कभी टुकड़ेखोर मीडिया ने सुनने दिया ‘कश्मीर से मांगें आज़ादी’ का नारा

नारेबाजों के कश्मीर की “आज़ादी” के नारे तो सुने होंगे, कभी कश्मीर “से” आजादी के नारे सुने हैं? पिछले साल करीब-करीब इसी वक्त ये बड़े विवाद का विषय रहा था.

नारेबाजों के “आज़ादी” के नारे ना सुने हों ऐसा तो नहीं हो सकता. इन नारेबाजों के गिरोह में बलात्कार के कई अपराधी भी नकाब बाँध कर शामिल हुए थे. बाद में इनकी करतूतें जगजाहिर भी होती रही और बेशर्मी से सबका बचाव भी किया जाता रहा है.

कश्मीर की “आज़ादी” की वकालत करने वाले जो आधा सच बताते हैं उसमें वो ये नहीं बताते कि आजादी का मतलब क्या है ?

नारेबाज गिरोह अपनी सुविधा के लिए “कश्मीर मांगे निज़ाम ए मुस्तफा” को आज़ादी का नारा कहने लगते हैं. वो आजादी का मतलब क्या? के जवाब में आते ला इलाहा इलअल्लाह के नारे सुनने से इनकार कर देते हैं.

इस अज्ञात “कश्मीरियत” का पक्ष लेते समय वो एक ही पक्ष की सुनने-सुनाने में ऐसे मशगूल हो जाते हैं कि वो कभी कश्मीर के संविधान से आज़ादी मांग रही जनजातियों की सुनते ही नहीं.

कश्मीर से काफी साल से आजादी मांग रहे लोगों में लेह-लद्दाख के लोग भी हैं. आधी अधूरी अपनी सुविधा के हिसाब से तस्वीर दिखाने वाली मीडिया ने बताया नहीं तो ये कम सुना जाता है.

पिछले अक्टूबर (2016) में जम्मू-कश्मीर की पार्टी पी.डी.पी. ने अपने लेह के जिला प्रमुख ताशी ग्याल्सन को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित भी कर दिया था.

लेह-लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देने की मांग का एक मेमोरेंडम ताशी ग्याल्सन ने भी साइन कर दिया था. अब तक इस आशय के कई पत्र केंद्र सरकार को लिखे जा चुके हैं.

इस मामले में गौर करने लायक है कि बीजेपी, कांग्रेस, पीडीपी, और नेशनल कांफ्रेंस के नेता ही नहीं, बल्कि स्थानीय बौद्ध, शिया, सुन्नी, सुफिया नूरबख्श और इसाई समुदायों के मजहबी नेता भी अलग लेह की मांग को लेकर लम्बे समय से अड़े हुए हैं.

अलग-अलग मुद्दों के बाद भी इस मामले में सबकी मांगें एक हो जाती है. इस सिलसिले में शनिवार को यानि दो दिन पहले भी एक रैली हुई.

आश्चर्य है कि विदेशी फण्ड पर पलने वाले टुकड़ाखोर हमें ऐसी ख़बरें कभी नहीं दिखाते! शुक्र है सोशल मीडिया है तो ख़बरें फिर भी आ जाती हैं.

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