पत्तरकार महोदय, खुद की बुद्धि बैल जितनी है या हमें समझ रहे हैं बैल!

दक्षिणी बंगाल की बांग्लादेश से लगी सीमा को “कैटल कॉरिडोर” भी कहते हैं. बांग्लादेश में ज्यादातर गायों की तस्करी इसी सीमा से होती है.

बी.एस.एफ. ने इस इलाके में जो तस्करी के लिए ले जाई जा रही गायें पकड़ी हैं वो 2014 में 1 लाख 21 हज़ार 887 थी, अगले साल 2015 में कुल 1 लाख 51 हज़ार 402 तस्करी के लिए ले जाई जा रही गायें पकड़ी गई. वर्ष 2016 के अगस्त तक ये आंकड़ा 1 लाख 18 हज़ार 711 का था. (सरकारी नीलामी का रिकॉर्ड है, जांच लीजिये)

मान लेते हैं कि एक गाय बिलकुल दुबली-पतली हालत में भी डेढ़ सौ किलो की तो होगी कम से कम. जैसा कि अखबार वाले बताते हैं उसी हिसाब से गौमांस की कीमत भी हम डेढ़ सौ रुपये किलो मान लेते हैं.

वैसे तो ये बकरे की कीमत होती है, फिर भी इस से एक गाय कम से कम 22 हज़ार रुपये की हो जाती है. एक लाख गाय हरेक 22 हज़ार की, मतलब ये हुआ 2,20,00,00,000 ( दो अरब बीस करोड़) रुपये का नुकसान ये तस्कर हर साल झेल सकते हैं.

अब अंदाज़ लगाइए कि जो इतना नुकसान झेल ले वो भी हर साल सिर्फ बंगाल के बॉर्डर पर, वो धंधा असल में कितना बड़ा है?

सिर्फ एक लाख पकड़ी गई गायों को जोड़िये और सोचिये कि इतनी गायों को बांग्लादेश से लगे चार-छह जिलों की सीमा तक पहुँचाने के लिए कितनी गाड़ियाँ, कितने लोग चाहिए?

इतनी सारी गायें क्या खरीद कर लाता होगा तस्कर और फिर बेचता है? मगर इतनी गायें जहाँ हों ऐसी कोई फार्म का तो कभी सुना नहीं ना, जाहिर है इसमें एक बड़ा हिस्सा चोरी का है.

तो इतनी गायें चुराने के लिए कितने लोग लगेंगे? ये सारी गायें उड़-उड़ कर तो सीमा तक पहुंची नहीं हैं, कई-कई दिन पहुँचाने में लगेंगे.

भूखी रही इतनी देर गाय तो वो रम्भाना भी शुरू करेगी और फिर आस पास के लोगों का ध्यान भी जाएगा. कोई चोर-तस्कर आवाज नहीं करना चाहता होगा ना? फिर इतनी गायों का रास्ते भर खुराक-पानी का इंतजाम?

ट्रेन लेट हो जाए तो आपके लिए ट्रेन में खाना ढूंढना मुश्किल हो जाता है, ये गायों के लिए कैसे करते हैं? हज़ारों करोड़ के इस धंधे में आम आदमी का नुकसान नहीं होता, ऐसा है क्या? कौन सा अपराध शरीफ लोगों को नुकसान पहुंचाए बिना होता है?

आप कहना चाहते हैं इस हजारों करोड़ की तस्करी में हत्याएं नहीं होती. पत्तरकार महोदय खुद की बैल जितनी बुद्धि है या आपने मुझे भी बैल समझ लिया है?

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