एक अधूरा उपन्यास-2 : गुनाहों का देवता है हर पात्र

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यार एक बात बताओ तुम मुझे परफेक्ट बनाना चाहते हो या कम्पलीट?

अर्जुन भौचक्का-सा उसकी तरफ देखता रह गया. उसने कभी उससे इस तरह से बात नहीं की थी. अर्जुन ने एक पल को खुद को संभालते हुए सोचा जब पात्र बड़ा होने लगे तो उससे दोस्ती कर लेना ही उचित है. उसने ज्ञानी मुद्रा बनाते हुए कहा- “इससे क्या फर्क पड़ता है?” फिर खुद ही अपने सवाल पर शर्मिंदा होकर जवाब की प्रतीक्षा करने लगा.

देखो बन्धु, तुम चाहे कम्प्लीट बनाना चाहो या परफेक्ट किसी भी परिपाटी पर पूरा उतरने के लिए मुझे दूसरे पात्रों से तुलनात्मक दृष्टी से बेहतर बनाना होगा. मैं अकेला अपने आप में पूर्ण हो सकता हूँ. दूसरों को भी लग सकता हूँ लेकिन जब यह परिपूर्णता तुलनात्मक हो जाती है तो जीवन के ऐसे कई पहलुओं को उघाड़ती है जो हमें परिपूर्णता की राह की ओर अग्रसर करने में मददगार होती है. और मैं अकेला तो पूरा जीवन नहीं हो सकता ना!! उसके लिए तुम्हें दूसरे पात्र तो गढ़ने ही होंगे.

अर्जुन ने सोचा बात में दम तो है लेकिन ये क्या वह अपने पात्र की सलाह का मोहताज हो गया है? क्या उसकी कल्पना शक्ति में वो सामर्थ्य नहीं रहा? अर्जुन यह सब सोच ही रहा था कि वह फिर बीच में बोल पड़ा.

“बंधु, मुझे तुम्हारी लेखन शक्ति पर ज़रा भी संदेह नहीं है लेकिन कई बार हम कल्पना कुछ और करते हैं और परिस्थितियाँ कुछ और निर्मित हो जाती है. तुम कॉफ़ी हाउस नहीं गए होते तो क्या तुम्हारा ध्यान नीत्शे, सार्त्र और क्या कह रही थी रेखा…”छायाजीवी”, इन सब पर जाता?

अर्जुन कमरे की खिड़की से बाहर देखते हुए सोचने लगा अभी तो यह पहला पात्र ही पूरी तरह निर्मित नहीं हो पाया है और दूसरे पात्रों की कल्पना में सर खपाना होगा….

अर्जुन यह सोचता हुआ पलटता है तो देखता है एक मोटी-सी लड़की उसके पास खड़ी है, साधारण से नाक नक्श, रंग गेहुंआ, बाल खुले…

ये क्या बंधु कुछ तो ढंग का सोचा करो. अरे उपन्यासकारों की नायिकाओं को देखा नहीं क्या कभी- गोरी ना सही, गेहुंआ रंग ही सही फिर भी काया तो छरहरी होती है, जॉर्जट की पारदर्शी साड़ी से झांकती अजन्ता की मूरत न सही, कम से कम अपने उपन्यास के हिसाब से कॉटन साड़ी में रॉयल लुक वाली ही नायिका रच डालते जिसकी चोटी कमर तक जाती हो, जिसकी भंवें कमान जैसी और लब आमंत्रण सी मुद्रा में…….

हो गया? अर्जुन बीच में ही बोल पड़ा. यार तुम समझते नहीं हो… दूसरे उपन्यासकारों जैसा ही बनाना होता मुझे अपना उपन्यास तो तुम भी यहाँ इस तरह से मुझसे बात नहीं कर रहे होते. ज़रा ठहरो मुझे कुछ सोचने दो.

अर्जुन की बात सुनकर “वह” कंधे उचकाता हुआ फिर उसी टेबल पर जा बैठता है. टेबल पर रखी हुई “गुनाहों का देवता” उठा लेता है. और बुकमार्क लगा हुआ पन्ना खोलकर पढ़ने लगता है……

“पम्मी एक हल्की फ्रांसीसी खुशबू से महक रही थी. शैम्पू से धुले हुए रूखे बाल जो मचल पड़ रहे थे, खुशनुमा आसमानी रंग का एक पतला चिपका हुआ झीना ब्लाउज़ और ब्लाउज पर एक फ्लैनेल का फुल पेंट, जिसके गेलीस कमर, छाती और कंधे पर चिपके हुए थे. होठों पर एक हल्की लिपस्टिक की झलक मात्र थी और गले तक बहुत हल्का पाउडर जो बहुत नज़दीक से ही मालूम होता था. लम्बे नाखूनों पर हल्की गुलाबी पैंट….”1

अर्जुन ने अचानक किताब उसके हाथ से ले ली और उस पृष्ठ को खोलकर पढ़ने लगा जहां दूसरा बुकमार्क लगा था…

“सुधा के चारों ओर एक विचित्र सा वातावरण था, एक अपार्थिव स्वर्गिक ज्योति के रेशों से बुना हुआ झीना प्रकाश उस पर छाया हुआ था. गले में पड़ा हुआ आँचल पीठ पर बिखरे हुए सुनहरे बाल, अपना सबकुछ खोकर विरक्ति में खिन्न सुहाग पर छाये हुए वैधव्य की तरह सुधा लग रही थी. मांग सूनी थी, माथे पर रोली का बड़ा सा टीका था और चेहरे पर स्वर्ग से मुरझाये हुए फूलों की धुलती हुई उदासी जैसे किसी ने चांदनी पर हरसिंगार के पीछे छींटें दे दिए हो…”2

अर्जुन ने जैसे ही पढ़ना बंद किया उसने देखा “वह” व्यंग्यात्मक मुस्कान लाकर उसकी ओर देख रहा है.

अर्जुन ने त्योरियां चढ़ाकर एक बार उसकी आँखों में झांका तो वह टेबल पर से उतर कर दोनों हाथ पीछे बांधकर कमरे में टहलने लगा.

“हम्म्म्म…. तो प्रॉब्लम यहाँ है….”

“प्रॉब्लम! कैसी प्रॉब्लम अर्जुन ने झुंझलाते हुए कहा.

तो आपकी नायिका पवित्रता की मूरत, अध्यात्म में लीन और जीवन को परमात्मा की देन समझती है. जिसके लिए प्रेम परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग है…

“हम्म्म्म …. शायद….”

“क्या शायद!!! जो प्रेम प्रेमी तक भी न पहुँच पाए वो प्रेम परमात्मा तक कैसे पहुँच जाएगा.

प्रेम का दरवाज़ा क्या सिर्फ शरीर से ही खुलता है? अर्जुन ने भौंहें टेड़ी करते हुए पूछा.

बंधु, प्रेम एक शहर से दूसरे शहर में बाय रोड जाने के लिए बनाए गए टोल टैक्स के स्टोपेज है क्या? परमात्मा तक पहुँचने के लिए तो सारे रास्ते खुले है लेकिन ये बताओ ये परमात्मा कहाँ से आ गए बीच में. हम तो नायिका की बात कर रहे थे ना.

यार एक स्त्री और पुरुष के बीच कोई सम्बन्ध बताना हो तो जीवन की समग्रता को उसके सारे पहलुओं को भी स्वीकार करना होगा ना. विपरीत के प्रति दैहिक आकर्षण से प्रेम प्लेटोनिक या आध्यात्मिक नहीं रह पाता ये किस किताब में लिखा है?

और साला ये भी किस किताब में लिखा है कि स्त्री और पुरुष को विपरीत लिंगी बताया जाए…. उन्हें एक दूसरे के पूरक कहा जाना चाहिए ना कि विपरीत. क्योंकि यहाँ हर कोई अपने आधे टुकड़े की तलाश में ही भटकता हुआ नज़र आता है…

– यदि ऐसा नहीं होता तो गुनाहों के देवता कहानी के अंत में चंदर और पम्मी का मिलन बताया गया होता… अर्जुन ने तार्किक बुद्धि दिखाते हुए कहा…

लेकिन “उसके” चेहरे पर एक बार फिर वही व्यंग्यात्मक मुस्कराहट थी जिस पर अर्जुन झुंझला रहा था. कहने लगा- और यदि आपकी बात सही है तो कहानी के अंत में मिलन तो चंदर और सुधा का भी नहीं बताया गया है. चंदर का विवाह तो किसी तीसरी नायिका से होता है.

अर्जुन को लगा शायद उसका पलड़ा हल्का हो रहा है तो वह अपनी बात संभालते हुए बोला- हाँ तो ठीक भी है ना, प्रेम यदि सिर्फ दैहिक आकर्षण है तो प्रेम कहाँ हुआ और प्रेम आध्यात्मिक है तो मिलन की क्या ज़रूरत…

“वह” ठहाका मारता हुआ बोला- बंधु, ये बात सिर्फ पुरुष पर ही लागू होती है क्या कि दैहिक आकर्षण को भी आजमा कर देख लो, आत्मा की पुकार भी सुन कर देख लो और यदि दोनों समाज के नियमों पर खरे न उतरते हो तो किसी तीसरी से शादी कर लो और हैप्पी एंडिंग ऑफ़ द स्टोरी.

तो इसमें बुरा भी क्या है? उपन्यास के नायक ऐसे ही होते हैं, जीवन के हर पहलू में परफेक्ट. अर्जुन बोला.

परफेक्ट????? चलिए मेरा सवाल घूम फिर कर आखिर आ ही गया कि आप मुझे परफेक्ट बनाना चाहते हैं या कम्प्लीट?? और आप चाहें तो इस पर हम फिर कभी बहस कर लेंगे. आप तो सबसे पहले यह बताइये कि यदि ऐसा सब करके पुरुष परफेक्ट कहलाता है तो हमारी नायिका यदि ऐसा करती है तो?

क्रमशः

– माँ जीवन शैफाली

(1,2 धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों के देवता से)

पहला भाग – एक अधूरा उपन्यास -1 : प्रस्तावना, सार्त्र से पात्र तक

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