सभी पक्ष सामने आने चाहिए और नहीं होना चाहिए किसी का मीडिया ट्रायल

1997-98 की बात है, मैं 11वीं में पढता था और पापा विधायक थे, दिग्विजय के गढ़ में अकेले भाजपाई, लड़ते भिड़ते, विधानसभा में भी और ज़मीन पर भी, जब हर छुटभैय्ये नेता ने अपनी व्यक्तिगत गाड़ी में चलने की आदत बना ली थी तब पापा सरकारी बस में सफर करते.

भोपाल से राजगढ़, लगभग हर दूसरे दिन, कम ही लोगों को पता होगा कि सरकारी बस में एक सीट आरक्षित होती है जिस पर लिखा होता है “विधायक सीट”, पापा के अलावा मध्यप्रदेश के चंद और विधायक ही होंगे जिन्होंने अपने जीवन में बस में कभी सफर किया होगा.

खैर एक शाम मैं भी पापा के साथ चढ़ा, भोपाल से राजगढ़, बस खचाखच भरी थी, पैर रखने की भी शायद जगह हो, हम जैसे तैसे बस में चढ़े, पापा ने अपना परिचय दिया, कंडक्टर ने अनुरोध किया कि हम कुछ मिनट खड़े रहें तब तक वह कुछ व्यवस्था करता है.

कंडक्टर ने जैसे तैसे आरक्षित विधायक सीट पर बैठे एक युवक को उठाया, वह माना नहीं पर उसे अंततः उठना पड़ा क्योंकि सीट आरक्षित ही जनप्रतिनिधि के लिए थी. खैर वो खड़ा हुआ, सामने ही मैं भी खड़ा रहा क्योंकि सीट सिर्फ एक मिली थी, उसके बाद लगभग अगले एक घण्टे इस युवक ने पापा को, नेताओं को, मुझे खूब भद्दी गालियां दी.

फिर एक मौका ऐसा आया कि मेरा धैर्य जवाब दे गया और मैंने लड़के को “धो” दिया, खूब बजाया साले को, बाद में मध्यस्थ लोग आ गए और मामला रफा दफा हुआ!!

अब आज का मीडिया होता उस ज़माने में तो खबर ये बनती कि विधायक पुत्र ने एक सामान्य युवक को मारा, नेता के बिगड़ैल बेटे ने मासूम को मारा, नेता माफ़ी मांगे, उसके बेटे को चौराहे पर लटकाओं साले को, साले ये नेता, कमीने ये नेता, और ये इनके बिगड़ैल बच्चे!

एक और किस्सा सुनाता हूँ, पिछले साल मेरी पत्नी ICU में इंदौर में भर्ती थी, मुझे बेंगलौर से सीधी फ्लाइट नहीं मिली, वाया मुंबई की व्यवस्था हुई.

जेट की फ्लाइट थी सुबह पांच बजे, पौने पांच बजे हमें बताया गया कि फ्लाइट केंसल हो गयी है “टेक्नीकल कारणों से”, जबकि सही कारण ये था कि जितनी जनता इन्हे चाहिए थी विमान उड़ाने के लिए उतनी बुकिंग ही नहीं हुई थी.

हमें बताने वाली अधिकारी महाअहंकारी, महा बददिमाग, बद्तमीज़ किस्म की महिला थी. उसने हम 25 यात्रियों को इतना ज़लील किया कि पूछिए मत. फिर हम 25 लोगों ने नरेश गोयल के नाम इतनी गालियां निकाली कि एयरपोर्ट पर दंगे जैसा सीन हो गया, CRPF आ गयी.

अंत में मुझे और चार और इमरजेंसी केस वाले लोगों को एयर इंडिया में शिफ्ट किया गया!! क्या आपने हमारी बदतमीज़ी की कोई खबर किसी अख़बार के 15 पन्ने पर भी पढ़ी?

बात ये है कि एयरपोर्ट का “ज्यादातर” ग्राउंड स्टाफ और उड़ने वाला स्टाफ होठों पर कृत्रिम मुस्कान लिया महाअहंकारी “neo racist” किस्म का होता है. मुझे नाम याद नहीं आ रहा पर एक बार एक कवि ने फ्लाइट में हिंदी अख़बार मांग लिया और उस पर बहस हो गयी तो विमान की एमरजेंसी लेंडिंग कर उसे फ्लाइट से उतार दिया गया.

गायकवाड़ गंवार है उसमें कोई शक नहीं, चप्पल से नहीं शिकायत करके और विशेषाधिकार हनन का नोटिस देकर मामला सुलझाना था, पर जिस अधिकारी से हाथापाई हुई वो भी कोई दूध का धुला नहीं है, उसके खिलाफ दस मामले चल रहे हैं एयरपोर्ट और फ्लाइट में हंगामा और झगड़ा करने के!

सभी पक्ष सामने आने चाहिए और किसी का मीडिया ट्रायल नहीं होना चाहिए चाहे वो सांसद हो या प्रधानमंत्री या कोई गाँव का सरपंच….. सिर्फ इसलिए कि वो राजनीति में काम करता है!

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