योगी इन बातों पर ध्यान दें तो सचमुच सुधर जाए उत्तर प्रदेश की शिक्षण व्यवस्था

माननीय मुख्यमंत्री जी,

आप शिक्षा माफियाओं पर नकेल कसना चाहते हैं यह अच्छी बात है. मैं उत्तर प्रदेश का नागरिक होने के नाते कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर आपका ध्यान आकृष्ट कराना चाहता हूँ. उत्तर प्रदेश शासन द्वारा संचालित ‘यूपी बोर्ड’ की शिक्षा प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है. मेरे विचार से इन पाँच बिंदुओं पर ध्यान देकर नीतियां बनाई जानी चाहिये:

1. ढांचागत सुविधाएं (Infrastructure)

इस देश में न जाने कितने ही स्कूल कॉलेज हैं जो फर्जीवाड़े पर चल रहे हैं उनका अस्तित्व सिर्फ दस्तावेज पर है और अपनी इमारत तक नहीं है. जिनके पास इमारत है वहाँ बिजली, शौचालय, प्रयोगशाला जैसी नितांत आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं.

न केवल सरकारी बल्कि शहरों के प्राइवेट स्कूलों में भी प्रायः ऐसी स्थिति है जिनके मालिकों ने स्कूल केवल मुनाफा कमाने के उद्देश्य से खोल रखे हैं. ज़रा सोचिये यदि आपको भीषण गरमी में एक बड़े से कमरे में पांच घण्टे बिठा दिया जाए जिसमें केवल एक पंखा हो जो टीचर के सर के ऊपर हो, तो क्या आप ऐसी जगह कुछ पढ़ना अथवा सीखना चाहेंगे?

धनाढ्य वर्ग के बच्चे जिन प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं वहाँ तो ऐसी स्थिति भी पाई गयी है कि कंप्यूटर लैब में कम्प्यूटर चालू हालत में नहीं होते, एक कम्प्यूटर पर चार चार बच्चों को बिठा कर सिखाया जाता है. लाइब्रेरी की भी यही स्थिति होती है. ऐसे में बच्चे केवल कोरम पूरा करने के लिए उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं.

सरकारी विद्यालयों में शौचालय, पुस्तकालय और लेबोरेटरी की व्यवस्था अनिवार्य रूप से होनी चाहिये. पुस्तकालयों में अखबार तथा विज्ञान की मैगज़ीन के ताजा अंक बिना किसी रुकावट के आने चाहिये. प्रयोगशालाओं में माइक्रोस्कोप का नॉब जाम न हो, स्क्रू गेज, टेस्ट ट्यूब होल्डर पर ज़ंग न लगी हो, सभी रसायन उपलब्ध हों, प्रिज़्म टूटा न हो, लैब में सफाई हो, पानी की समुचित व्यवस्था हो– यदि स्कूल प्रबंधन ऐसी मूलभूत सुविधाएँ न दे सके तो तत्काल मान्यता रद्द की जाये.

2. पढ़ाने की शैली (Pedagogical Skills)

पढ़ाना एक ऐसी कला है जो पढ़ कर नहीं सीखी जा सकती. पढ़ना और सीखना भी दो अलग बातें हैं. पढ़ कर कोई सीख ले यह जरूरी नहीं. स्वयं मन लगा कर पढ़ना अलग बात है, किसी को पढ़ना सिखा देना यह कौशल है.

टीचर ट्रेनिंग के तमाम कोर्स चलाये जाते हैं और बी एड की डिग्री डोनेशन लेकर रेवड़ी की तरह बाँटी जाती है. इस तरह देश की मानव सम्पदा की बड़ी बेरहमी से इस कदर बेकदरी की जाती है जिसका हिसाब लगाना मुश्किल है.

आधे से ज्यादा बी एड ऐसे निकलते हैं जिन्हें खुद पढ़ना नहीं आता तब भी हम उनके हाथों में देश का भविष्य सौंप देने को बाध्य हैं. क्यों? क्योंकि टीचिंग को पेशा तो बना दिया गया किन्तु पेशेवर नैतिकता (professional ethics) के अभाव में शिक्षकों में न तो प्रतिबद्धता है न उत्तरदायित्व की भावना. चुनावों में ड्यूटी और शासकीय योजनाओं में भी शिक्षकों की सेवा लेना कोढ़ में खाज है. यह एक पहलू है.

दूसरी समस्या वहाँ है जहाँ आधुनिक तरीके अपनाये जा रहे हैं. स्क्रीन प्रोजेक्टर लगा कर स्लाइड के माध्यम से जब पढ़ाया जाता है तब वहाँ सहूलियत तो होती है लेकिन बच्चा अपनी अध्यापिका की हैंड राइटिंग नहीं देख पाता.

चॉक से लिखे हुए अक्षर लेखनी की सुंदरता को परिलक्षित करते थे जो किसी फॉन्ट से ज्यादा मनोवैज्ञानिक असर डालती थी. अध्यापिका को लिखता देख हम बच्चे उनसे रेस लगाते थे और शब्दों को अलग अलग तरीके से लिखना सीखते थे. अनुस्वार, हलन्त, बिंदु, चंद्रबिंदु, मात्राएँ इन सबकी बारीकियां लिखना देख सीखा करते थे.

पढ़ाने के तरीके में सुधार का अर्थ स्क्रीन प्रोजेक्टर ही नहीं है, 3D चित्र दिखाना हो तो बच्चों को बाहर ले जाएँ प्रकृति के दर्शन करायें, समाज तथा सरकारी व्यवस्थाएं प्रत्यक्ष दिखाएँ.

गंगा की जमी हुई मिट्टी देखकर बच्चा यह खुद समझ जायेगा कि जिओग्राफी में सेडीमेंट किसे कहते हैं. बच्चों में नागरिक बोध (civic sense) पैदा करें. बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है कि आईआईटी की तैयारी करने वाले बच्चे सड़क पार करने का तरीका तक नहीं जानते.

हर विषय का अपना मौलिक स्वभाव होता है. साहित्य को अर्थशास्त्र की तरह नहीं पढ़ाया जा सकता; गणित को जीव विज्ञान की तरह नहीं पढ़ाया जा सकता. हमें ऐसे टीचरों की फ़ौज चाहिए जो भले ही इंटरमीडिएट स्नातक से ज्यादा न पढ़े हों, किसी एक विषय में भले ही दक्ष न हों लेकिन नन्हें बच्चों को खुद से पढ़ना सिखा सकें.

सामान्यतः बच्चों में तीन तरह की समस्याएं होती हैं. पहला ये कि कुछ बच्चे सामान्य अंकगणित (numerical abilities) में कमजोर होते हैं. दूसरी समस्या है कि अधिकांश बच्चे भाषा (मसलन अंग्रेजी, कभी-कभी हिंदी) पर पकड़ नहीं बना पाते जिसके कारण अन्य विषयों में दिक्कत होती है क्योंकि पाठ्य पुस्तकें उस भाषा में लिखी होती हैं जो बच्चा पूरी तरह नहीं समझता.

तीसरी बड़ी विचित्र समस्या यह है कि छात्र को किसी एक विषय में रुचि उत्पन्न नहीं होती, चाहे वह संगीत या खेलकूद ही क्यों न हो. यह सबसे भयंकर समस्या है जिसके कारण बच्चा किसी एक विषय में दक्ष नहीं हो पाता और समाज में ‘skilled/ specialist’ होने की बजाय ‘generalist’ होकर बोझ बन जाता है.

इसीलिए कहा जाता है कि आजकल की पढ़ाई सरकारी बाबू बनाती है. यह भावना देश के आत्मबल को शिथिल कर देती है. ऐसे में बच्चा मन से नहीं बल्कि रिपोर्ट कार्ड में नम्बर पाने के लिए पढ़ता है तथा अपने अंदर ‘काम भर का’ जैसे तैसे पढ़ लेने की प्रवृत्ति स्वयं विकसित कर लेता है.

वह यह समझ जाता है कि पढ़ाई केवल निजी स्वार्थ के लिए की जाती है जिसका राष्ट्र निर्माण से कोई सम्बंध नहीं. यही काम चलाऊ रणनीति ‘चलता है’ वाली कार्य संस्कृति के रूप में देश के सामने दानव की भाँति खड़ी हो जाती है और परीक्षा में ‘नकल’ जैसी महामारी बन जाती है. एक अध्यापक की शैली ऐसी होनी चाहिये जो इन तीन समस्याओं से जूझ रहे बच्चे और समाज को उबार सके.

3. पाठ्यक्रम (Curriculum)

भारत रत्न से सम्मानित प्रो० सी एन आर राव ने दस बारह साल पहले ही कहा था कि हम अपने बच्चों को सौ साल पुराना ज्ञान दे रहे हैं जिसकी आधुनिक युग में कोई उपयोगिता नहीं है. विज्ञान सम्बंधी किसी भी विषय का पाठ्यक्रम हर दो साल में बदला जाना चाहिए.

यूपी बोर्ड तो छोड़ दीजिये एनसीईआरटी की मानविकी विषयों की पुस्तकों में आज भी 10 साल पुराने आंकड़े यथावत है. नित नए तरीके, तकनीक और साधन विकसित किये जा रहे हैं और हम अपने बच्चों को अभी भी यही सिखा रहे हैं कि दो सौ साल पहले प्रयोगशाला में काँच के उपकरणों से ऑक्सीजन का उत्पादन कैसे किया जाता था.

यूपी बोर्ड के पाठ्यक्रम में उत्तर प्रदेश के भूगोल व इतिहास से सम्बंधित कोई विषय नहीं होता. लास वेगास कहाँ है छात्र यह तो जानना चाहते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि उनके नगर के आसपास कितने गाँव हैं या सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में कितने जनपद हैं और कौन सी जगह किसलिए प्रसिद्ध है. यह बड़ी दुःखद स्थिति है और यही मूल कारण है कि उत्तर प्रदेश की जनता अपने नगर अपने गाँव से प्रेम नहीं करती.

उत्तर प्रदेश में आईटी इंडस्ट्री खड़ी करने की बात की जाती है. अनेक कम्पनियों से अनुबंध करने की नीतियां बनाई जा रही हैं. परन्तु हम अपने स्कूलों के पाठ्यक्रम पर ध्यान नहीं देते. प्रश्न यह नहीं कि कम्प्यूटर विज्ञान पढ़ाया जाये या नहीं, प्रश्न यह है कि कम्प्यूटर विज्ञान में क्या पढ़ाया जाना चाहिये.

वस्तुतः कम्प्यूटर विज्ञान पढ़ने की नहीं सीखने की वस्तु है. हमारे बच्चे यह जान कर क्या करेंगे कि लेडी ऑगस्टा ने क्या किया था या हर्मन हॉलेरिथ ने क्या बनाया था? समस्या ये है कि हम ‘विज्ञान के बारे में‘ पढ़ते हैं किंतु ‘विज्ञान कर के‘ नहीं दिखाते.

सन् 2013 में हादी और अली पार्तोवि ने पूरे अमरीका के बच्चों को कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग की मुफ़्त ऑनलाइन शिक्षा देने का बीड़ा उठाया. उन्होंने कोड डॉट ओआरजी (code. org) नामक वेबसाइट का निर्माण किया जिसे आज माइक्रोसॉफ्ट, फेसबुक से लेकर भारत के इनफ़ोसिस तक का समर्थन प्राप्त है और इस वेबसाइट से दुनिया भर के बच्चे प्रोग्रामिंग सीखते हैं.

किसी भी सॉफ्टवेयर या एप्लीकेशन का आधार प्रोग्रामिंग होती है. इक्कीसवीं शताब्दी में कोड लिखना आना उतना ही आवश्यक है जितना बेसिक गणित और भाषा का ज्ञान.

यूपी बोर्ड के सिलेबस में यदि ऑब्जेक्ट ओरिएंटेड प्रोग्रामिंग (OOP) सिखाना अनिवार्य कर दिया जाये तो दस वर्षों के उपरांत यहाँ स्वतः आईटी इंडस्ट्री खड़ी हो जायेगी. बेसिक प्रोग्रामिंग सीखने के बाद बच्चा जावा, पीएचपी, नेटवर्क सिक्यूरिटी इत्यादि खुद सीख लेगा और कुकुरमुत्ते की भाँति उगे कम्प्यूटर सिखाने वाले बेहूदे संस्थान बन्द हो जायेंगें.

यूपी बोर्ड के पाठ्यक्रम में कम्प्यूटर के साथ संस्कृत की शिक्षा भी अनिवार्य होनी चाहिये. कुछ दिन पहले ही हमारे बड़े भाई बेंगलुरु से बनारस आये थे. वे अपने बच्चे को भारतीय विज्ञान संस्थान भेजने के इच्छुक हैं.

उन्होंने मुझसे कहा कि भा०वि०सं० भेजने से पहले वे अपने बालक को गरमी की छुट्टियों में संस्कृत सीखने के लिए काशी भेजना चाहते हैं ताकि जब उनका सुपुत्र विज्ञान की उच्च शिक्षा पाने के उपरांत संस्कृत साहित्य में निहित वैज्ञानिक दर्शन के मूल ग्रन्थ पढ़े तो उसे दिक्कत न हो.

मैं उनकी बात सुनकर मन ही मन अवाक् रह गया क्योंकि काशी नगरी में योग मेडिटेशन और संगीत सिखाने के सैकड़ों सेंटर खुल गए हैं परन्तु दुर्भाग्य से मैं ऐसे किसी भी गुरुकुल के बारे में नहीं जानता जो बच्चों को महीना दो महीना अपने यहाँ रखकर शास्त्रीय विधि से संस्कृत सिखा सके.

4. मूल्यांकन (Evaluation)

किसी छात्र/ छात्रा का मूल्यांकन उसके अकादमिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष होता है. बहुत से अध्यापक सतही मूल्यांकन करते हैं. कॉपी जाँचते समय ध्यान नहीं देते. प्रश्नपत्रों में घिसे-पिटे प्रश्नों की बहुतायत होती है. गाइड कुंजी के प्रकाशक इसीलिए मालामाल हैं.

प्रतिवर्ष पूछे जाने वाले प्रश्नों में नवीनता होनी चाहिये. प्रश्न पूछने के तरीकों में परिवर्तन होना चाहिये. मूल्यांकन सतही नहीं सटीक होना चाहिये. विज्ञान की प्रैक्टिकल परीक्षा में सख्ती से सावधानी बरतनी होगी क्योंकि अकसर प्रायोगिक परीक्षा में अध्यापक बिना एक्सपेरिमेंट देखे ही नम्बर देकर पास कर देते हैं.

ऐसे में छात्र भला कुछ नया क्यों सीखना चाहेगा? यूपीए काल में लागू हुआ सीसीई पैटर्न यदि यूपी बोर्ड में है तो इसे तत्काल निष्प्रभावी किया जाये. कक्षा छः से इण्टर तक यदि कोई बच्चा फेल होता है तो उसे रोक कर एक वर्ष का मौका और दिया जाये.

कहते हैं असफलता सफलता तक पहुँचने की सीढ़ी होती है. कांग्रेस राज में यह सीढ़ी ही छीन ली गयी थी और बच्चों के मन से आत्मनिर्भरता की भावना ही समाप्त हो गयी थी.

5. शिक्षा व्यवस्था में प्रशासनिक सुधार (Administrative reforms in education)

प्राइवेट स्कूल वाले फीस के नाम पर अभिभावकों को किस तरह चूसते हैं इसके एक उदाहरण पर दृष्टिपात करें: कक्षा पाँच में पढ़ने वाले बच्चे की ट्रांसपोर्टेशन फीस 500 रूपए ली जाती है और हाई स्कूल के बच्चे की ट्रांसपोर्टेशन फीस 1000 रूपए वसूली जाती है. यह कैसी व्यवस्था है?

स्कूल के मालिकों से ज्यादा निष्ठावान तो ऑटो चालक है जो आयु देख कर किराया भाड़ा नहीं लेता. सीबीएसई से मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों की आकाश छूती फीस के कारण ही माँ बाप अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम के क्रिस्चियन मिशनरी स्कूल में भेजने को बाध्य हैं जहाँ फीस कम होती है और संस्कृत अंग्रेज़ी में पढ़ाई जाती है.

आईसीएसई बोर्ड इतना कठिन है कि अब क्रिस्चियन मिशनरी स्कूल भी सीबीएसई पाठ्यक्रम चलाने पर विचार कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जी से अनुरोध है कि महाराज आप अभिभावकों की गाढ़ी कमाई ईसाई मिशनरियों को जाने से रोकिये.

स्कूल के अध्यापक छात्रों को फेल करने की धमकी देकर अपनी कोचिंग में पढ़ने को बाध्य करते हैं. ऐसे किसी भी अध्यापक की शिकायत आने पर जाँच हो और दोषी पाये जाने पर उसे जीवन भर के लिए पढ़ाने से वंचित कर दिया जाये.

कानून ऐसा हो जिससे स्कूल का कोई भी अध्यापक कोचिंग ट्यूशन न पढ़ाये. कोचिंग पढ़ाना हो तो स्कूल की नौकरी (सरकारी चाहे प्राइवेट) त्याग दें. विद्यालय शिक्षा के मन्दिर हैं व्यवसायिक कारखाने नहीं.

प्राइवेट शैक्षणिक संस्थान छात्रों से मोटी फीस तो वसूलते हैं किंतु शिक्षकों को उचित वेतनमान नहीं देते जिसके कारण अध्यापक कोचिंग पढ़ाने को बाध्य होते हैं. स्कूलों की क्या बात की जाये उप्र में ज्यादातर उच्च तकनीकी शिक्षण संस्थान माया-मुलायम-अर्जुन राज में खोले गए थे जिनमें शिक्षा की गुणवत्ता निम्न स्तर की है.

ये कॉलेज अपने यहाँ मास्टर्स और जेआरएफ किये हुए लोगों को बारह पन्द्रह हजार की नौकरी पर रखते हैं. प्राइवेट स्कूल के मालिक शिक्षकों को पूरा दिन खटवाते हैं और उचित वेतन नहीं देते. अब ये सब बदलना चाहिये.

प्राइवेट संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए एक वेतनमान राज्य सरकार की तरफ से फिक्स कर दिया जाये ताकि उनकी क्षमता का अनावश्यक दोहन न हो और वे मन से पढ़ा सकें.

उप्र के तकनीक शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता इतनी हो कि कोई भी लड़का या लड़की जब इंजीनियरिंग एंट्रेंस का फॉर्म भरे तो COMEDK के स्थान पर UPTU को प्राथमिकता दे तब समझिये कि कॉलेज में काम लायक पढ़ाई हो रही है.

उत्तर प्रदेश सरकार को मौलिक विज्ञान में शोध के लिए भी कदम उठाने पड़ेंगे क्योंकि राज्य सरकार द्वारा अनुदान प्राप्त ऐसा कोई उच्च शिक्षण संस्थान अब तक नहीं है. उदाहरण के लिए उड़ीसा सरकार ने सन् 1999 में The Institute of Mathematics & Applications की स्थापना की थी. यहाँ केवल गणित और प्रयुक्त गणित की शिक्षा दी जाती है और आज यह संस्थान देश के अग्रणी संस्थानों में सम्मिलित है.

अंत में शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन की भी आवश्यकता है. ‘कैरियर ओरिएंटेड कोर्स’ महज एक छलावा है. विद्या प्राप्त करने हेतु मौलिक दर्शन है: “सा विद्या या विमुक्तये.” विद्या वह है जो मुक्त करे. बन्धन से मुक्त मस्तिष्क ही आविष्कार कर सकता है. आविष्कार से नवोन्मेष की राह सुगम होती है. नवोन्मेष से आर्थिक प्रगति होती है तब राष्ट्र, राज्य दोनों की उन्नति हो सकती है.

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