वैचारिक गंदगी लगे चश्मे को उतारे बिना कैसे करोगे पत्रकारिता!

बचपन में आपने वह कहानी जरूर पढ़ी होगी जिसमें किसी गांव में हाथी आता है तो चार अंधे वहां पहुंचते हैं और हाथी के अलग-अलग अंगों को छूकर महसूस करते हैं कि हाथी कैसा होता है. इसके बाद अपने द्वारा छुये गये अंग को ही संपूर्ण हाथी मान कर आपस में उलझ जाते हैं.

वास्तव में यह कहानी मैं आपको इसलिये याद दिला रहा हूं क्योंकि आज तीन अंधों की अनुभूति का वर्णन पढ़ने को मिला. दरअसल ओड़िसा के भद्रक में साम्प्रदायिक तनाव की स्थिति बन गयी थी.

मामला यह था कि वहां एक मुसलमान ने अपने फेसबुक वॉल पर भगवान श्री राम और माता सीता के संबंध में कुछ अभद्र टिप्पणियां लिखी थी. जिसे पढ़कर विश्व हिंदू परिषद् और बजरंग दल के कार्यकर्ता सड़क पर उतर आये.

कार्यकर्ताओं की मांग थी कि अभद्र टिप्पणी करने वाले के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करके उसे गिरफ्तार किया जाय. लेकिन उसी समय कुछ मुसलमानों की ओर से भीड़ पर पथराव कर दिया गया. इसके बाद तो भीड़ बेकाबू हो गयी और घरों में तोड़फोड़ के साथ दुकानों में आगजनी तक की घटनाएं हो गयीं.

अब इसी खबर को तीन प्रसिद्ध न्यूज़ चैनलों ने कवर किया और अपनी वेबसाइट पर इस न्यूज़ को साझा करते हुये एक से बढ़कर एक हेडलाइन तैयार करके लिख डाली.

पहली हेडलाइन थी कि “भद्रक में साम्प्रदायिक तनाव, अर्धसैनिक बल तैनात.”

दूसरी हेडलाइन थी कि “भद्रक में विश्व हिन्दू परिषद् के कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी से दंगे की स्थिति.”

तीसरी हेडलाइन थी कि “भगवान राम पर अभद्र टिप्पणी से भद्रक में दंगा, कर्फ्यू के आदेश जारी.

इन तीनों हेडलाइनों को पढ़ने के बाद मेरे द्वारा सुनाई गयी कहानी का अभिप्राय समझ में आने लगा होगा.

भद्रक की घटना जैसी भी थी जितनी भी थी, एक ही थी. लेकिन उस घटना के संबंध में न्यूज़ चैनल के पत्रकारों ने अपने हाथ आयी खबर के आधार पर ही हाथी के शरीर की अनुभूति की तरह ही खबरों को भी वर्गीकृत करके रख दिया.

हद तो तब हो गयी जब कुछ ने मूल घटना की रिपोर्ट में सिर्फ विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी को ही कोट करना उचित समझा.

अलबत्ता उपरोक्त कहानी के अंत में तो उन चारों अंधों को एक आंख वाला अच्छा भला आदमी मिल गया जो सभी को समझा कर यह बताने में कामयाब रहा कि वास्तव में हाथी कैसा होता है.

वैसे तो कहानी अंधों की थी तो उनकी मजबूरी समझ में आती है कि वे देख नहीं सकते थे. परंतु इन पत्रकारों को कौन सी रतौंधी हुई थी?

वास्तव में इनकी आंख इनकी विचारधारा के चश्मे से ढंकी हुई है. उस विचारधारा के आधार पर ही ये किसी घटना को देखते हैं और समझते हैं.

लेकिन इन पत्रकारों को वह भला आदमी कब मिलेगा जो इन्हें यह समझा सके कि वास्तव में घटना एक ही है. उसे अपने-अपने वैचारिक गंदगी लगे चश्मे को उतार कर देखा जाए तो रिपोर्ट पूरी और ठीक भी बन सकती है.

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