अलवर : जब हम बच्चे नहीं देख सुन सके गाय का यूं मरना, फिर ये तो बड़े थे!

बचपन का एक सहपाठी था जावेद कुरैशी, कसाइयों के खानदान से था पढ़ने में डफर पर शरारतों में अव्वल, छठी क्लास में एडमीशन लिया था हमारे ही क्लास सेक्शन का था.

रोज लंच में मीट लेकर आता था और खाकर ना जाने कब हड्डियां हम लड़कों के बस्ते में डाल देता था जब भी उससे कहो तो कान पकड़ कर बोलता था अल्लाह कसम आज तो मैं बड़े का गोश्त लाया और ये हड्डी तो बकरे की हैं. कभी कहता आज मैं बकरे का गोश्त लाया और तुम्हारे बस्ते में मिली हड्डी तो भैंसे की है.

मास्साब से शिकायत करो तो उनसे भी कान पकड़ कर कहता था अल्लाह मियां की कसम आज मैं गोभी आलू की सब्जी लाया, मैं तो गोश्त स्कूल में लाता ही नहीं. हम सब उसकी इस हरकत से आजिज आ गये थे.

एक दिन लंच करते हुये बोला आज मैं तुम लोगों की गौमाता का गोश्त लाया हूं. तुम लोग जिसे पूजते हो उसकी तो हम लोग दावतें उड़ाते हैं और भी बहुत कुछ अनर्गल गाय के बारे में खाना खत्म करने तक बोलता रहा.

हम सभी ने आखों आंखों में इशारा किया और उसको फील्ड में खेलने के लिये बुला कर ले गये. फील्ड में एक पेड़ के नीचे हम पांचो उसको घेर कर बैठ गये और पूछा ये बता जावेद तू तो कसाई है गाय को काटते कैसे हैं?

कुछ नहीं यार बड़ा सिम्पल है अम्मी गाय को खूंटे से बांध देती है और अब्बू लोहे की बाल्टी उसके सर पर तब तक मारते हैं जब तक वह चक्कर खा कर जमीन पर गिर ना पड़े. गाय के गिरते ही हम चारों भाई बेलचा (लोहे का यंत्र जिससे गिट्टी आदि मजदूर उठाते हैं) लेकर उसकी टांगो पर जब तक मारते रहते हैं जब तक वह उठ कर भागने की कोशिश करना नहीं छोड़ती.

हम सबकी आंखे क्रोध से अंगार हो चुकी थीं पर अपना गुस्सा छिपाते हुये मैंने प्यार से पूछा फिर क्या करते हो गाय के साथ?

अबे यार एक दिन घर ही चलो खुद अपनी आंख से ही देख लो तुम्हारी गौ माता कैसे जिबह होती है.

नहीं यार अपनी इतनी हिम्मत कहां जो कटते देख लें तू ही बता दे ना.

फिर क्या बेट्टा तुम क्या जानो अधमरा जानवर कितना खतरनाक होता है उसकी चीखने चिल्लाने की आवाजें सुन कर तुम लोग तो मूत ही दोगे वो तो हमारा ही कलेजा है जो जमीन पर खुर रगड़ती रम्हाती गाय की टांगो को चारो भाई दबोच कर बैठ जाते हैं जिससे वह फड़फड़ाये ना अम्मी और आपा उसका मुंह कस कर पकड़ कर ऊपर उठाये रहतीं हैं और अब्बू चापड़ से उसके गले में चीरा लगा देते हैं.

चीरा लगाते ही खून का फव्वारा छूटता है अब्बू तो पूरे खून में नहा जाते हैं कुछ छींटे हमारे कपड़ों पर भी आ जाते हैं. जब तक गर्दन पूरी कट कर अलग नहीं हो जाती अम्मी आपा पकड़े रहतीं हैं और अब्बू चापड़ गर्दन पर रगड़ते ही रहते हैं फिर धीरे धीरे तुम्हारी गौमाता हाथ पैर पटकना बंद कर देती है तब हम भी उसकी टांगे छोड़ कर नहाने चले जाते हैं,अम्मी सिल बटने पर मसाला पीसने लगतीं हैं आपा प्याज लहसुन छीलने लगती हैं और अब्बू शकील चचा के साथ जानवर की खाल छीलना शुरू कर देते हैं.

सब्र का बांध तो ना जाने कब का हम सबका टूट चुका था बस उसकी बात खत्म होने का ही इंतजार हो रहा था. मैंने जावेद को कमर से कस कर जकड़ लिया संजय दौड़ कर गया और स्टाफ रूम से लोहे की बाल्टी उठा लाया, रूपेश ऋषिकांत दुर्विजय और देवेन्द्र क्लास की टूटी खिड़की से सरिया खींच लाये. मैंने बाल्टी का हैंडल पकड़ चार पांच बार जावेद के सर पर पटकी सर से खून की धार बह उठी वह हाय अल्लाह मार डाला कह कर जमीन पर लोट गया बाकियों ने उसके हाथ पैरों पर सरिया से कई प्रहार किये वह अल्ला मियां बचा ले की गुहार लगा रहा था और हम लोग सरिया के साथ साथ गालियां और नसीहत देते जा रहे थे अब खायेगा गौमाता को अब काटेगा गौमाता को. उसकी चीख पुकार सुन कई लोग हमारी तरफ दौड़े हम लोग भी अपने अपने घरों को भाग लिये.

हम पांचो का स्कूल से रिस्टीकेशन हो गया जावेद भी एक महीने अस्पताल में भर्ती रहा फिर अपनी फुफ्फो के पास बनारस चला गया पढ़ने. पढ़ा ससुरा क्या ही होगा फिर भी इतना तो यकीन है अपना पुश्तैनी कसाई का धंधा तो करा ही नहीं होगा अगर कर भी रहा होगा तो गाय काटने के नाम पर बचपन की मार याद कर हाथों से चापड़ छोड़ देता होगा.

अलवर के गौ तस्कर की हत्या को मेरा पूर्ण समर्थन.

गाय का मांस इतना स्वादिष्ट लगता है तो अखलाक बिंदु खां बनने में डरना तो नहीं चाहिये.

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1 COMMENT

  1. ये साले मुहब्बत से तो मानने वाले हैं नहीं.
    लोकिन हर सूअर की मौत आती ही है.
    इन सूअरों को बचाने वाले कोमुनिस्ट और कांग्रेसी तो खुद ही आखिरी सांस ले रहे हैं.
    कुछ दिन और हैं सुअरो……

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