जीवन – एक मृत्यु यात्रा

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लोग मुझसे एक सवाल अक्सर पूछते हैं – ‘ध्यान कैसे किया जाए? आप ध्यान की कोई विधि बताएं?’

ऐसे सवालों पर मैं अक्सर स्वामी ध्यान विनय की ओर तकने लगती हूँ, क्योंकि मेरे लिए तो ध्यान बाबा के साथ होना और उनके बिना होना दोनों ही ध्यान करने जैसा है.

हाँ कई बार आँखें बंद कर पारंपरिक ध्यान मुद्रा में बैठने का प्रयास भी करती हूँ, जिसमें मुझे अक्सर नींद आने लगती है, कभी कभी त्राटक करती हूँ तो एकाग्र नहीं हो पाती, आधे रास्ते से ही लौटना पड़ता है…

आजकल तो मैंने ध्यान के लिए एक नया प्रयोग शुरू किया है… अपनी मेड से काम बंद करवाकर सुबह सूर्योदय से पहले पूरे घर की और आँगन की झाडू लगाना और पोछा करना शुरू किया है… वैसे नहीं जैसे किया जाता है… इस भाव के साथ जैसे परमात्मा की सेवा कर रही हूँ… और मुझे इस काम में इतना रस आने लगा है… कोई कहे कि दिन भर झाडू पोछा करती रहो तो मैं दिन भर कर सकती हूँ… एक ऐसा काम जो मुझे कभी बहुत पसंद नहीं था… लेकिन आज इसमें इतना प्रेम, इतना भक्तिभाव, इतना समर्पण अनुभव होता है कि क्या कहूं…

अब मुझसे ध्यान विधि पूछने वालों को यदि यह विधि बताऊँ तो कौन करेगा… और क्यों करेगा… सबके अन्दर “म्हाने चाकर राखोजी “सा समर्पण, वही सेवा भाव हो आवश्यक तो नहीं… तात्पर्य यह कि कोई भी काम ध्यान बन सकता है….

तो अब ध्यान कैसे किया जाए… हाँ कुछ योगिक क्रियाएं अवश्य हैं जो मन को एकाग्र करने की सुविधा देती हैं, लेकिन क्या वास्तव में ध्यान उसे ही कहते हैं?

बब्बा (ओशो) कहते हैं ध्यान का वास्तविक अर्थ होता है आपका जैसा पालन पोषण हुआ है, जीवन जिस तरह से कंडीशंड हुआ है उसे पूरी तरह से ध्वस्त कर डालो…. उस Biologycal क्लॉक को पूरी तरह से बदल देना है जिस पर आपका जीवन आज तक चलता आया है… उसके लिए उन्होंने बहुत प्रयास किये… सब सीधे चलते हैं वो उल्टा चलते थे, लोग रात में सोते हैं दिन में जागते हैं, वो दिन में सोते थे रात में जागते थे, नहाने के समय खाना, खाने के समय घूमना… सबकुछ अस्त व्यस्त कर दो…

पिछले एक महीने में कुछ ऐसी ही ‘ध्यान’ की प्रक्रियाओं से गुज़री हूँ… मेरी बनी बनाई अवधारणाएं, मेरे कल्पना लोक, मेरी वास्तविक दुनिया… मेरा समर्पण, मेरी कुंठा, मेरा प्रेम, मेरी ईर्ष्या, मेरा मैं…. जैसे पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया हो…

खुद को पहचानने से इनकार कर दिया था मैंने, उस एक महीने के बाद जब कल रात स्वामी ध्यान विनय के एक घंटे के प्रवचन के बाद सुबह का सूरज निकला तो एक बार फिर मैं बदल चुकी थी…

मैं यह नहीं कहती… अब मेरे अन्दर ये सारे मानवीय गुण अवगुण समाप्त हो गए, नहीं… जब तक जीवन है तब तक ये सब बना रहेगा लेकिन ‘अब’ सब ‘ऊपर ऊपर’….

यहाँ ये दो शब्द बहुत मायने रखते हैं… “अब” और “ऊपर-ऊपर” क्योंकि इस ‘अब’ से पहले जो भी अनुभव प्राप्त किये, जिस भी घटना से गुज़रना हुआ… उससे गुजरने के बाद जो कुछ भी पाया वही असली पूंजी है…

अब जीवन फिर नया है… मैं वो नहीं जो कल थी, मैं वो नहीं जो अभी कुछ घंटों पहले थी… यूं तो हम रोज़ ही थोड़ा थोडा बदलते हैं, लेकिन यह बदलाव बहुत बड़ा है. ऐसा नहीं कि जीवन में अब समस्या नहीं आएगी, लेकिन अब समस्याओं का स्तर भी ऊंचा होगा… और उसके समाधान भी उच्चतर होंगे…

ये कुछ ऐसा ही है… जैसे सफ़र में आप पूरी तैयारी के साथ निकले हो, सारे साजो सामान पीठ पर लादे अपने में मगन खुश नाचते गाते जीवन यात्रा पार कर रहे हो… और सामने एक थरथराता पुल आ जाए जिसको पार करने के लिए आपको पीठ पर अपनी सुविधा के लिए लादे सामान को छोड़ना पड़ जाए… क्योंकि यात्रा ऐसी है कि अब आप पीछे नहीं लौट सकते, और आगे बढ़ने के लिए सामान छोड़ना ही होगा… क्योंकि सामान लेकर आगे बढे तो पहली बात उस थरथराते पुल पर पहला कदम रखते ही पुल गिर जाएगा और यात्रा वहीं समाप्त हो जाएगी…

दूसरी बात यात्रा पर निकले हैं तो पूरी तो करना ही है… भले फिर सामान छोड़ना पड़े, और आप ये भी नहीं जानते कि आगे इस सामान की आवश्यकता पड़ी तो आप क्या करेंगे… लेकिन रिस्क तो लेना है… जैसा नीत्शे ने कहा है… जीवन का पर्यावाची ही है खतरनाक तरीके से जीना. जीने का कोई दूसरा उपाय है ही नहीं.

तो पीठ पर लादा प्रेम, नफरत, सफलता, असफलता, धन, रिश्ते, ईर्ष्या, सबकुछ छोड़ना होगा… बिलकुल निर्भार होकर ही इस पुल को पार किया जा सकता है…

पूरा एक महीना लगा मुझे पुल के एक छोर पर खड़े होकर यह तय करने में कि मैं कैसे छोड़ पाऊँगी वो सब जो मेरी पहचान है… मैंने सबकुछ छोड़ भी दिया तो पुल के उस पार कौन खड़ा है जो मुझे सहारा देगा… या पुल पर ही पैर लड़खड़ा गया तो कौन संभालेगा….

ध्यान बाबा का सब्र पहाड़ सा है तो मेरा खाई सा… मैं बार बार टूटती रही… वो बार बार मुझे हौसला देते रहे….

कल रात आखिर वो सारा सामान छोड़ दिया… पुल पर पहला पाँव रखते ही लगा जैसे मुझे किसी को थामने की आवश्यकता ही नहीं, पुल खुद मुझे थामे हुए हैं… उसके अदृश्य  हाथों का स्पर्श आज दिन भर अनुभव करती रही…

मैं नहीं जानती इस पुल को कितने दिनों में या कितने सालों में पार सकूंगी, लेकिन शायद यह मेरा बचा हुआ मानवीय स्वभाव ही है जो मुझे सांत्वना देता रहता है कि पुल पार करने पर अवश्य ही मुझे मेरे गुरु के दर्शन होंगे जो मुझे आगे की यात्रा करवाएंगे..

और ध्यान बाबा हँसते हुए कहते हैं… माँ जीवन शैफाली… “जीवन” से इतना लगाव…. याद नहीं मेरा सबसे पहला सन्देश क्या था, जब आपने 2008 में मेरे जन्मदिन के महीने के पहले दिन के पहले पल पर बधाई दी थी… याद है मैंने कहा था… “मौत से मिलने की इतनी बेताबी”..

और यह कहते हुए अपनी कृष्ण सी कुटिल मुस्कान के पीछे ये राज़ छुपा जाते हैं कि हो सकता है पुल पार करने के बाद कोई और खाई आपके स्वागत में खड़ी हो, यहाँ तो फिर भी पुल है, वहां तो केवल एक रस्सी से लटक कर चलना होगा…

जहाँ तक गुरु का सवाल है जब तक आपका मैं आप थामे रहेंगी गुरु थामने नहीं आएँगे… आप खुद को छोड़िये तो सही पूरा अस्तित्व है आपको संभालने के लिए… उसके बाद भी आप आम इंसान की तरह जीएंगी लेकिन फिर ‘ऊपर ऊपर’… प्रेम भी ‘ऊपर ऊपर’, ईर्ष्या भी ‘ऊपर ऊपर’, सफलता, असफलता, क्रोध, मित्रता, दुश्मनी सबकुछ होगा लेकिन ‘ऊपर ऊपर’… लेकिन अन्दर आप किसी भी बात से प्रभावित नहीं होंगी… एक आनंद की अंतर्धारा सदैव बहती रहेगी.

आपको क्या लगता है ये इतना आसान है… नहीं… मैंने जो ऊपर लिखा … वो सिर्फ लिखने के लिए लिखा या सच में आत्मसात भी किया है ये देखने के लिए बीच बीच में मेरा परिक्षण भी किया जाता है… मैं विचलित नहीं होती यह कहना सरासर झूठ होगा… लेकिन यह समझ आ जाना कि आपको टेस्ट किया जा रहा है… मेरे अन्दर के कम्पन्न को थोड़ा शांत कर जाता है, मैं थोड़े से प्रयास के बाद फिर उसी भावभूमि पर आने में सफल हो जाती हूँ जिस भावभूमि के साथ मैंने उस पुल पर कदम रखा था…

बहुत कठिन है ये डगर…. जीवन को पाना है तो रोज़ मृत्यु से गुज़रना होता है… सच जीवन एक मृत्यु यात्रा है… तभी बब्बा ने कहा हिया… मैं मृत्यु सिखाता हूँ…

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