एकता में शक्ति का नारा ही लगाते रहोगे या उस पर अमल भी करोगे?

किले की दिवार टूटती है. हाँ, वो बिखरे हुए, यहाँ वहां चलाये सौ पचास गोलों से नहीं टूटेगी, लेकिन अगर सही निशाना लेकर वार किया जाए तो टूटेगी. भारत के बहुसंख्यक समाज को कम से कम हज़ार साल से हमले करने की नहीं हमले झेलने की आदत है.

इसका नतीजा ये होता है कि हमारे हमलों की दिशा तय नहीं होती. अनुशासित ना होने के कारण कई बार हमले निष्प्रभावी हो जाते हैं. किलेबंदी कर के बैठा दुश्मन तो सुरक्षित बचता ही है साथ ही हमले के निष्प्रभावी होने से हमारा मनोबल भी गिरता है.

थोड़े ही समय पहले इस दिशा में एक प्रयास किया गया था. आदरणीय तुफैल चतुर्वेदी जी ने गौकाश अख़लाक़ का वध करने वाले युवकों को कानून के पंजे से छुड़ाने के लिए विधि व्यवस्था में लगने वाले खर्चे को जुटाने का प्रयास शुरू किया.

सोशल मीडिया पर चली इस मुहीम में हिन्दुओं ने अट्ठारह लाख रुपये जुटाए थे. जब तक ये प्रक्रिया शुरू हो पाती, उतने में जेल में बंद एक मासूम को जेलर की बेरहमी ने क़त्ल कर डाला. कहना ना होगा कि जेलर किस समुदाय विशेष का था. थोड़े प्रयासों से जुटाए इस आर्थिक मदद की वजह से आज इस मुक़दमे में फंसाए गए दो युवकों को बेल दिलवाई जा सकी है.

गौर करने लायक है कि पहलू खान के मारे जाने पर भी वैसा ही छाती कूट कुहर्रम मचेगा. जमीन पर पहले से ही सैंकड़ो ऐसे संगठन काम कर रहे हैं जो गौरक्षा के लिए कृतसंकल्प हैं. जरूरत है तो बस इसे एकीकृत करने की.

एक जगह से दूसरी जगह जाना समय और खर्चे का काम है, ये हर बार संभव नहीं होगा. लेकिन अपने अपने शहर में अगर आपको कोई गौसेवा वाले नजर आते हैं तो कम से कम उनका नाम-पता तो इकठ्ठा किया जा सकता है ? एक जगह अगर उनका नाम-पता इकठ्ठा अगर इन्टरनेट पर ढूँढने वालों के लिए हो तो भी काफी काम हो सकता है.

जैसे अलग अलग संस्थान अलग अलग RTI  से जानकारी इकट्ठी कर सकते हैं. एक ही प्रश्न पूछने पर दो गौरक्षकों का समय बेकार नहीं जाएगा, पहले से ही मौजूद जानकारी को आगे बढ़ाया जा सकता है. संख्या बल में बढ़ोत्तरी के साथ ही स्थानीय चुनावों में इसे मुद्दा बनाने का मौका मिलेगा. पहले से एक बार मामले में पकड़े जा चुके अपराधियों की पहचान आसान होगी. स्थानीय पुलिस-प्रशासन से बात करने में सुविधा होगी. ऐसे कई फायदे हैं जो एक जगह इकठ्ठा नाम-पते भर से हो जायेंगे.

जरूरत है तो बस थोड़ा सा कष्ट करने की. सवाल ये है कि क्या प्रमाद, आलस्य, कोई और करे, भगत सिंह पड़ोसी के घर पैदा होता की भावना से भरा हिन्दुओं का समाज अपनी जिम्मेदारी खुद उठाना सीखेगा?

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