देखो कहीं बेटा मांगने के चक्कर में पति को न गँवा बैठो

आज देश में तीन तलाक का विषय चर्चा के केंद्र में है और मुस्लिम महिलायें इसे लेकर काफी मुखर नज़र आ रहीं हैं. मैं टीवी चर्चाओं में आ रहीं मुस्लिम महिलाओं का रुख समझने की कोशिश कर रहा हूँ पर मेरे ख्याल से वो एक गलती कर रहीं हैं.

मुस्लिम महिलाओं की बातें सुनने के बाद एक ही बात समझ में आई कि उन्हें तीन तलाक के मसले का समाधान तो चाहिये पर कुरान की रौशनी में. मेरे हिसाब से मुस्लिम महिलाओं का यह रुख आगे उन्हें बहुत महंगा पड़ने वाला है.

ये तो स्पष्ट है कि जिस रूप में आज तीन तलाक दिया जा रहा है कुरान में वैसा बिलकुल भी नहीं है. बकौल कुरान तीन तलाक एक साथ नहीं दिया जा सकता और अगर किसी ने दे दिया तो उसे तीन नहीं बल्कि एक ही माना जायेगा और मर्द के पास रुजु करने के मौके होंगे.

इसलिये मुस्लिम महिलायें अगर सुप्रीम कोर्ट जातीं हैं और कुरान की रोशनी में महिला कानून की मांग करती हैं तो यकीनन तीन तलाक का फैसला उनके पक्ष में आयेगा पर बहुविवाह की बात तब भी बाकी रह जायेगी क्योंकि चार शादी करने की इजाजत तो कुरान देता है.

इसलिये सवाल है कि फिर मुस्लिम महिलाओं को मिला क्या? किसी औरत के हक़ पर बहु-विवाह से अधिक सेंधमारी और कुछ नहीं हो सकती और मामला सिर्फ यहीं तक नहीं है.

फ़र्ज़ कीजिये कि सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कहता है कि हम अपना पर्सनल लॉ सिर्फ कुरान के आधार पर बनायेंगे और हमने तीन तलाक पर कुरान का हुक्म मान लिया, अब चलिए आप हमें अनुमति दीजिये कि हम कुरान की बाकी बातों को भी अपने पर्सनल लॉ का हिस्सा बनायें.

अगर ऐसा हुआ फिर तो मुस्लिम महिलाओं पर दोहरी मार पड़ेगी, मैं ऐसा इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि कुरान बहुविवाह के साथ-साथ मर्दों को लौंडियाँ रखने और उनसे जिस्मानी ताअल्लुकात रखने की इजाजत भी देता है.

इसलिये अगर मुस्लिम महिलायें कुरान की रौशनी में समाधान मांगेंगी तो चतुर पुरुष समाज उन्हें तोहफे में लौंडियाँ देना शुरू कर देगा इसलिये मुस्लिम बहनों को सरकार और कोर्ट से सिर्फ ये मांग करनी चाहिये कि हमारे हकों का फैसला मजहबी बुनियाद पर न होकर केवल लैंगिक समानता के आधार पर हो अन्यथा बेटा मांगने के चक्कर में पति गंवाने की कहावत तो आज भी गाँवों में सुनी जाती है.

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