धन्य हैं, सम्मुख ठगे जाने पर भी सच को नहीं समझने वाले

आज भी जो सर जी के कुकर्म साक्षात देखने के बावजूद उनका अंधसमर्थन करना चाहते है उनके लिए यह कथा फिर से कह रहा हूँ . शायद वे समझ सके .

बहुत पहले जब दिल्ली के खलीफा अपने अंतरंग मीडिया मित्र पुण्य प्रसून जी के साथ अमर क्रान्तिकारियों के प्रति देश की उमड़ने वाली भावनाओं का दोहन करने का प्रयास करते हुए रंगे हाथो पकड़ाए थे तब मैंने ये पोस्ट लिखी थी .

सरजी की असलियत का ठोस सबूत देखने के बाद भी जो अंधभक्त सच को स्वीकार नहीं कर पा रहे उनके लिए एक कहानी लिख रहा हूं, उम्मीद है उन्हें समझ आ जाएगी.

एक गाँव में एक बदचलन युवती पति के साथ रहती थी. उसकी हरकतें जब गाँव में फैली तो पति के भी कान लग गई . पति ने सोचा कि क्यों न पहले सबूतों के साथ निश्चित कर लिया जाए .

उसने पत्नी से कहा कि वो कल सुबह दूसरे गाँव जा रहा है और दो दिन बाद ही लौट पायेगा . पत्नी ने बड़ा नाटक किया कि दो दिन मेरा क्या होगा… वगैरह-वगैरह…

फिर अगले दिन खाना बनाकर पति के साथ बाँध दिया और पति चला गया.

अब वो पतिता बड़ी खुश होकर श्रृंगार करके अपने प्रेमी को रात घर आने का निमंत्रण देकर आ गई और अपने स्वप्नों में खो गई.

इसी बीच पति मौका देख कर घर में घुस गया और पलंग के नीचे छुप गया.

निश्चित समय पर प्रेमी आ गया और उस पतिता का आलिंगन करने लगा. अचानक पलंग के पास पड़े चमकीले बर्तन में पतिता पत्नी को अपने पति का प्रतिबिम्ब नजर आ गया.

प्रेमिका ने प्रेमी को छिटक दिया और बोली, “ऐ युवक मुझसे दूर रहो. मैं परम पतिव्रता धार्मिक नारी हूँ. मुझे छुओगे तो भस्म हो जाओगे. मैंने तुम्हे क्यों निमंत्रित किया हैं अब उसका कारण सुनो.”

उसने अपना नाटक जारी रखते हुए आगे कहा, “आज जब मैं सुबह अपने पति को परदेश विदा करके मंदिर गई तो देवी माता मुझ पर प्रसन्न होकर सम्मुख उपस्थित हो गई और बोली  –

‘हे सती श्रेष्ठ! तू धन्य है मैं तुझसे अत्यंत ही प्रसन्न हूँ लेकिन विधि के विधान से अत्यधिक दुखी हूँ. हे देवी, जिस पति को तू ह्रदय से अधिक चाहती है उससे तू अब नहीं मिल पायेगी, मार्ग में ही वह मारा जायेगा.’

उस युवती ने आगे कहा, “यह सुनकर मैं बदहवास हो गई और माँ से विनती करी कि कैसे भी मेरे पति को बचाओ . तब माँ ने मुझसे कहा कि आज रात्रि के दूसरे प्रहर में यदि तुम किसी अन्य पुरुष के साथ रमण करो तो मृत्यु की छाया तुम्हारे पति से उतर कर तुम्हारे क्षणिक पति (प्रेमी) के सर आ जाएगी लेकिन तुम्हे ये सच उस पुरुष को पहले बताना होगा.”

अब वो पतिता अपने प्रेमी को आँख मारकर बोली ,”बताइए हे आर्य! क्या आप अब भी मुझ अबला से समागम करके मेरे पति की मृत्यु अपने सर लेंगे?”

प्रेमी बोला, “हे देवी! आप जगत में सतियों में श्रेष्ठ हैं. अपने लिए तो सभी जीते हैं. जो औरों के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दे उसी का जीवन सार्थक है. आइये मेरी बाहों में आपका स्वागत है.”

और पति की पलंग के नीचे होते हुए ही उस पतिता ने अपने प्रेमी के साथ दुराचार किया.

पति कुछ समय बाद बाहर निकला और उन दोनों को उपकार पूर्ण नम आँखों से साष्टांग नमन करते हुए अपने कंधों पर बिठा के सारे गाँव में घूमा.

अब भाइयों इतने पर भी जो लोग दिल्ली के खलीफा को वफादार, ईमानदार, जनहितकारी, परोपकारी, महान समझते हैं… धन्य हैं वे उस पति के समान… सम्मुख ठगे जाने पर भी सच को नहीं समझ पाते. ईश्वर उन्हें सदबुद्धि दे. वो आखिर हैं… तो हमारे ही भाई बहिन.

हरि ॐ हरि ॐ… परिस्थिति को समझाने के लिए वयस्क कथा के उपयोग हेतु क्षमा . कृपया अन्यथा न लें…

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