गफलत की नींद से अब तक वो जागे जो नहीं हैं

एक थे ज़िंदा पीर, वही जिसे कुछ मुशरिक औरंगज़ेब के नाम से जानते हैं. बाकि के मुगलों की तरह वो भी लाल किले पर कब्ज़ा जमाये बैठे होते थे.

अब लाल किले के सामने ही है जामा मस्जिद, और जामा मस्जिद में कहीं से सूफी संत सरमद चले आये. अब तो भाई दिल्ली में मुसलमान बिलकुल ही खतरे में आ गया!

समस्या ये थी कि सरमद खुद को ही खुदा कहते थे. उन्होंने जो बाते कहीं उस से मुस्लिम कट्टरपंथियों की नींद हराम हो गई.

गौर कीजियेगा, उस दौर में सरमद को शिर्क और कुफ्र के लिए उकसाने वाला कोई अमरीका नाम का देश ही नहीं होता था. कोई पश्चिमी हुक्मरानों ने जिन्दा पीर के तेल के कूएँ लूटने के इरादे से सरमद को नहीं भेजा था.

खैर बात इतने तक ही होती तो कोई बात ना थी मगर ये जो सूफी थे, उनके साथ मुसलमान की दूसरी समस्या ये थी कि वो नाम तो मोमिनों वाला रख लेते, मगर हरकतों से बिद्दत होती रहती.

जैसे कई बार सरमद के पास कपड़े ही नहीं होते थे. वैसे ही नंग धड़ंग किसी मज़ार पर पड़े होते. दाढ़ीजार मौलानाओं ने अपने साथ अरब की भटकी हुई भेड़ों का झुण्ड बनाया और चले मुग़ल जिन्दा पीर के पास शिकायत करने.

कहते हैं, नंग धड़ंग बैठे सूफी के बारे में सुनकर औरंगज़ेब भी सरमद को देखने पहुंचा. सरमद सच में नंगे थे. पूछने पे जवाब मिला, पर्दा नहीं जब कोई खुदा से बन्दों से पर्दा करना क्या?

वैसे तो मुग़ल भड़का, कपड़े पहनने के लिए धमकाया, इस पर भी सरमद ने पास पड़ा एक कम्बल दिखा कर कहा, तुझे मैं नंगा दिखता हूँ तो वो रहा कम्बल. उठा और ढक दे!

कम्बल उठाते ही जिन्दा पीर कूद कर पीछे भागा. कहते हैं कम्बल हटाते ही उसे अपने उन भाइयों के कटे सर रखे दिखाई दिए थे जिन्हें उसने खुद ही बेरहमी से भूखा नंगा पूरे शहर में घुमाने के बाद सर कलम करवाया था.

उस वक्त तो औरंगज़ेब वहां से निकल गया, लेकिन ये बेइज्जती वो भूला नहीं. बड़ी दाढ़ी और छोटे पायजामे वालों की सलाह पर उसने कुछ ही वक्त बाद सरमद को भी क़त्ल करवा दिया.

खुद को खुदा कहने वालों का कत्ल करना मुसलमान के लिए कोई नयी बात नहीं है. वो हमेशा से ऐसा करता आया है. बेचारे मुशरिक जो अहं ब्रह्मास्मि कहते रहते हैं उनके लिए ये अनोखी बात हो सकती है, गफलत की नींद से अब तक वो जागे जो नहीं हैं.

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