भैरव

भैरव जैसे ही ट्रेन से उतरा, स्टेशन पर उसके पिता पंडित उदयभान पाण्डेय ने बड़े स्नेह से गले लगा लिया. हर्षातिरेक से आँखे छलक आयीं थीं उनकी, आखिर उनका लाड़ला बेटा साल में छठें-छमाहे ही तो घर आ पाता है.

पंडित जी ने एक नजर भैरव को देखा; छः फुट का बाँका बलिष्ठ नौजवान, तलवार छाप मूँछे और उसपर सेना की वर्दी. आखिर वर्दी वालों की ठसक ही कुछ और होती है! उनका खुद का सीना गर्व से भर आया.

दोनों बाप-बेटे स्टेशन से बाहर आये, भैरव ने अपना सामान जीप में रखा, पिता से चाभियाँ ली और गाड़ी गाँव की पक्की सड़क पर दौड़ा दी. पिता – पुत्र के बीच की तमाम दुनिया-जहान की बातों में ही रास्ता कट गया और घर पहुँच गये.

घर पहुँचते ही कविता लिपट गयी उससे. कविता, उसकी पत्नी; आह्लादित हो उठा था वह ! पिता ने बड़ा देख-सुन कर ऐसी गुणवती और रूप की स्वामिनी को चुना था उसके लिए. भैरव के मन में प्रेम का सागर उमड़ आया और वहीं कविता उसके हृदय से सिर लगा अपनी घनी पलकें झुकाए चुप-चाप खड़ी थी.

अभी तो उन्हें देखने की कितनी उत्कंठा थी उसके जी में! सुबह उठकर सारे काम निपटाकर भोला से मेहंदी पिसवाई और क्या खूब गहरा रँग चढ़ा था मेहंदी का. भैरव ने उसके हाथ को थाम कर उसकी मुठ्ठी खोली, उसके गोरे हाथों पर मेहंदी का चटख गाढ़ा रंग और भी खिल रहा था.

भैरव ने कहा तुम्हारी याद आती है तो कविता ने अपना हाथ उससे छुड़ा कर उसे अपने बाहुपाश में भरते हुए कहा हमें भी आपकी बहुत सुधि आती है. कमरे में दो पल की चुप्पी छाई रही फिर कविता अपना सिर उठाकर बोली जानते हैं ! शगुफ़्ता की शादी होने वाली है.

भैरव चौंका ! “कब ?”

कविता :- ” अगले महीने की 25 तारीख को. ”

भैरव कविता को सीने से लगाये ही धम्म से पलँग पर बैठा और यादों में खोता चला गया.

उसे याद आया करीब दस-ग्यारह साल पहले का समय. शगुफ़्ता उसके गाँव के ही लियाक़त अली खान की बेटी थी. लियाक़त मियाँ गाँव के पुराने रईस थे. अब वह सम्पत्ति और शान बाकी न थी पर क्षेत्र में बड़ा सम्मान था.

उनका निकाह खानदानी रिवाज़ और दीन की रोशनी में उनके ही किसी सगे रिश्तेदार की बेटी से हुआ पर दुर्भाग्य से संतान सुख न प्राप्त कर सके. करीब सात – आठ प्रसव और सब में अजन्मे अविकसित मृत बच्चे; पहले तो तुरत-फुरत में तमाम स्वनामधन्य हकीमों की शरण ली फिर बड़े पीर की दरगाह और जाने कितनी मज़ारों पर भी मन्नत मांग आये लेकिन हर जगह से निराश हो, हार मानकर डॉक्टरों के पास गए तो वहाँ से जो जवाब मिला सुनकर पैरों तले जमीन ही खिसक गई !

सगे खून में सदियों से निकाह की परंपरा ने कुछ अनुवांशिक बीमारियों को जन्म दिया था जिसका इलाज किसी मर्दाना कमजोरी दूर करें की दवा बेचने वाले हक़ीम के पास तो क्या खुद डॉक्टरों के पास नहीं था, नितांत दूसरा उपाय अमल लाया गया. लियाक़त मियाँ का दूसरा निकाह एक दूर की ऊँचे घराने की हम कौम खातून से हुआ और इस बार अल्लाह के फज़ल से चार लड़कों के बाद शगुफ़्ता का जन्म हुआ.

बात शायद हाईस्कूल की थी. एक दिन दोपहर में स्कूल से छुट्टी के बाद भैरव घर लौट रहा था तो देखा की पड़ोस के गाँव के दो-चार मनचले शगुफ़्ता पर इशारे करते और सिटी बजाते पीछे लगे हुए हैं और वह डरी – सहमी बचती हुई भागी-भागी चली जा रही है. भैरव के तन-बदन में आग सी लग गयी यह देखकर. अपनी साईकिल पटक कर भिड़ गया वह तीनों से और पीछे से आते अन्य लड़कों ने भी मोर्चा संभाला. तीनों को जी भर कर धुनने के बाद अपने कपड़ों की धूल झाड़ता हुआ खड़ा हुआ तो देखता है कि वह भोली बालिका मारे डर के रुआँसी खड़ी है. वह शगुफ़्ता की ओर देखकर बोला अरे रोती क्यों है रे? और सुन किसी से डरा मत कर ! मैं हूँ न तुम्हारा भाई !

अब दोनों स्कूल से अक्सर साथ ही हँसते-बतियाते लौटते और क्या मज़ाल की शगुफ़्ता को कोई निगाह ऊपर कर देख ले ! भैरव तबियत से धुनाई करता था सबकी .

अपनी माँ का मुख न देखा था भैरव ने. उसे शगुफ़्ता के टिफिन की रोटियाँ और उसकी स्नेहसिक्त बातें बहुत सुख देती थीं और भाईयों के नाम पर पाषाणहृदयी हुक्मरानों को देखती बड़ी हुई शगुफ़्ता भी अपने इस मुंहबोले भाई को बहुत चाहती थी.

यूँ ही एकदिन दोनों स्कूल से लौट रहे थे कि लियाकत मियाँ की निगाह पड़ गयी और वह अर्थ का अनर्थ लगा बैठे.

शायद शगुफ़्ता के प्राण उस दिन न बचते अगर उसकी बूढ़ी दादी बीच में न आ जातीं. लियाक़त अली अपने आपे में न थे. शगुफ़्ता के बाद वह पंडित उदयभान पांडेय की बखरी की तरफ़ लपके. पहुँचे तो भैरव छप्पर के नीचे किताब खोले चारपाई पर बैठा था. उसे देखते ही उनकी आंखों में खून उतर आया. उधर कुछ समय पहले आये तूफ़ान से अनजान भैरव उन्हें देखते ही चारपाई से उतर बोला चचा प्रणाम ! क्या बात है ?

लियाक़त :- ” बदतमीज, बदचलन लड़के में तेरा मुँह तोड़ दूँगा. ”

भैरव :- ” चचा होश में बात करिए ! फिर से भँग पी है क्या ? मुझपर क्यों बिगड़ते हैं ? ”

लियाक़त :- ” क्या किया है ? तूने मेरी शरीफ़ बच्ची पर गंदी नज़र डाली ! ”

भैरव की कनपटियाँ मारे क्रोध के लाल हो गईं गरज कर बोला :- ” चचा जुबान सम्भाल कर बात कीजिये! बहन है वह मेरी ; महादेव की सौगंध जो उसके लिए एक क्षण भी कुछ गलत सोचा हो. ”

लियाक़त अली अपने होश में न थे. मारे क्रोध में कह बैठे “काफ़िर झूठ बोलता है. झूठी क़सम खाता है. ”

भैरव ने अबतक सोचा था कि इनको कोई ग़लतफ़हमी हुई है अतः विश्वास दिलाने के लिए उसने शपथ ली पर प्रत्युत्तर में अपने धर्म को लेकर हुई इस अवांछित टिप्पणी को न सह सका. उसका खून उबल पड़ा था मानो और क्रोध में उसने भी कह दिया ” चचा झूठी कसमें खाने और ऐनवक्त पर दगाबाजी का शौक़ तो आपकी कौम का रहा है. और हाँ तलवारों से डर कर धर्म बदल देने वालों के मुँह से काफ़िर शब्द अच्छा नहीं लगता. ”

लियाक़त अली सन्न रह गए , मारे क्रोध के मारने झपटे की उन्हें पंडित उदयभान, जो बाहर का शोर सुन अब तक ड्योढ़ी पर आ गए थे; की गरजती आवाज सुनाई पड़ी ” खबरदार लियाक़त मियाँ ; जो हाथ लगाया तो ! ”

लियाक़त अली ने पंडित की ओर मुँह घुमाकर कहा तो समझाओ इस बित्ते भर के छोकरे को और पैर पटकते हुए लौट आये.

बात धीरे-धीरे आई-गई हो गयी लेकिन शगुफ़्ता भैरव से बोलने को तरस कर रह जाती. भैरव स्वयं चाहता पर लियाक़त मियाँ के कटु व्यवहार ने उसके पैर जकड़ रखे थे.

बारहवीं पास कर भैरव ने इलाहाबाद से स्नातक किया और सेना की चयन परीक्षा पास कर सेना में कमीशन प्राप्त कर लिया. पिता की आँखे सजल हो आयीं थीं जब उन्होंने उसके नियुक्ति पत्र पर उसका नाम पढ़ा.

‘लेफ्टिनेंट भैरव पाण्डेय; फ़र्स्ट बटालियन मराठा लाईट इन्फैंट्री (ओल्ड 103 मराठा लाईट इन्फैंट्री ), जंगी पलटन ‘

कितनी कठिनाइयों और अभावों में पाला था बेटे को और आज उनकी वह तपस्या सफल हो गयी.

इधर लियाक़त अली की भी उम्र अब ढल गयी थी. धन-संपत्ति का तो बस नाम भर था. बड़े सुपुत्र मीर अली खान पक्के जुआरी थे और पर्याप्त रुपये उड़ा चुके थे इस महान कार्य में. दूसरे साहब को सुरा और सुंदरी का शौक था, रही सही खानदान की इज्ज़त ये मिट्टी में मिला रहे थे.

तीसरे जनाब हुए मुर्शिद अली खान, आठवीं फेल पर ख़ुदा की मेहरबानी से कोई गलत राह न पकड़ गृहस्थी का भार संभाले हुए थे और चौथे ने इंजीनियरींग की पढ़ाई और निकाह के बाद जब नौकरी के सिलसिले में दुबई की राह ली तो पीछे थूकना भी गवारा न समझा.

लियाक़त अली का दुनियादारी से मोहभंग हो चुका था यूँ कहिये कि बस शगुफ़्ता की फ़िक्र उन्हें मरने से रोके थी. पैसों की लाचारी उन्हें रोके पड़ी थी और इधर सेना की सर्विस के आगे भैरव का गाँव से वास्ता ही छूट गया था.

भैरव यादों में खोया हुआ बेचैन होकर सबकुछ कविता को बताए जा रहा था और वह चुपचाप सुनती जा रही थी और जब वह चुप हुआ तो बोली कि अरे तब की छोड़िये और कल जाकर मिल लीजिये उससे.

शाम को जब भैरव ने पिता से जिक्र किया तो वह भी बोल पड़े कि हाँ शगुफ़्ता अच्छी है लेकिन लियाक़त अली की माली हालत ठीक नहीं. लड़के नकारा निकल गए केवल मंझला साथ है तुम कल जरूर जाना उसे अच्छा लगेगा.

अगली सुबह भैरव लियाक़त अली के दरवाजे पर था. खान साहब कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे कि भैरव के अभिवादन से उनका ध्यान भँग हुआ. देखते ही बोले आओ-आओ बेटा! कैसे आना हुआ ?

भैरव :- ” बस घर आया तो पता चला कि शगुफ़्ता की शादी है सो मिलने चला आया. ”

लियाक़त :- ” अच्छा किया ! जरा बैठो अभी बुलाता हूँ. ”

उन्होंने आवाज लगाई और कुछ देर में शगुफ़्ता चाय लेकर आई. उसे देख जैसे बरसों का दर्द छलक आया हो. वह रो पड़ी और भैरव उसे गले लगा कर बोला रोटी क्यों है पगली ? मैं हूँ न तेरा भाई ! उसने उत्तर दिया बस यही सुनने को कान तरस गए थे भईया.

यूँ ही बातों का दौर चल निकला और उसी दरम्यान लियाक़त अली न चाहते हुए भी अपनी व्यथा छिपा न सके. दरअसल पहले तो वह सशंकित रहते थे लेकिन भैरव के मन में कुछ गलत था ही नहीं और फिर समय ने ऐसा पलटा खाया कि जहाँ भैरव ने प्रसिद्धि और धन दोनों अर्जित किया वहीं खान साहब की सारी साहिबी निकल गयी थी.

बोल पड़े थे कि अब नहीं देखा जाता बेटा; जैसा इसकी किस्मत में होगा वही देखेगी. अंधे कुएँ में ढकेल दे रहा हूँ. मुश्किल से बात तय हुई है लड़का उम्रदराज़ है पर क्या करूँ ?

भैरव ने टोकना चाहा तो उनके अंदर का गुबार और निकल आया ! बोल पड़े घर की हालत छुपी नहीं है तुमसे, दो लड़के तो पूरे कमज़र्फ निकल गए केवल ले-देकर तीसरा साथ है. खून-पसीना एक करके पढ़ाया था चौथे को तो उसने मय बीवी दुबई की राह धर ली, फिरकर न झाँका की जीता हूँ या मर गया ! क़ब्र में पाँव लटके हैं और इसकी जिम्मेदारी सर पर पड़ी है. समझ नहीं आता कि क्या करूँ ?

भैरव बोला चचा बुरा न मानिए तो एक बात कहूँ.

लियाक़त अली ने हाँ में सिर हिलाया तो भैरव ने उत्तर दिया चचा पहले तो यह रिश्ता नामंजूर करिए और अपनी पसंद का लड़का चुनिए , पैसों का प्रबंध मुझपर छोड़ दीजिए. लियाक़त अली कुछ बोलने को हुए पर भैरव ने उनकी बात काट कर कहा चचा बहन है मेरी तो कुछ दायित्व मेरे भी हैं.

छोटा था तो तरस जाता था कि काश मेरी भी एक बहन होती जो रक्षा बंधन पर मुझे टीका लगा और आरती उतारकर राखी बांधती जिसके बदले मैं उसे आशीर्वाद और नेग स्वरूप कुछ रुपये देता. यही मतलब था मेरे लिए रक्षाबन्धन का छुटपन में. आज मत वंचित कीजिए मुझे मेरे दायित्व से !

लियाक़त अली का सिर लज़्जा और आत्मग्लानि से झुक गया था. दोनों को गले लगाकर याचना के स्वर में बोले माफ़ कर दो बेटा तुम दोनों मुझे.

बीस दिनों बाद शगुफ़्ता की शादी हो रही थी. रंगीन गोटे जड़े शरारे और चुनरी में श्रृंगार किये हुए शगुफ़्ता अद्वितीय सुंदरी लग रही थी. मौलवी निकाह पढ़ा रहे थे और शगुफ़्ता का होने वाला पति परवेज मंत्रमुग्ध सा बस उसे ही निहारे जा रहा था.

लोग बाग-बाग हो लियाक़त अली को उनकी शानदार व्यवस्था और आवभगत के लिए धन्यवाद और मुबारक़बाद दे रहे थे. वहीं भैरव सुनहरे रंग का रेशमी कुर्ता पहन, माथे पर ऊँचा तिलक लगाये और मुँह में बनारसी मगही पान घुलाते हुए बड़े सलीके से सारी जिम्मेदारी सम्हाले हुए था. लियाक़त अली ने आकर उसका हाथ पकड़ लिया और बोले बेटा मेरी इज़्जत रख ली तुमने और भैरव ने उत्तर दिया ये तो मेरा फर्ज़ था चचा.

थोड़ी दूर खड़े भैरव के पिता पंडित उदयभान पांडेय ये देख मुस्कुराए और सोचने लगे कि ठीक ही तो नाम रखा था उन्होंने अपने पुत्र का ‘ भैरव ‘ !

जब माँ सती ने अपने पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अग्निस्नान कर प्राण त्याग दिए और महादेव के तांडव नृत्य के पश्चात उनके अंग जहाँ-जहाँ सुदर्शन चक्र से कटकर गिरे वहाँ भगवान शिव ने स्वयँ अपने हाथों से शक्तिपीठों की स्थापना कर उनकी रक्षा के लिए प्रत्येक स्थान पर एक-एक भैरव को नियुक्त किया.

और भैरव भी तो बचपन से रक्षा ही कर रहा है, पहले शगुफ़्ता की फिर स्वयं उनके और अपने आत्मसम्मान की, देश की और आज फिर शगुफ़्ता के साथ लियाक़त अली के सम्मान की. उन्हें फिर से अपने भैरव पर गर्व हो आया.

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