क्या वाकई ये बुद्धिजीवी, मीडिया, मुस्लिम समाज के हितैषी हैं?

किसी एक हिन्दू धर्मगुरु ने किसी टेलीविज़न चैनल पर अगर किसी दूसरे धर्मवाले को किसी बहस में कोई भी एक गाली दे दी होती तो क्या होता?

सामान्य अवस्था में तो यह संभव ही नहीं है लेकिन अगर किसी असामान्य अवस्था में भी किसी छोटे से छोटे हिन्दू धर्मगुरु ने भी कुछ भी आपत्तिजनक कह दिया होता तो तूफ़ान आ जाता. हर चैनल पर यह ब्रेकिंग न्यूज़ होती.

अगले दिन के अखबार भरे पड़े होते. कई दिनों तक अनेक लेख लिखे जाते. जिसमे सभी सेक्युलरों ने अपनी अपनी तलवारें बाहर निकाल ली होती. और ना जाने क्या-क्या आरोप नहीं मढ़ दिए जाते, बहुसंख्यक हिन्दू समाज पर.

यहाँ तक कि राजनेता भी कूद पड़ते और संसद ठप्प करने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता. लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि आम हिन्दू इस घटना की खुलकर भर्त्सना करता.

आमजन के द्वारा इस घटना का इतना विरोध होता कि उस धर्म गुरु को माफी मांगनी पड़ती और बात यहीं नहीं रुक जाती, वो कई दिनों तक लोगों द्वारा टेढ़ी निगाह से देखा जाता. संक्षिप्त में कहना हो तो उसके साथ वो किया जाता कि कोई और ऐसा करने की भविष्य में हिम्मत ना करे.

पिछले दिनों एक मुस्लिम धर्म गुरु ने टेलीविज़न बहस के दौरान एक भद्दी गाली दी. हम सबने देखा-सुना. लेकिन क्या उस पर ऐसी कोई प्रतिक्रिया हुई? नहीं.

सिर्फ दो-चार अति सक्रिय हिन्दुओं ने इसके विरोध में सोशल मीडिया में जरूर लिखा. मगर ऐसा करते कोई मुस्लिम नजर नहीं आया. मीडिया से लेकर सेक्युलर गिरोह ने हमेशा की तरह इस घटना को पूरी तरह नजरअंदाज किया.

कहने को तो यह एक सामान्य घटना है और इसे सीरियसली नहीं लेना चाहिए. लेकिन ध्यान से देखें तो इसमें कई बातों का जवाब छिपा है.

हो सकता है आम मुस्लिम भाई इस घटना को बड़ी खूबसूरती से नजरअंदाज करके अंदर ही अंदर खुश हों मगर सच में देखा जाए यह उनके लिए ही नुकसानदायक है. क्योंकि आम लोगों के मन में इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. यह एक सामान्य मानवीय स्वभाव है कि अगर गलत को गलत नहीं कहा जाएगा तो दुनिया इसे स्वीकार नहीं करती.

सच कहें तो हिंदू समाज को मीडिया और सेक्युलर गिरोह का धन्यवाद ही करना चाहिए, जो वो हिन्दू समाज की आलोचना करता तो किसी और उद्देश्य से है लेकिन अंत में वो जाने-अनजाने लाभकारी हो जाता है.

आलोचना के कई फायदे हैं. आप अपनी गलतियों-कमियों को जान पाते हैं. यह सुधार पर आधी जीत होती है और बेहतर होने की संभावना बनती है. ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय’ तो हमारी संस्कृति के मूल में है.

हर कलाकार-साहित्यकार से लेकर धर्मगुरु और राजनेता के लिए आलोचना महत्वपूर्ण है. अपनी निंदा से सुनने वाले का हित ही होता है. सनातन समाज ने आलोचना और उस पर बहस को हमेशा बढ़ावा दिया और इसलिए हम अपनी अनेक सामाजिक कुरीतियों को समय-समय पर सुधार पाए.

हम अपने समाज में भीतर से ही हर गलत बात का विरोध करने का पूरा मौका देते हैं. इसको प्रोत्साहित करते हैं. इसका फायदा हमें हुआ. सती प्रथा से लेकर पर्दा प्रथा और न जाने कितने विषयों पर खुल कर बात की, फलस्वरूप हिन्दू सभ्यता दुनिया में एक उदाहरण बन सकी. आज भी हमारे दरवाजे हर बहस के लिए खुले रहते हैं.

जाति प्रथा से अगर कोई लड़ रहा है तो खुद हिन्दू समाज. और अगर पिछले कुछ समय में कुछ हिन्दुओं में कट्टरता दिखाई भी देती है तो वो मीडिया-राजनेता और सेक्युलर लोगों के एकतरफा तुष्टीकरण के कारण पनपे आक्रोश का साइड इफ़ेक्ट मात्र है, जिसे ये तथाकथित बौद्धिक लोग समझना नहीं चाह रहे.

आज विश्व अगर मुस्लिम समाज की कमियों पर बात नहीं करता, राजनेता चुप रहते हैं, मीडिया नजरअंदाज करता है, बौद्धिक लोग लिखने से बचते हैं, तो क्या ये लोग मुस्लिम समाज के हितैषी हैं? नहीं. ये उनका सबसे ज्यादा नुकसान करने वाले लोग हैं.

यह कुछ-कुछ इस उदहारण से समझा जा सकता है कि घर में किसी बच्चे की गलती पर पर्दा डालने वाला परिवार अपने बच्चे का ज्यादा अहित करते हैं. जिसका खामियाजा उस परिवार से ज्यादा उस बच्चे को भविष्य में उठाना पड़ता है.

यही नहीं, अगर कोई पड़ोसी अगर परिवार के किसी सदस्य की कोई शिकायत ले कर पहुंचे तो समझदार घर वाले उस पर ध्यान देते हैं ना कि उस पड़ोसी से लड़ने-भिड़ने लगते हैं.

आज हालत यह है कि हम जैसा कोई भी अगर मुस्लिम समाज पर कोई टिप्पणी करता हैं तो हमें साम्प्रदायिक कट्टर और ना जाने किस किस नाम से पुकारा जाता हैं. यहां तक कि हमें दुश्मन मान लिया जाता है जबकि अगर सच में माने तो हम आम मुस्लिम के सबसे बड़े शुभचिंतक हैं. एक बार सिर्फ चश्मा उतार कर देखने की बात है.

आलोचना और विरोध ना होने से उपरोक्त मुस्लिम धर्मगुरु तो खुश हो रहा होगा, उसके समर्थकों में उसकी धाक बढ़ी होगी, वह कुछ एक राजनेता के लिए वोटबैंक के काम भी शायद आये और वो अपने ढंग से अधिक महत्वपूर्ण भी बन जाए, मगर इससे एक आम मुस्लिम को क्या मिला?

इस सवाल का जवाब अगर कोई समाज पिछले हजार साल में नहीं ले पाया तो यह अपने आप में कई प्रश्नचिन्ह खड़े करता है.

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