलीफा तो वो थे ही. हजरत हुसैन और हजरत हसन इन्हीं हजरत अली के फरजंद थे जिन्हें शहीद किया गया था.

इस्लाम के अंदर का पहला मतभेद तब जाहिर हुआ था जब रसूल साहब का विसाल हुआ. एक खेमा था जिसकी मान्यता थी कि ख़ुम्म सरोवर के पास दिये अपने आख़िरी खुत्बे में नबी-करीम ने हजरत अली को अपना वली-अहद मुकर्रर किया था जबकि दूसरे खेमे की मान्यता थी कि ख़ुम्म सरोवर के पास नबी-करीम ने सिर्फ अली की प्रशंसा की थी न कि उन्हें अपना वली-अहद बनाया था.

खैर हजरत अबू बकर पहले खलीफा बने पर मुसलमानों का एक बड़ा खेमा नाराज़ ही रहा और उनकी ये नाराजगी दिन-ब-दिन बढ़ती ही गई. इसी नाराजगी के नतीजे में इस्लाम ने जंगे-सिफ्फीन और जंगे-जमल भी देखा जहाँ रसूल के मानने वाले ही आमने-सामने थे.

जंगे-जमल (ऊँटों की लड़ाई) तो नबी-करीम की पत्नी बीबी आयेशा और हजरत अली के दरम्यान हुई थी. बाद में अली क़त्ल किये गये, फिर हजरत हसन को जहर दे दिया गया और कर्बला के मैदान में हजरत अली के छोटे बेटे हजरत हुसैन को उनके परिवारजनों के साथ निर्दयतापूर्वक कत्ल किया गया.

इन चीजों ने इस्लाम के अंदर का विभाजन बड़ा गहरा कर दिया. हजरत अली और उनके पुत्रों के अनुयायी शियाने-अली (शिया) कहलाये. शियों के अंदर हजरत अली को लेकर मुहब्बतें बढ़तीं गईं और उधर विपरीत खेमे में अली के लिये अदावतें.

बहुसंख्यक शियों ने प्रथम तीन खलीफाओं को खिलाफत का गैर-वाजिब दावेदार ठहरा दिया तो दूसरा खेमा ये मानता रहा कि खिलाफत का क्रम बिलकुल दुरुस्त था. आगे शिया और सुन्नी तल्खी इतनी बढ़ी जिसने हजरत अली के उस कथन को साकार कर दिया जो मैंने ऊपर लिखा है.

बहस कुरान में तब्दीली करने के आरोप तक जा पहुँची. शिया किताबें मसलन हयातुल-कुलूब, उसूले-काफ़ी, हक्कुल-यकीन तो ये बताने लगीं कि कुराने-करीम में सूरह नूरैन (दो नूर यानि मुहम्मद और अली) तथा सूरह विलायत नाम से दो सूरतें और थीं जिसमें हजरत अली के खिलाफत की बात थी पर सुन्नियों ने उसे कुरान से निकाल दिया जबकि सुन्नी खेमा इस दलील को हमेशा बकवास कहकर कुरान में किसी भी तब्दीली से सख्त इंकार करता रहा.

शिया तबर्रा गाने लगे तो सुन्नी विद्वान् मसलन मौलाना इसरार अहमद वगैरह अली के बारे में बकवास बातें बयान करने लगे. मुस्लिम जगत में हजरत अबू बकर और अली की बीच श्रेष्ठ कौन, इस बात पर भिड़ंत होने लगी. शिया-सुन्नी के झगड़ों ने मुस्लिम विश्व की तरक्की तो अवरूद्ध की ही साथ ही न जाने कितने मुसलमानों की जान भी ले ली.

बहरहाल आज का मौजूं ये नहीं है, आज का दिन हजरत अली के विराट व्यक्तित्व के स्मरण का है. उनका स्मरण इसलिये क्योंकि वो अली थे जिन्होंने कहा था कि अपने पेट को जानवरों का कब्रगाह मत बनाओ.

हिन्दुस्तान के मुत्तल्लिक जितनी प्यारी बातें हजरत अली से बयान हुईं हैं वो इस्लामी तारीख में किसी और से नहीं मिलता. शिया ग्रन्थ हयातुल कुलूब में हिन्द के लिये बड़े प्यारे अलफ़ाज़ आये हैं.

मुस्तदरक-अल-हाकिम में आई एक हदीस के अनुसार हजरत अली ने हिन्द की ओर इशारा करते हुए कहा था कि हिन्दुस्तान से मुझे ठंडी हवाएं आतीं है. अली इस बात के भी बड़े कायल थे कि इन्सान को अपने मुल्क के लिये वफादार रहना चाहिये.

उन्होंने एक बार फरमाया था कि वतनपरस्ती के ज़ज्बे में ही मुल्क की दीर्घ-जीविता का राज़ पिन्हाँ है. एक दूसरी रिवायत के अनुसार उन्होंने फरमाया था, इंसान का वक़ार मादरे-वतन के लिये उसकी मुहब्बत में अंतर्निहित है.

‘नहजूल बलाग़’ हजरत अली की अलग-अलग मौकों पर बयान की गई बातों का संकलन है जो उनके विराट सोच का जिंदा सबूत है. नबी-करीम कई मौकों पर हज़रत अली के लिये अपनी मुहब्बत का इज़हार किया करते थे, आप कहते थे, जिस तरह मैं खातमन-नबी हूँ उसी तरह अली खातमन-औलिया हैं.

खानकाहों और दरगाहों में बजती हुई नज़्म मन कुन्तो मौला….हाज़ा अली उन मौला…. दरअसल नबी-करीम का वो कौल था जो उन्होंनें हजरत अली के लिये बयान किया था. इसका मतलब है, जिसका मैं मौला हूँ उसके अली भी मौला हैं.

आप सबमें जीवों के प्रति प्रेम बढ़े, वतनपरस्ती का वो ज़ज्बा आकार ले जो मौला अली चाहते थे और हिन्द के लिये मुहब्बत और भी बढ़े, इन्हीं सब शुभकामनाओं के साथ आप सबको और खासकर सारे शिया विश्व को हजरत अली के यौमे-विलादत की बहुत-बहुत शुभकामनायें.

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